Edited By Tanuja,Updated: 28 Sep, 2026 07:58 PM

भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर राजनीतिक और आर्थिक बहस जारी है। IMF ने जुलाई 2026 में भारत की वृद्धि दर 2026 में 6.4% और 2027 में 6.7% रहने का अनुमान लगाया। साथ ही रोजगार, उत्पादकता, निजी निवेश और ऊर्जा कीमतों जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, इसलिए तस्वीर...
New Delhi: भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर देश में लंबे समय से राजनीतिक और आर्थिक बहस चल रही है। कुछ आलोचक आर्थिक वृद्धि, रोजगार, महंगाई और निवेश जैसी चुनौतियों को आधार बनाकर अर्थव्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाते हैं। वहीं, दूसरी ओर औद्योगिक उत्पादन, सेवा क्षेत्र और वैश्विक विनिर्माण में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी को देश की आर्थिक क्षमता का प्रमाण बताया जाता है। हालिया अंतरराष्ट्रीय आंकड़े इस बहस को एक महत्वपूर्ण आधार देते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF ने जुलाई 2026 के अपने विश्व आर्थिक परिदृश्य में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 2026 के लिए 6.4 प्रतिशत और 2027 के लिए 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है।
IMF ने भारत को दुनिया की प्रमुख तेज वृद्धि वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करते हुए कहा है कि निजी उपभोग और सेवा क्षेत्र की गतिविधियां वृद्धि को सहारा दे रही हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां नहीं हैं। रोजगार सृजन, उत्पादकता, निजी निवेश, ऊर्जा आयात पर निर्भरता और वैश्विक परिस्थितियों से जुड़े जोखिम अब भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। सितंबर 2026 में आईएमएफ के वित्त एवं विकास प्रकाशन में पूर्व आरबीआई गवर्नर डी. सुब्बाराव ने भी भारत की वृद्धि की दीर्घकालिक स्थिरता के सामने रोजगार, उत्पादकता और नवाचार जैसी संरचनात्मक चुनौतियों को रेखांकित किया है।
उत्पादन के मोर्चे पर भारत की स्थिति
भारत की औद्योगिक क्षमता को देखें तो इस्पात इसका एक बड़ा उदाहरण है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा इस्पात उत्पादक है। 2024-25 में देश में 152.18 मिलियन टन कच्चे इस्पात का उत्पादन हुआ था। 2025-26 के शुरुआती महीनों में भी उत्पादन में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। वाहन उद्योग भी भारतीय विनिर्माण की महत्वपूर्ण ताकत बन चुका है। भारत दोपहिया वाहनों के विशाल बाजार और उत्पादन के लिए जाना जाता है। भारतीय वाहन उद्योग में दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है और 2026 में सरकार ने वाहन क्षेत्र से जुड़ी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के लिए आवंटन भी बढ़ाया। मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में भी पिछले वर्षों में भारत का विस्तार हुआ है। सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं और वैश्विक कंपनियों द्वारा भारत में उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों ने इस क्षेत्र को नई गति दी है।
दवा, टीका और सेवा क्षेत्र भी महत्वपूर्ण
भारत की आर्थिक ताकत सिर्फ कारखानों और भारी उद्योगों तक सीमित नहीं है। दवा उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल सेवाएं भी देश की वैश्विक आर्थिक पहचान का हिस्सा हैं। भारत लंबे समय से दुनिया के प्रमुख जेनेरिक दवा उत्पादकों में शामिल है। इसी तरह भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियों ने दुनिया के कई बाजारों में मजबूत उपस्थिति बनाई है। यह सेवा क्षेत्र भारत के निर्यात और विदेशी मुद्रा आय के महत्वपूर्ण स्रोतों में शामिल है।
लेकिन चुनौतियां भी
भारत की आर्थिक कहानी का दूसरा पक्ष भी है। तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार की गुणवत्ता और पर्याप्त संख्या में रोजगार पैदा करना एक प्रमुख चुनौती है। इसके अलावा आय में असमानता, महंगाई का असर, शहरी बुनियादी ढांचे की कमियां, नियामकीय जटिलताएं और ऊर्जा कीमतों का दबाव भी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। आईएमएफ ने जुलाई 2026 में भी कहा कि भारत की वृद्धि के लिए ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी जोखिम पैदा कर रही है। संस्था ने 2026 के वृद्धि अनुमान को मामूली रूप से घटाकर 6.4 प्रतिशत किया, जबकि 2027 में वृद्धि 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया। इसलिए भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर तस्वीर न तो केवल निराशावादी दावों से समझी जा सकती है और न ही सिर्फ उत्पादन के आंकड़ों से।
एक तरफ भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेज वृद्धि दर्ज कर रहा है और कई औद्योगिक क्षेत्रों में वैश्विक महत्व हासिल कर चुका है, वहीं दूसरी तरफ रोजगार, उत्पादकता, निवेश और ऊर्जा सुरक्षा जैसी चुनौतियों का समाधान करना दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी है। यानी भारत की अर्थव्यवस्था पर बहस का वास्तविक सवाल यह नहीं है कि वह “मृत” है या “संपूर्ण रूप से मजबूत”, बल्कि यह है कि मौजूदा तेज वृद्धि को कितने लंबे समय तक टिकाऊ, रोजगारपरक और व्यापक आर्थिक विकास में बदला जा सकता है।