Edited By Parveen Kumar,Updated: 12 Mar, 2026 08:49 PM

मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और तेल आपूर्ति से जुड़ी चिंताओं का असर अब भारतीय मुद्रा पर भी साफ दिखाई देने लगा है। गुरुवार को कारोबारी सत्र के दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट के करीब पहुंच गया। हालांकि दिन के अंत में कच्चे तेल की...
नेशनल डेस्क : मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और तेल आपूर्ति से जुड़ी चिंताओं का असर अब भारतीय मुद्रा पर भी साफ दिखाई देने लगा है। गुरुवार को कारोबारी सत्र के दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट के करीब पहुंच गया। हालांकि दिन के अंत में कच्चे तेल की कीमतों में हल्की नरमी आने से रुपये ने कुछ हद तक संभलने की कोशिश की।
कारोबार के दौरान टूटा रिकॉर्ड
विदेशी मुद्रा बाजार में ट्रेडिंग के दौरान रुपया एक समय 92.35 प्रति डॉलर के स्तर तक गिर गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। बाद में बाजार में थोड़ी स्थिरता लौटने के बाद गिरावट कुछ कम हुई और दिन के अंत में रुपया करीब 92.19 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह पिछले कारोबारी दिन की तुलना में लगभग 0.16 प्रतिशत की कमजोरी दर्शाता है। बाजार जानकारों का मानना है कि अगर रुपये पर दबाव और बढ़ता है तो Reserve Bank of India स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।
तेल की कीमतों में उछाल से बढ़ी चिंता
वैश्विक तेल बाजार में भी हाल के दिनों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क Brent Crude की कीमत कारोबार के दौरान 101.6 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। हालांकि बाद में इसमें थोड़ी गिरावट आई और यह करीब 96.87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा। विश्लेषकों के मुताबिक इस उछाल के पीछे United States, Israel और Iran के बीच बढ़ता तनाव मुख्य वजह माना जा रहा है, जिससे पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
वैश्विक बाजारों में भी दबाव
तेल की बढ़ती कीमतों और राजनीतिक तनाव का असर दुनिया के शेयर बाजारों पर भी पड़ा है। एशियाई बाजारों में करीब एक प्रतिशत तक गिरावट देखी गई। भारत का प्रमुख शेयर सूचकांक Nifty 50 भी इसी तरह की कमजोरी के साथ कारोबार करता दिखाई दिया। वहीं यूरोपीय बाजारों में भी दबाव रहा और अमेरिकी बाजारों की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिले।
ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को ज्यादा असर
विशेषज्ञों के अनुसार जिन देशों की अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर है, वहां की मुद्रा पर इस तरह की वैश्विक परिस्थितियों का ज्यादा असर पड़ता है। India भी दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों में शामिल है। यही वजह है कि क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ने के बाद से रुपये में डॉलर के मुकाबले एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है।
महंगाई और विकास दर पर असर का खतरा
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी होने का खतरा भी बढ़ सकता है।