कृष्णावतार

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Sunday, October 02, 2016-1:18 PM

जल दानवों से अपने संघर्ष का विवरण देते हुए अर्जुन ने आगे कहा, ‘‘मैंने नाविकों को पुकारा। शंख बजाया और संकेत किए जिस पर बहुत से नाविक दौड़ कर नौका पर आ गए। मैंने उनसे कहा कि वे नौका को हमलावरों के पत्थरों की पहुंच से दूर ले जाएं और वे सब मिल कर मेरी नौका को कुछ ही देर में समुद्र तट से दूर ले गए। अब हमलावरों के पत्थर और अस्त्र-शस्त्र सब समुद्र में ही गिर रहे थे। अंत में कोई मार्ग न देख कर मैंने फिर मंत्र पाठ करके अग्निअस्त्र का प्रयोग किया और उनके नगर को आग लगा दी। इस पर अपने-अपने बालकों को लेकर दानवों की स्त्रियां भाग निकलीं और सारे दानव वहां से भाग कर आग बुझाने में जुट गए। राजा के महल पर सफेद झंडा लहरा दिया गया। मैंने शंख बजा कर विजय घोष किया। कुछ देर बाद ही दानवों का राजा अपने मंत्रियों और सेनापतियों के साथ तट पर आ गया। उनके शरीर पर या हाथों में कोई शस्त्र नहीं थे। हमारे कुछ नाविक उनकी भाषा और उनके रीति-रिवाजों को जानते थे। क्योंकि वह सदा ही समुद्र में भ्रमण करते रहते थे। उन्होंने मुझे बताया कि राजा संधि की भिक्षा लेने आया है।’’

 

‘‘मैंने नाविकों से कहा कि तुम लोग नौका को तट पर ले चलो। अब कोई डर नहीं है। इसके बाद हमारी नाव तट पर पहुंच गई। मैं उतर कर तट पर गया। राजा और उसके अधिकारी मेरे सामने धरती पर गिर पड़े। राजा को मैंने स्वयं उठाया और उससे कहा, ‘‘अगर तुम यह वचन दो कि आगे से देवताओं की नौकाओं को नहीं तोड़ोगे तो मैं अभी लौट जाऊंगा। समुद्र सबका है इसलिए समुद्र में सारी लूटमार तुम्हें बंद कर देनी पड़ेगी। सब देशों और सब द्वीपों की नौकाओं को समुद्र में व्यापार के लिए चलने का अधिकार है। लूटमार करने वालों को कोई न कोई दंड तो देगा ही। तुम लोग खेतीबाड़ी करो, व्यापार करो। यदि किसी दूसरे देश के लोग तुम्हारी नौकाओं को लूटने का प्रयत्न करें तो देवताओं के ये नाविक तुम्हें जहां भी मिलें उनके द्वारा तुम मुझे सूचित कर देना। मैं आकर उन्हें दंड दूंगा।’’    
(क्रमश:)


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