Edited By ,Updated: 02 Jan, 2026 03:43 AM

भारत में 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून लागू करके 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा अनिवार्य कर दी गई थी ताकि पूरे भारत में शत-प्रतिशत साक्षरता दर प्राप्त की जा सके, परंतु यह कानून लागू होने के बावजूद और स्वतंत्रता के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह...
भारत में 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून लागू करके 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा अनिवार्य कर दी गई थी ताकि पूरे भारत में शत-प्रतिशत साक्षरता दर प्राप्त की जा सके, परंतु यह कानून लागू होने के बावजूद और स्वतंत्रता के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सका है। अभी भी लगभग 40 प्रतिशत लोग अशिक्षित या अल्प शिक्षित हैं तथा देश के कई सरकारी स्कूलों में हालात बेहद चिंताजनक बने हुए हैं। अनेक स्कूलों में अध्यापक तो हैं परंतु छात्र नदारद हैं। यद्यपि भारत को विश्व की 10 सबसे तेजी के साथ विकास करने वाली शक्तियों में गिना जाने लगा है, सरकारें बेटियों की शिक्षा और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के विस्तार की बातें करती हैं, परंतु अधिकांश योजनाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं।
हाल ही में संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 10 लाख 13 हजार सरकारी स्कूल हैं। शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 में इनमें से 5149 स्कूलों में एक भी बच्चे ने दाखिला नहीं लिया। अर्थात स्कूलों की बाकायदा बिल्डिंगें, टीचर और क्लासरूम होने के बावजूद उनमें छात्र नदारद थे। 2024-25 के ‘शैक्षणिक वर्ष’ में जीरो एडमिशन वाले स्कूलों में से 70 प्रतिशत से अधिक स्कूल तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में हैं। कई स्कूल ऐसे भी हैं जहां मात्र 5 से 10 बच्चे ही पढ़ रहे हैं। तेलंगाना में ‘जीरो एडमिशन’ वाले लगभग 2081 तथा पश्चिम बंगाल में 1571 स्कूल हैं। इससे स्पष्टï है कि देश के अधिकांश लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए अब सरकारी स्कूलों की बजाय निजी (प्राइवेट) स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं।
‘यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफार्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन प्लस’ के अनुसार ‘तेलंगाना’ के ‘नालगोंडा’ जिले में राज्य के साथ-साथ देश में भी सर्वाधिक 315 जीरो दाखिले वाले (कोई छात्र नहीं) स्कूल दर्ज किए गए। अकेले ‘कोलकाता’ में ही जीरो एडमिशन वाले 211 सरकारी स्कूल हैं। ‘मेदिनीपुर’ में 177 और ‘दक्षिण दिनाजपुर’ में 147 स्कूल हैं। छात्र न होने के बावजूद इन संस्थानों में बड़ी संख्या में कर्मचारी तैनात हैं। देश में 1.44 लाख टीचर 10 से भी कम छात्रों वाले स्कूलों में तैनात हैं। यह संख्या 2022-23 के 1.26 लाख टीचरों की तुलना में कहीं अधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में कम दाखिले वाली इस कैटेगरी के 6703 सरकारी स्कूलों में 27,348 टीचर तथा बिहार में ऐसे 730 स्कूलों के लिए 3600 टीचर तैनात हैं।
हालांकि सरकार ने सरकारी स्कूलों के छात्रों से खाली होने के स्पष्टï कारण नहीं बताए हैं परंतु शिक्षा विशेषज्ञों और नीति सम्बन्धी रिपोर्टों के आधार पर इसके कई संभावित कारण माने जा रहे हैं। इनमें निजी (प्राइवेट) स्कूलों की बढ़ती संख्या और आकर्षण, गांवों से शहरों को पलायन, सरकारी स्कूलों का आपस में विलय, कम छात्र संख्या के कारण सरकारी स्कूलों पर अभिभावकों का भरोसा कम होना, शौचालयों और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी आदि शामिल हैं। ‘मिड डे मील’ जैसी योजनाएं भी बच्चों को सरकारी स्कूलों तक खींच लाने में सफल नहीं हो रहीं। निस्संदेह छात्र रहित स्कूलों पर सरकारी धन का व्यय फिजूलखर्ची ही है। अत: इस सम्बन्ध में पूरी छानबीन तथा जमीनी स्तर पर स्थिति का अध्ययन करके उनमें पाई जाने वाली खामियां दूर करने की आवश्यकता है। ऐसा करके ही भारी मात्रा में हो रही सरकारी धन की बर्बादी रोकी जा सकेगी, अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए प्रेरित होंगे और देश को पूर्ण रूप से शिक्षित बनाने का लक्ष्य हासिल करने में तेजी आएगी।-विजय कुमार