बच्चों में बढ़ रही स्पीच डिले की समस्या... खाने से लेकर खेलने तक मोबाइल के इस्तेमाल पर बाल रोग विशेषज्ञों का अलर्ट

Edited By Updated: 18 Aug, 2026 12:19 PM

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स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर 2 से 5 वर्ष की उम्र के बच्चे दिन में एक घंटे से अधिक समय मोबाइल और टैबलेट पर वीडियो देखकर बिताते हैं तो उनके दिमाग के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

नई दिल्ली: स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर 2 से 5 वर्ष की उम्र के बच्चे दिन में एक घंटे से अधिक समय मोबाइल और टैबलेट पर वीडियो देखकर बिताते हैं तो उनके दिमाग के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

 बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के वर्षों में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ी है जिन्हें बोलने में देरी की शिकायत के साथ अस्पताल लाया जा रहा है और इनमें कई मामलों में अत्यधिक स्क्रीन देखने तथा माता-पिता के साथ सीमित संवाद जैसी बातें सामने आती हैं। 

छोटे बच्चों में बोलने की क्षमता पर पड़ रहा प्रभाव
रोहिणी स्थित डॉ.बाबा साहेब आंबेडकर अस्पताल में वरिष्ठ रेजिडेंट बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.राहुल दराल ने कहा कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम, खासकर 'रील्स' और 'शॉर्ट्स' जैसे तेजी से बदलने वाले वीडियो, छोटे बच्चों में बोलने की क्षमता के विकास और एकाग्रता पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं। ऐसा ही एक मामला राष्ट्रीय राजधानी के एक सरकारी अस्पताल में सामने आया। ढाई वर्ष के बच्चे को इसलिए अस्पताल लाया गया क्योंकि वह केवल "मम्मा", "पापा" और कुछ गिने-चुने शब्द ही बोल पाता था जबकि उसकी उम्र के अन्य बच्चे छोटे-छोटे वाक्य बोलने लगे थे। 

स्पीच एवं लैंग्वेज थेरेपी शुरू करने की सलाह
डॉक्टरों ने बताया कि जांच में उसकी सुनने की क्षमता, दृष्टि, तंत्रिका तंत्र और अन्य विकास संबंधी पहलू सामान्य पाए गए। विस्तृत जानकारी लेने पर पता चला कि वह प्रतिदिन छह से सात घंटे तक मोबाइल फोन पर कार्टून और छोटे वीडियो देखता था। खाना भी वह मोबाइल देखते हुए ही खाता था और फोन हटाने पर चिड़चिड़ा हो जाता था। उन्होंने बताया कि बच्चे में केवल बोलने की क्षमता का विकास अपेक्षाकृत धीमा पाया गया। उसके माता-पिता ने बताया कि दोनों के कामकाजी होने के कारण बच्चे के साथ बातचीत और 'इंटरैक्टिव' खेल काफी सीमित हो गए थे। हालांकि मनोरंजन के लिए स्क्रीन का उपयोग पूरी तरह बंद करने, भोजन के दौरान किसी भी प्रकार की स्क्रीन का उपयोग न करने, प्रतिदिन कम से कम एक घंटे तक माता-पिता द्वारा बच्चे के साथ इंटरैक्टिव खेल खेलने, रोज़ाना चित्रों वाली किताबें पढ़कर सुनाने, रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान बच्चे से लगातार बातचीत करने और 'स्पीच एवं लैंग्वेज थेरेपी' शुरू करने की सलाह दी गई जिससे उल्लेखनीय सुधार देखने को मिले। 

डॉ. दराल ने कहा कि अत्यधिक 'स्क्रीन टाइम' के कारण आमने-सामने की बातचीत, कहानी सुनाना, किताबें पढ़ना और खेल जैसी गतिविधियां कम हो जाती हैं और यही गतिविधियां शुरुआती वर्षों में भाषा सीखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती हैं। इसलिए लंबे समय तक स्क्रीन देखने से भाषा का विकास प्रभावित हो सकता है। उनके अनुसार, 'रील्स' और 'शॉर्ट्स' जैसे वीडियो हर कुछ सेकेंड में नया कंटेंट दिखाते हैं जिससे मस्तिष्क को लगातार उत्तेजक संकेत मिलते हैं और बच्चों को पढ़ाई, किताबें या अन्य ऐसी गतिविधियां, जिनका परिणाम धीरे-धीरे मिलता है, अपेक्षाकृत कम रोचक लगने लगती हैं।

बच्चों को मनोरंजन के लिए स्क्रीन से दूर रखा जाना चाहिए
हालांकि, उन्होंने कहा, "ध्यान केंद्रित करने में कमी के लिए केवल 'रील्स' या 'शॉर्ट्स' को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि, पालन-पोषण का तरीका और घर का वातावरण भी उतने ही महत्वपूर्ण कारक हैं।" डॉ दराल ने बताया, "लगातार स्क्रीन स्क्रॉल करने से मस्तिष्क का 'रिवॉर्ड सिस्टम' बार-बार सक्रिय होता है। मस्तिष्क तुरंत मिलने वाले 'रिवॉर्ड' का अभ्यस्त हो सकता है। इसके कारण गृह कार्य, पढ़ाई, किताबें पढ़ना या संगीत का अभ्यास जैसी गतिविधियां बच्चों को कम आकर्षक लग सकती हैं।" उन्होंने सलाह दी कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मनोरंजन के लिए स्क्रीन से दूर रखा जाना चाहिए और दो से पांच वर्ष की आयु के बच्चों में मनोरंजन के लिए स्क्रीन का समय आदर्श रूप से प्रतिदिन एक घंटे से कम होना चाहिए। डॉक्टर ने कहा कि बड़े बच्चों में यह सुनिश्चित करना अधिक महत्वपूर्ण है कि स्क्रीन टाइम के कारण उनकी नींद, पढ़ाई, शारीरिक गतिविधि और परिवार के साथ बिताया जाने वाला समय प्रभावित न हो। ‍

डॉ दराल ने कहा, "समस्या का समाधान केवल मोबाइल छीन लेना नहीं, बल्कि स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित करना है। इसके लिए भोजन के समय और शयनकक्ष को स्क्रीन-मुक्त रखा जाए, सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन बंद कर दी जाए, बच्चों को प्रतिदिन कम से कम एक घंटा बाहर खेलने या शारीरिक गतिविधि के लिए प्रोत्साहित किया जाए तथा रोजाना कहानी सुनाने, किताब पढ़ने और बातचीत के लिए समय निकाला जाए।" उन्होंने कहा कि माता-पिता स्वयं भी संतुलित स्क्रीन उपयोग का उदाहरण प्रस्तुत करें क्योंकि बच्चे सबसे अधिक सीख अपने आसपास के लोगों को देखकर ही लेते हैं।  

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