Edited By Riya bawa,Updated: 18 Jun, 2020 05:25 PM

बालगंगाधर तिलक जी ने कहा था कि ‘तुम्हें कब क्या करना है यह बताना बुद्धि का काम है, पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है।’बुजुर्ग शब्द दिमाग में आते ही उम्र व विचारों से परिपक्व व्यक्ति की छवि सामने आती है। बुजुर्ग अनुभवों का वह खजाना है जो हमें...
बालगंगाधर तिलक जी ने कहा था कि ‘तुम्हें कब क्या करना है यह बताना बुद्धि का काम है, पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है।’बुजुर्ग शब्द दिमाग में आते ही उम्र व विचारों से परिपक्व व्यक्ति की छवि सामने आती है। बुजुर्ग अनुभवों का वह खजाना है जो हमें जीवन पथ के कठिन मोड़ पर उचित दिशा निर्देश करते हैं। बुजुर्ग घर का मुखिया होता है इस कारण वह बच्चों को कोई गलत कार्य करते हुए देखते हैं तो सहन नहीं कर पाते हैं और उनके कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं। जिसे बच्चे पसंद नहीं करते हैं, कई बार बच्चे बुजुर्गों की बातों को अनदेखा कर देते हैं या उलटकर जवाब देते हैं। जिस बुजुर्ग ने अपनी परिवार रूपी बगिया के पौधों को अपने खून पसीने रूपी खाद से सींच कर पल्लवित किया होता है, इस व्यवहार से उनके आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचती है।
एक समय था जब बुजुर्ग को परिवार पर बोझ नहीं बल्कि मार्गदर्शक समझा जाता था और बुज़ुर्गों की तुलना घर की छत से की जाती थी जिसके आश्रय में परिवार के सभी सदस्य सुरक्षित महसूस करते थे, लेकिन आज वही छत अपनी सुरक्षा की तलाश में भटक रही है। टूटते संयुक्त परिवार, निज स्वार्थ की बढती भावना, नैतिक और सामजिक जिम्मेदारियों का अवमूल्यन जैसे अनेक कारण हैं जिनके कारण बुजुर्गों को आज परिवार में वो अहम स्थान नही मिल रहा जिनके वो असल में हकदार हैं।
आधुनिक जीवन शैली, पीढ़ियों के विचारों में भिन्नता आदि के कारण आजकल की युवा पीढ़ी निष्ठुर और कर्तव्यहीन हो गई है जिसका खामियाजा बुजुर्गों को भुगतना पड़ता है। बुजुर्गों का जीवन अनुभवों से भरा पड़ा होता है, उन्होंने जीवन में कई धूप-छाँव देखे होते हैं, हमें उनके अनुभवों को जीवन में अपनाना चाहिए।
बुजुर्ग के घर में रहने से नौकरी पेशे वाले माता-पिता अपने बच्चों की देखभाल के प्रति निश्चिंत रहते हैं। बच्चों में बुजुर्ग के सानिध्य में रहने से अच्छे संस्कार पल्लवित होते हैं। बुजुर्गों में चिड़चिड़ाहट उनकी उम्र का तकाजा होता है। वे गलत बात बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, इसलिए परिवार के सदस्यों को उनकी भावनाओं को समझकर ठंडे दिमाग से उनकी बात सुननी चाहिए। सदस्यों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई ऐसी बात न करें जो घर के बुजुर्गों को बुरी लगे।
बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार करने से घर में अशांति बनी रहती है। इस जीवन संध्या में उन्हें आदर व अपनेपन की जरूरत होती है। जीवन के अंतिम पड़ाव में बुजुर्गों को अपनो के प्यार की ज़रूरत होती है, वो चाहते हैं कि बच्चे कुछ समय हमारे साथ बिताऐं। बच्चों की कुछ मज़बूरियां हो सकती हैं, विशेषकर उनकी जो देश-विदेश में रोज़गार के लिये बस गये हैं। लेकिन कुछ ऐसे परिवार भी हैं जिनके बच्चे उसी शहर, कई बार उसी घर में रहते हैं लेकिन उनके पास माता पिता से कुछ समय मिलने और बात करने को छोड़कर हर चीज के लिये समय होता है। बच्चों का यह व्यवहार अक्सर इन बुजुर्गों की मानसिक पीड़ा का कारण बनता है। सब कुछ होते हुए भी अकेलेपन की पीड़ा का दर्द भोगते इन बुजुर्गों की स्थिति सचमुच शोचनीय है।
कुछ बुज़ुर्ग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने सभी सीमित साधन बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में लगा दिए और अपने भविष्य के लिये कुछ नहीं बचा पाए यह सोच कर कि बच्चे अगर अच्छी नोकरी में लग गये तो उन्हें बुढापे में कोई चिंता नहीं होगी। लेकिन बच्चे समर्थ होने पर भी माता पिता को भूल जाएँ और और यह कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड लें कि उनके माता पिता ने जो किया यह उनका फ़र्ज़ था, तो उन माता पिता के दर्द को आप आसानी से समझ सकते हैं। यह सही है कि कानून बच्चों को माता पिता की आर्थिक सहायता के लिये बाध्य कर सकता है, लेकिन कितने माता पिता मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से यह कदम उठाने और अदालतों के चक्कर लगाने में समर्थ हैं ?
