दिल्ली से लंदन-पेरिस तक छाई आदिवासी पेंटिंग, ट्राइब्स आर्ट फेस्ट में 15 लाख की पेंटिंग

Edited By Updated: 06 Mar, 2026 05:02 PM

tribal paintings spread from delhi to london and paris with paintings worth 1 5

कभी गांवों और जंगलों तक सीमित रहने वाली आदिवासी कला अब दुनिया के बड़े शहरों की आर्ट गैलरियों तक पहुंच रही है। लंदन और पेरिस जैसे शहरों में भी अब इन पेंटिंग्स के कद्रदान मिल रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण दिल्ली में आयोजित ट्राइब्स आर्ट फेस्ट 2026 में...

(वेब डेस्क): कभी गांवों और जंगलों तक सीमित रहने वाली आदिवासी कला अब दुनिया के बड़े शहरों की आर्ट गैलरियों तक पहुंच रही है। लंदन और पेरिस जैसे शहरों में भी अब इन पेंटिंग्स के कद्रदान मिल रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण दिल्ली में आयोजित ट्राइब्स आर्ट फेस्ट 2026 में देखने को मिल रहा है। राजधानी के ट्रावनकोर पैलेस में 3 मार्च से शुरू हुई इस प्रदर्शनी में अब तक करीब 30 लाख रुपये की कलाकृतियां बिक चुकी हैं। यहां प्रदर्शित कई कलाकारों की पेंटिंग्स की मांग ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी और स्विट्जरलैंड तक पहुंच चुकी है। प्रदर्शनी 13 मार्च तक आम लोगों के लिए खुली रहेगी।

विदेशों में भी पहचान बना रहीं महिला कलाकार:
झारखंड के हजारीबाग की 50 वर्षीय पुतली गंजू अपनी पारंपरिक सोहराय आर्ट के लिए जानी जाती हैं। उनकी पेंटिंग्स विदेशों में भी प्रदर्शित हो चुकी हैं और यूरोप के कला प्रेमियों के बीच उनकी खास पहचान बन रही है। वहीं मध्यप्रदेश के भोपाल की 32 वर्षीय संतोषी श्याम गोंड आर्ट की कलाकार हैं। संतोषी पहले प्राकृतिक रंगों और हाथ से पेंटिंग बनाती थीं, लेकिन अब एक्रेलिक रंग और ब्रश के जरिए आधुनिक अंदाज में गोंड कला को नया रूप दे रही हैं। उनकी एक पेंटिंग की कीमत करीब 1 लाख 20 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है और उनकी कला की मांग ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस तक है।

15 लाख की पेंटिंग बनी आकर्षण का केंद्र:
इस प्रदर्शनी की सबसे महंगी पेंटिंग 15 लाख रुपये की है, जिसे मध्यप्रदेश के कलाकार रवि कुमार टेकम ने बनाया है। त्रियाफूल नाम की इस गोंड आर्ट पेंटिंग को तैयार करने में उन्हें करीब ढाई से तीन महीने लगे। 40 वर्षीय रवि पिछले 30 साल से गोंड आर्ट में काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी एक पेंटिंग मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग ने 25 लाख रुपये में खरीदी थी, जिसमें जंगल के बीच शेर और सूअर की लड़ाई का दृश्य दर्शाया गया था।


4 दिनों में 30 लाख की बिक्री:
जनजातीय मामलों की सचिव रंजना चोपड़ा के अनुसार प्रदर्शनी शुरू होने के चार दिनों के भीतर ही कलाकारों की कलाकृतियों की करीब 30 लाख रुपये की बिक्री हो चुकी है। इस आयोजन में 73 कलाकार हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें 45 से अधिक महिलाएं शामिल हैं। सरकार का उद्देश्य इन कलाकारों को बड़ा मंच देना और उनकी कला को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ना है।

16 राज्यों की कला एक ही जगह: 
दिल्ली के ट्रावनकोर पैलेस में लगी इस प्रदर्शनी में 16 राज्यों के कलाकार शामिल हैं। यहां 30 से अधिक जनजातीय कला रूप देखने को मिल रहे हैं। इनमें वारली, गोंड, भील, डोकरा, सोहराय, कोया, कुरुम्बा, सौर, बोडो, उरांव, मंडाना और गोदना जैसी पारंपरिक कला के साथ पूर्वोत्तर भारत का बांस शिल्प (बैंबू क्राफ्ट) भी प्रदर्शित किया गया है।

कलाकारों के लिए नए बाजार की उम्मीद:
सरकार का मानना है कि ऐसे आयोजनों से आदिवासी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल रही है। साथ ही कलाकारों के लिए नई संभावनाएं, बड़ा बाजार और आजीविका का मजबूत आधार भी तैयार हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के संकल्प के तहत इस तरह के आयोजनों को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि देश की पारंपरिक कलाओं को वैश्विक मंच मिल सके। अगर आप ट्राइबल आर्ट में रुचि रखते हैं और दिल्ली में हैं, तो 13 मार्च तक चल रही इस प्रदर्शनी में 73 कलाकारों की 1000 से अधिक कलाकृतियां एक ही जगह पर देख सकते हैं।

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