भरत तिवारी एनकाउंटर केस में CBI जांच की मांग सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई... अब क्या है रास्ता?

Edited By Updated: 30 Jun, 2026 03:21 PM

supreme court rejects demand for cbi probe in bharat tiwari encounter case  wh

उच्चतम न्यायालय ने बिहार में पुलिस मुठभेड़ में कार्यकर्ता भरत भूषण तिवारी की कथित ''न्यायेतर हत्या'' की जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति के गठन के अनुरोध वाली याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और...

नेशनल डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने बिहार में पुलिस मुठभेड़ में कार्यकर्ता भरत भूषण तिवारी की कथित ''न्यायेतर हत्या'' की जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति के गठन के अनुरोध वाली याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने याचिकाकर्ता को पटना उच्च न्यायालय का रुख करने को कहा। जैसे ही मामला सुनवाई के लिए आया, पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा, ''आप कौन हैं?'' याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता विशाल तिवारी ने कहा कि यह जनहित याचिका सार्वजनिक हित में दायर की गई है जिस पर पीठ ने कहा, ''नहीं, माफ करें। हम सुनवाई नहीं करेंगे। उच्च न्यायालय जाने की स्वतंत्रता है।'' 

परिवार का दावा- आत्मसमर्पण के बाद पुलिस ने मारी गोली 
याचिका में यह दावा करते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच का भी अनुरोध किया गया था कि इस मामले में एक त्वरित स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत है। बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गांव के निवासी तिवारी की 17 जून को हुई मौत ने विवाद खड़ा कर दिया है। उनके परिवार का दावा है कि पुलिस द्वारा गोली मारे जाने से पहले उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था और अपना हथियार छोड़ दिया था। 

मुठभेड़ की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं
बिहार सरकार ने शनिवार को इस घटना की न्यायिक जांच की घोषणा की थी। अपनी याचिका में तिवारी ने कहा है कि एक लोकतांत्रिक समाज में पुलिस को सजा देने वाला प्राधिकार बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह शक्ति केवल न्यायपालिका में निहित है। बिहार की घटना का जिक्र करते हुए याचिका में कहा गया कि इसने मुठभेड़ों के दौरान पुलिस प्रक्रियाओं और बल के प्रयोग पर एक बहस छेड़ दी है। याचिका में दावा किया गया, ''पिछले कुछ वर्षों में न्यायेतर हत्याओं की घटनाएं बढ़ी हैं, जो कानून के शासन के लिए एक बड़ी चुनौती है।'' इसमें यह भी कहा गया कि हाल में पूरे बिहार में पुलिस मुठभेड़ की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।

तिवारी की मौत परिस्थितियां ''संदिग्ध'' 
याचिका में दावा किया गया कि तिवारी की मौत परिस्थितियां ''संदिग्ध'' प्रतीत होती है। इसमें उच्चतम न्यायालय के 2014 के उस फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें पुलिस मुठभेड़ों के दौरान किसी व्यक्ति की मौत या गंभीर रूप से घायल होने की घटनाओं की जांच के लिए पालन किए जाने वाले कई दिशानिर्देश निर्धारित किए गए थे। याचिका में कहा गया, ''फर्जी मुठभेड़ या पुलिस हिरासत/जेल में आरोपियों की मौत/हत्या कानून के शासन को कमजोर करती है, और यदि ऐसी हत्याओं को यह कहकर उचित ठहराया जाएगा कि मारा गया आरोपी एक गैंगस्टर था या उसका आपराधिक मामलों का इतिहास था, तो यह समाज को 'आंख के बदले आंख' के कानून की ओर ले जाएगा।

मानसिक रूप से अस्वस्थ बताया 
याचिका में केंद्र को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को एक परामर्श जारी करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था, ताकि वे 2014 के फैसले में शीर्ष अदालत द्वारा तय किए गए निर्देशों और दिशानिर्देशों का अनुपालन करें। मंगलवार को जारी पुलिस के शुरुआती बयान में भरत भूषण तिवारी को कथित तौर पर "मानसिक रूप से अस्वस्थ" बताया गया था। वहीं, उनके परिजनों समेत अन्य लोगों ने उन्हें एक ऐसा सामाजिक कार्यकर्ता बताया, जो स्थानीय समस्याओं को लगातार प्रशासन के समक्ष उठाते रहते थे। पुलिस के बयान में कहा गया कि तिवारी लगातार पुलिस पर गोलीबारी कर रहे थे। इसके जवाब में पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की, जिसमें उनके पैर में गोली लगी। 

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!