CBSE की नौवीं कक्षा से तीसरी भाषा लागू... विवाद पर सुप्रीम कोर्ट बोला- इससे छात्रों का बढ़ेगा तनाव, दिया ये सुझाव

Edited By Updated: 17 Jul, 2026 01:39 PM

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उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को सीबीएसई पाठ्यक्रम के तहत नौवीं कक्षा से तीसरी भाषा शुरू किए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे छात्रों का तनाव बढ़ेगा। न्यायालय ने सुझाव दिया कि यदि तीसरी भाषा लागू करनी है तो इसे पांचवीं या छठी कक्षा से शुरू...

नेशनल डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को सीबीएसई पाठ्यक्रम के तहत नौवीं कक्षा से तीसरी भाषा शुरू किए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे छात्रों का तनाव बढ़ेगा। न्यायालय ने सुझाव दिया कि यदि तीसरी भाषा लागू करनी है तो इसे पांचवीं या छठी कक्षा से शुरू किया जाना चाहिए, ताकि छात्र इसे आसानी से सीख और समझ सकें। 

छठी कक्षा से लागू करें तीसरी भाषा
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने मौखिक रूप से केंद्र सरकार से कहा कि नौवीं कक्षा से तीसरी भाषा लागू नहीं की जानी चाहिए। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता से कहा, ''भारत सरकार कृपया नौवीं कक्षा से तीसरी भाषा लागू न करे। इससे छात्रों का तनाव अनावश्यक रूप से बढ़ जाएगा। यदि आप कोई नयी भाषा शुरू करना चाहते हैं, तो कृपया इसे पांचवीं या छठी कक्षा से लागू करें, न कि नौवीं कक्षा से। नौवीं कक्षा में पहले ही पढ़ाई का तनाव होता है। यह तनाव आठवीं कक्षा से ही शुरू हो जाता है।

त्रिभाषा नीति का तमिलनाडु सरकार कर रही विरोध 
उन्होंने अधिवक्ता से अदालत की इस भावना से सरकार को अवगत कराने को भी कहा। ये टिप्पणियां उस समय की गईं, जब न्यायालय तमिलनाडु सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने मद्रास उच्च न्यायालय के राज्य के प्रत्येक जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने की प्रक्रिया को सुगम बनाने के निर्देश को चुनौती दी है। तमिलनाडु सरकार लंबे समय से राज्य में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना का विरोध करती रही है। उसका कहना है कि इन विद्यालयों में लागू त्रिभाषा नीति को लेकर उसे आपत्ति है।

राज्य की आपत्ति त्रिभाषा नीति है 
हालांकि, यह पीठ सीधे तौर पर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की नयी भाषा नीति की वैधता पर सुनवाई नहीं कर रही थी, लेकिन उसने विद्यालयों में तीसरी भाषा शुरू किए जाने के उपयुक्त समय को लेकर अपनी टिप्पणी की। इस बीच, भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की एक अन्य पीठ सीबीएसई की नयी नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार कर रही है और हाल ही में उसने इस संबंध में जारी अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। सुनवाई के दौरान तमिलनाडु की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि राज्य की आपत्ति त्रिभाषा नीति को लेकर है। इस पर न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि इस नीति में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य नहीं किया गया है।

तमिलनाडु सरकार को हिन्दी से क्यों दिक्कत ?
 उन्होंने कहा, ''राज्य की भाषा पढ़ाई जानी चाहिए, अंग्रेजी पढ़ाई जानी चाहिए और कोई भी तीसरी भाषा पढ़ाई जा सकती है। इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि तीसरी भाषा हिंदी ही होगी।'' मद्रास उच्च न्यायालय में मूल याचिकाकर्ता रहे गैर-सरकारी संगठन 'कुमारी महा सभा' की ओर से अधिवक्ता जी. प्रियदर्शिनी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तमिलनाडु सरकार से पूछा, ''यदि आपको हिंदी नहीं चाहिए, लेकिन तीसरी भाषा संस्कृत हो, तो फिर क्या आपत्ति है?'' राज्य सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा केवल नौवीं कक्षा से अनिवार्य होती है। इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ''नहीं, यह बहुत गलत है। नौवीं कक्षा में पहले से ही पढ़ाई का तनाव होता है। आप नयी भाषा नौवीं कक्षा में क्यों शुरू कर रहे हैं? इसे छठी कक्षा से क्यों नहीं शुरू करते?

तीसरी भाषा जितनी जल्दी शुरू की जाए, उतना बेहतर
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए कहा कि उनके समय नौवीं कक्षा में छात्रों को भाषा चुनने का विकल्प मिलता था। उन्होंने बताया कि उनके विद्यालय में तीसरी भाषा की पढ़ाई माध्यमिक स्तर से ही शुरू हो जाती थी। उन्होंने कहा, ''जिन छात्रों की दूसरी भाषा हिंदी होती थी, उनके लिए तीसरी भाषा कन्नड़ होती थी और जिनकी दूसरी भाषा कन्नड़ होती थी, उनके लिए हिंदी। संस्कृत का भी विकल्प उपलब्ध था। इसलिए तीसरी भाषा जितनी जल्दी शुरू की जाए, उतना बेहतर है।'' न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तमिलनाडु सरकार से यह भी कहा कि केवल इस आधार पर केंद्रीय योजनाओं को अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए कि वे केंद्र सरकार की हैं। उन्होंने कहा, ''आपकी अपनी शिक्षा व्यवस्था हो सकती है, लेकिन केंद्रीय सरकारी विद्यालयों को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।... यह सोच नहीं होनी चाहिए कि यह केंद्र सरकार की योजना है, इसलिए हम इसे स्वीकार क्यों करें। 

अगली सुनवाई 11 अगस्त को 
हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि नवोदय विद्यालयों की स्थापना को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच बातचीत जारी है। पीठ ने कहा, ''बातचीत अभी पूरी नहीं हुई है। यदि वह विफल होती है, तभी इस मामले के गुण-दोष पर हमारे विचार करने का प्रश्न उठेगा।'' राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता ने इस मामले में आगे के निर्देश प्राप्त करने के लिए कुछ समय देने का अनुरोध किया। पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि राज्य में नयी सरकार सत्ता में आई है और अब यह देखना होगा कि नयी सरकार इस विषय पर क्या नीति अपनाती है। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को निर्धारित की है। तमिलनाडु सरकार ने मद्रास उच्च न्यायालय के 2017 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें राज्य के प्रत्येक जिले में एक जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने का निर्देश दिया गया था। 

नवोदय विद्यालय की स्थापना के लिए भूमि की पहचान करे  तमिलनाडु सरकार
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार द्वारा नवोदय विद्यालयों की स्थापना की अनुमति न देना छात्रों के अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान चुनने के अधिकार का हनन है और यह बच्चों का नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने 11 दिसंबर, 2017 को उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 15 दिसंबर, 2025 को शीर्ष न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में संशोधन करते हुए तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य के प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय की स्थापना के लिए आवश्यक भूमि की पहचान करे। 

न्यायालय ने कहा था कि यह प्रक्रिया छह सप्ताह के भीतर पूरी कर उसकी रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए। साथ ही उसने स्पष्ट किया था कि यह निर्देश केवल उन छात्रों के हित में दिया जा रहा है, जो तमिलनाडु में ऐसे विद्यालयों में प्रवेश पाने के पात्र हैं। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और तमिलनाडु सरकार के प्रतिनिधियों को राज्य में नवोदय विद्यालयों की स्थापना के संबंध में आपसी चर्चा जारी रखने का भी निर्देश दिया था। 

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