NEET-PG 2025 कट-ऑफ विवाद: कम परसेंटाइल पर बवाल, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दी सफाई

Edited By Updated: 23 Feb, 2026 08:38 PM

supreme court on neet pg

NEET-PG 2025 के क्वालीफाइंग परसेंटाइल में बड़ी कटौती को लेकर चल रहे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है।

नेशनल डेस्क: NEET-PG 2025 के क्वालीफाइंग परसेंटाइल में बड़ी कटौती को लेकर चल रहे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। Ministry of Health and Family Welfare ने अदालत में दायर हलफनामे में कहा है कि कट-ऑफ कम करने से डॉक्टरों की क्लिनिकल दक्षता या मरीजों की सुरक्षा प्रभावित नहीं होती।

मंत्रालय के अनुसार, NEET-PG परीक्षा का मकसद न्यूनतम चिकित्सीय योग्यता तय करना नहीं है, क्योंकि यह योग्यता MBBS डिग्री और एक साल की अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी करने के बाद पहले ही प्रमाणित हो जाती है। NEET-PG का उद्देश्य सीमित पोस्टग्रेजुएट (PG) सीटों के लिए उम्मीदवारों की मेरिट लिस्ट तैयार करना है।

9,621 सीटें खाली रहने के बाद लिया गया फैसला

हलफनामे में बताया गया कि राउंड-2 काउंसलिंग के बाद ऑल इंडिया कोटा (AIQ) में कुल 9,621 सीटें खाली रह गईं। इनमें 5,213 सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों की थीं। कुल लगभग 70,000 PG सीटें उपलब्ध थीं, जबकि परीक्षा में 2,24,029 अभ्यर्थी शामिल हुए। AIQ के तहत करीब 31,742 सीटें थीं। कट-ऑफ में बदलाव 13 जनवरी 2026 को National Board of Examinations in Medical Sciences (NBEMS) की नोटिस के जरिए लागू किया गया और यह राउंड-3 काउंसलिंग से प्रभावी हुआ।

सरकार के मुख्य तर्क

  • NEET-PG स्कोर रिलेटिव परफॉर्मेंस पर आधारित होते हैं, इन्हें क्लिनिकल अयोग्यता का पैमाना नहीं माना जा सकता।
  • सभी अभ्यर्थी पहले से लाइसेंसधारी MBBS डॉक्टर हैं और स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करने के पात्र हैं।
  • PG कोर्स तीन वर्ष का सुपरवाइज्ड प्रशिक्षण कार्यक्रम है, जिसमें अंत में MD/MS परीक्षा में कम से कम 50% अंक अनिवार्य हैं।
  • कट-ऑफ में कमी एक नीतिगत निर्णय है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक संसाधनों से बनी सीटों को खाली जाने से बचाना है।
  • यह फैसला निजी संस्थानों को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि जनहित में लिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की चिंता: क्वालिटी पर न पड़े असर

मामले की सुनवाई के दौरान Supreme Court of India की बेंच—जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे—ने केंद्र से पूछा कि इतनी बड़ी कटौती से PG मेडिकल शिक्षा के मानकों पर असर नहीं पड़ेगा, यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा।

कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि सामान्य श्रेणी में 50वें परसेंटाइल से 7वें परसेंटाइल तक और आरक्षित वर्गों में 0 परसेंटाइल तक कटौती की गई है। कुछ श्रेणियों में नेगेटिव स्कोर (-40) तक के अभ्यर्थियों को पात्र बनाने का मुद्दा भी उठाया गया। अदालत ने इसे गंभीर विषय बताते हुए कहा कि PG स्तर पर गुणवत्ता बनाए रखना आवश्यक है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं पिंकी आनंद और गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि काउंसलिंग प्रक्रिया के बीच कट-ऑफ घटाना न्यायालय द्वारा तय सिद्धांतों के विपरीत है। उनका कहना है कि इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य के अधिकार और मेडिकल शिक्षा के मानकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल को निर्धारित की गई है।

आगे क्या?

अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत यह तय करेगी कि कट-ऑफ में की गई कटौती को बरकरार रखा जाए या इसमें संशोधन आवश्यक है। यह फैसला न केवल हजारों अभ्यर्थियों, बल्कि देश की मेडिकल शिक्षा प्रणाली पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
 

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