Edited By Rohini Oberoi,Updated: 10 Mar, 2026 03:54 PM

युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता कई बार इसकी सबसे बड़ी कीमत मासूम महिलाओं को चुकानी पड़ती है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना ने एक ऐसी घिनौनी प्रणाली विकसित की थी जिसे कंफर्ट वूमन कहा गया। यह सुनने में जितना नरम शब्द लगता है इसके पीछे...
History of Imperial Japanese Army Comfort Women : युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता कई बार इसकी सबसे बड़ी कीमत मासूम महिलाओं को चुकानी पड़ती है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना ने एक ऐसी घिनौनी प्रणाली विकसित की थी जिसे कंफर्ट वूमन कहा गया। यह सुनने में जितना नरम शब्द लगता है इसके पीछे की हकीकत उतनी ही डरावनी और बर्बर थी।
1. क्या थी कंफर्ट वूमन प्रणाली?
1932 में चीन-जापान युद्ध के दौरान इसकी शुरुआत हुई। जापानी सेना ने अपने सैनिकों के मनोरंजन और यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए जगह-जगह कंफर्ट स्टेशन्स (सैन्य वेश्यालय) बनाए। कोरिया, चीन, फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे कब्जे वाले देशों से हजारों लड़कियों और महिलाओं को जबरन उठाया गया। कई गरीब महिलाओं को अच्छी नौकरी का लालच देकर भर्ती किया गया और फिर उन्हें यौन दासता के नर्क में धकेल दिया गया।

2. नर्क से बदतर थी जिंदगी
कंफर्ट स्टेशनों में कैद महिलाओं की स्थिति किसी लाश जैसी थी। एक-एक महिला को दिन भर में दर्जनों सैनिकों के साथ संबंध बनाने पर मजबूर किया जाता था। विरोध करने या भागने की कोशिश करने वाली महिलाओं को बुरी तरह पीटा जाता या मार दिया जाता था। यदि कोई महिला गर्भवती हो जाती तो सेना के डॉक्टर जबरन उसका गर्भपात करा देते ताकि वह सैनिकों की सेवा जारी रख सके।
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3. प्यार करना था जुर्म
जापानी सेना में अनुशासन इतना सख्त था कि किसी सैनिक को इन महिलाओं से प्यार करने की इजाजत नहीं थी। यदि कभी कोई सैनिक और महिला एक-दूसरे के करीब आते तो सैनिक को जेल भेज दिया जाता और महिला को खौफनाक शारीरिक यातनाएं दी जाती थीं।

4. 50 साल बाद दुनिया के सामने आया सच
युद्ध खत्म होने के बाद जापान ने इस मुद्दे पर दशकों तक चुप्पी साधे रखी। जब कुछ जीवित बची महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से अपनी आपबीती सुनाई तब दुनिया दहल गई। 1993 में जापान ने पहली बार इसमें सेना की संलिप्तता स्वीकार की (कोनो स्टेटमेंट)। 2015 में जापान और दक्षिण कोरिया के बीच पीड़ितों के मुआवजे को लेकर एक समझौता भी हुआ।
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सिर्फ जापान ही नहीं, अन्य सेनाओं पर भी लगे दाग
इतिहास गवाह है कि यौन हिंसा का यह काला खेल अन्य देशों की सेनाओं ने भी खेला:
नाजी जर्मनी: जर्मन सैनिकों के लिए वेहरमाच्ट वेश्यालय बनाए गए थे।
सोवियत संघ: 1945 में बर्लिन पर कब्जे के दौरान लाखों जर्मन महिलाओं के साथ यौन हिंसा हुई।

वियतनाम और कोरिया युद्ध: अमेरिकी सैनिकों के लिए भी 'बार गर्ल' और वेश्यालयों जैसी व्यवस्थाएं मौजूद थीं जिससे हजारों लावारिस बच्चे पैदा हुए।
बोस्निया युद्ध: 1990 के दशक में सर्बियाई बलों द्वारा रेप कैंप चलाने के शर्मनाक मामले सामने आए।
आज भी दक्षिण कोरिया और अन्य देशों में इन महिलाओं की याद में स्मारक बने हुए हैं जो आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका और महिलाओं के सम्मान की याद दिलाते रहते हैं।