बुजुर्गों का परिवार में उत्पीडन, नौकरों द्वारा उनकी हत्या आदि समाचार लगभग रोज ही पढने को मिलतेे हैं।
हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि सभी को एक दिन इस अवस्था से गुजरना है।
बचपन में सुनी एक कहानी याद आती है। एक समृद्ध परिवार में बुज़ुर्ग पिता के साथ दुर्व्यवहार होता था और उनको खाना भी अलग से पत्तल और मिट्टी के कटोरे में दिया जाता था। उस परिवार में एक बच्चा रोज यह देखता था। उसने एक दिन वो पत्तल और मिट्टी का कटोरा पानी से धो कर रख दिया जिसे देखकर उसके पिता ने पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है ? बच्चे ने कहा जब आप बुड्ढे हो जायेंगे तो आपके लिये भी तो खाना खिलाने को पत्तल और मिट्टी के कटोरे की जरूरत पड़ेगी, नए खरीदने में पैसा खर्च करने की बजाय ये धुले हुए पत्तल कटोरे ही आपके काम आ जायेंगे। बच्चे की बात सुनकर पिता की आँखें खुल गयीं और उस दिन से अपने पिता के प्रति उसका व्यवहार बदल गया।
आज के व्यस्त दौर में हम अपने बुजुर्गों की सलाह लेना भूल ही गए हैं। पहले दादी-नानी की कहानियों में साहस के साथ-साथ संदेश भी होता था। उन कहानियों का उद्देश्य बच्चों को मात्र खुश करना नहीं था बल्कि हमें बहुत से संस्कार, रीति- रिवाज, प्रेम और आदरभाव की ओर अग्रसित करना था। आज की पीढ़ी भले ही इंटरनेट के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने में विश्वास रखती है, लेकिन बड़ी -बड़ी नेटवर्किंग साइट्स भी बच्चों को भावनात्मक, सामाजिक एवं आपसी भाईचारे का ज्ञान नहीं दे सकती, जो समय-समय पर बुजुर्ग अपने प्यार और दुलार की बौछार के साथ देते रहते हैं। भले ही आज वर्तमान पीढ़ी के बच्चों को यह बुरा लगता है की उन्हें किसी भी कार्य के लिए घर के बुजुर्ग रोकें–टोकें।
वे इस बात को अपने जीवन के अंदरूनी मामलों में दखल मानते हैं। इसमें सारा दोष आधुनिक युग के समय का ही नहीं है बल्कि माता -पिता द्वारा अपने बच्चों को दिए जाने वाले संस्कारों का अभाव भी इसका एक कारण है। बचपन में बच्चा जब यह देखता है कि उसके माता-पिता अपने बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं तो वह भी वैसा ही व्यवहार अपने माता -पिता के साथ करता है। आज भी कई परिवारों के संस्कारी लोग अपने बड़े बुजुर्गों के आदेशों को एक कानून की तरह मानते हैं। बुजुर्गों द्वारा दी गई प्रेरणा, जीवन में नए बदलाव का एक मुख्य स्रोत बनती है। जो बच्चा आज अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर उनसे संस्कार ग्रहण करता है वह जीवन में कभी भी असफल नहीं होता। हमें अपने व्यस्त समय में से थोड़ा सा समय निकाल कर बुजुर्गों की सेवा में लगाना चाहिए और उनकी सीख पर ध्यान देते हुए उनके द्वारा दिए हुए संस्कारों को अपने जीवन में अपनाने की कोशिश करनी चाहिए।
फल न देगा न सही, छाँव तो देगा तुमको,
पेड़ बूढ़ा ही सही, आंगन में लगा रहने दो ।
(प्रत्यूष शर्मा)