आज चतुर्थी का श्राद्ध: शास्त्रों से जानें, पितरों को तृप्त कैसे करें

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Monday, September 19, 2016-8:29 AM
मूलरूप से मनुष्य के तीन पूर्वज, यथा–पिता, पितामह एवं प्रपितामह क्रम से पितृ-देवों, अर्थात् वसुओं, रुद्रों एवं आदित्य के समान हैं और श्राद्ध करते समय उनको पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए। शास्त्र याज्ञ-वल्क्य-स्मृति के अनुसार पितृगण साक्षात् वसु, रुद्र एवं आदित्य हैं जो कि श्राद्ध के देवता हैं तथा वह श्राद्ध से संतुष्ट होकर मानव के पूर्वपुरुषों को संतुष्टि देते हैं। कुछ लोगों का मत है की श्राद्ध से इन बातों का निर्देश होता है, होम, पिण्डदान एवं ब्राह्मण तर्पण किन्तु श्राद्ध शब्द का प्रयोग इन तीनों के साथ गौण अर्थ में उपयुक्त समझा जा सकता है। अतः वसु, रुद्र और आदित्य श्राद्ध के देवता माने जाते हैं।
 
क्यों किया जाता है श्राद्ध कर्म: हर व्यक्ति के तीन पितृगण पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के वक्त वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि वे श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करके और ठीक ढंग से रीति-रिवाजों के अनुसार कराए गए श्राद्ध-कर्म से तृप्त होकर वे अपने वंशधर को सपरिवार सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आर्शीवाद देते हैं। श्राद्ध कर्म में उच्चारित मंत्रों और आहुतियों को वे अन्य सभी पितरों तक ले जाते हैं। 
 
कैसे करें चतुर्थी श्राद्ध: श्राद्धकर्ता को कुल, गोत्र, कर्ता के नाम से उच्चारण के पश्चात पिता, दादा, परदादा और उसके भी आगे की ज्ञात पीढ़ी के दिवंगतों के नाम तर्पण किया जाना चाहिए। उसके दिवंगत नाना/मामा के नाम का तर्पण किया जाना चाहिए। उसके बाद दिवंगत चाचा, ताऊ के नाम से तर्पण किया जाना चाहिए। तर्पण के दौरान गले की जनेउ दाहिने कंधे में हो और तर्पण सामग्री में कुशा, चन्दन, अक्षत, जौ, तिल, दूब, तुलसी के पत्ते और सफेद फूल अवश्य होने चाहिए। चतुर्थी के श्राद्ध में पितृगण के निमित भगवत गीता के चतुर्थ अद्ध्याय का पाठ करना चाहिए। पितृगण के निमित चावल की खीर, गुलाबी फूल, श्वेत चंदन, आलू की सब्जी, पूड़ी, घी-आटे से बने मिष्ठान तथा इलायची-मिश्री अर्पित करनी चाहिए। चतुर्थी श्राद्ध में चार ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भोजन के बाद सभी को यथाशक्ति वस्त्र, धन और दक्षिणा देकर उनको विदा करने से पूर्व आशीर्वाद लें।
 
आचार्य कमल नंदलाल
ईमेल: kamal.nandlal@gmail.com
Edited by:Aacharya Kamal Nandlal

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