पितृपक्ष में खुलते हैं दूसरे लोक के द्वार, इन कार्यों से पितरों को मिलती है मुक्ति

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Sunday, September 25, 2016-12:30 PM

पूर्वजों की आत्म शांति हेतु एक मनुष्य के लिए पांच महायज्ञ निर्धारित हैं, जिसमें से एक पितृ यज्ञ है तथा अन्य चार हैं- ब्रह्म-यज्ञ (शास्त्रों का अध्ययन), देव-यज्ञ ( अग्नि के माध्यम से देवताओं को प्रसाद की आहुति देना ), मनुष्य-यज्ञ ( संगी-साथियों को खाना खिलाना)  तथा भूत-यज्ञ ( सभी जीवों को भोज कराना )  

 

पुराने समय में लोग अपने स्वर्गीय सगे-सम्बन्धियों ( पिता, दादा, पड़दादा आदि) की आत्म शांति व् मुक्ति के लिए,विशेष मन्त्र जाप और उनके नाम से दान दक्षिणा करते थे। हमारे पूर्वज, जन्म-मरण चक्र की निरन्तर प्रकृति व एक जन्म से दूसरे जन्म तक, एक आत्मा की यात्रा और उसके अनुभवों से भली-भांति परिचित थे।

 

प्राचीन मिस्र वासी अपने मृतकों की अंतिम यात्रा के समय, उनके शवों पर लेप लगाकर पिरामिड में उनके साथ खाद्य एवं आपूर्ति संग्रहित करते थे, जबकि वैदिक भारतीय अपने मृतकों के लिए श्राद्ध का संस्कार करते थे। प्राचीन यूनानी अपनी संस्कृति अनुसार मृतक की जीभ के नीचे सिक्के रखकर उन्हें ऐसी जगह दफनाते थे जहां से उन आत्माओं को उस लोक में ले जाया जाता था, जहां मृत्यु के बाद उनका वास होता है। 


जीवन, आत्मा की एक निरंतर यात्रा है जो प्रत्येक जन्म के साथ अपना रूप बदलती है।  वह रूप मनुष्य, पशु, देव किसी का भी हो सकता है। कर्मों के आधार पर ही किसी को योनि (अस्तित्व का स्तर ) तथा लोक (अस्तित्व के आयाम ) प्राप्त होता है। पितृ लोक स्वर्ग और पृथ्वी लोक के बीच का लोक है जहां पर हमारे पूर्वजों ( पिछली तीन पीढ़ियां ) की आत्माएं बिना शरीर के तब तक निवास करती हैं जब तक उनके कर्म दूसरा शरीर धारण करने की अनुमति नहीं देते। यही आत्माएं अपनी मुक्ति के लिए तथा अपने अधूरे कार्यों की पूर्ती के लिए अपनी संतानों पर निर्भर करती हैं और विभिन्न तरह से उन तक पहुंचने की कोशिश करती हैं।

 

यह कोई मिथ्या या अन्धविश्वास नहीं है, ध्यान आश्रम में ऐसे बहुत से अनुभव हैं, जहां पर पूर्वजों ने अपनी मुक्ति के लिए अपने परिजनों से संपर्क किया है। अभी हाल ही का एक उदाहरण है, ध्यान आश्रम के दिव्यद्रष्टाओं के जांचने पर लम्बे अरसे से उदर की बीमारी से पीड़ित एक युवा बालिका के सूक्ष्म शरीर में मोती के हार के साथ एक महिला और कंकाल की उपस्थिति का पता लगाया। जब बच्चे की मां के सामने उस महिला के रूप का वर्णन किया तो पता चला कि वह उन्हीं की स्वर्गीय मां थी। एक अन्य अवसर पर किसी के घर में शांति यज्ञ करते समय किसी महिला की छवि बार-बार साधक का ध्यान भंग कर रही थी। उसकी पहचान करने के लिए घर की मालकिन से पता चला कि वह उन्हीं का कोई मृतक परिजन था। इसके बाद उस मृतक की आत्म-शांति के लिए हवन किए गए। 

 

श्राद्ध हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जो आत्मा की यात्रा में कहीं अटके हुए हमारे पूर्वजों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। भाद्रपद की पूर्णिमा से शुरू होकर अश्विन की अमावस्या तक तारामंडल की स्थिति कुछ इस प्रकार होती है, जिससे दूसरे लोकों के प्रवेश द्वार खुल जाते हैं और इन आत्माओं को अपने प्रियजनों से मिलने की अनुमति मिल जाती है। उनके नाम पर किए गए दान, यज्ञ व विशिष्ठ मन्त्रों के जप द्वारा उन्हें उन अवांछित योनियों व लोकों के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।

योगी अश्विनी जी
www.dhyanfoundation.com

 


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