7.8 प्रतिशत विकास दर, लेकिन कहां है खुशहाली?

Edited By Updated: 09 Sep, 2026 03:13 AM

7 8 percent growth rate but where is the prosperity

भारत के पास अब एक नया जादुई आंकड़ा है-7.8 प्रतिशत। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जिसने सरकार को जश्न मनाने की बड़ी वजह दी है। लेकिन ढोल-नगाड़ों की गूंज और जश्न के बीच एक सवाल का जवाब मिलना...

भारत के पास अब एक नया जादुई आंकड़ा है-7.8 प्रतिशत। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जिसने सरकार को जश्न मनाने की बड़ी वजह दी है। लेकिन ढोल-नगाड़ों की गूंज और जश्न के बीच एक सवाल का जवाब मिलना बेहद जरूरी है-आखिर एक आम भारतीय के जीवन में यह आर्थिक विकास कहां दिखाई दे रहा है?

सवाल यह नहीं है कि आंकड़ों की स्प्रैडशीट में क्या दर्ज है, बल्कि सवाल घर के बजट का है। जी.डी.पी. भले ही आसमान छू रही हो लेकिन क्या रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं? क्या वेतन में बढ़ोतरी हो रही है? क्या परिवारों की क्रय शक्ति और खर्च करने योग्य आय बढ़ी है? क्या गरीबी कम हो रही है और मध्यम वर्ग राहत की सांस ले पा रहा है? अगर अर्थव्यवस्था इतनी ही मजबूत स्थिति में है, तो आम जनमानस के लिए आर्थिक सुरक्षा इतनी दुर्लभ क्यों बनी हुई है? और सबसे महत्वपूर्ण-क्या भारतीय पहले से ज्यादा खुशहाल हैं? आंकड़ों और हकीकत का यह अंतर भारत के मध्यम वर्ग में सबसे ज्यादा साफ दिखाई देता है। जी.डी.पी. केवल कुल आर्थिक उत्पादन का माप है, यह इंसानी कल्याण या लोगों के जीवन स्तर को मापने का पैमाना नहीं है। कोई देश ज्यादा कारें बना सकता है, नई सड़कें बिछा सकता है, वित्तीय सेवाओं की बिक्री बढ़ा सकता है और औद्योगिक उत्पादन में रिकॉर्ड कायम कर सकता है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हर घर सुरक्षित हो गया है, विशेषकर तब, जब एक युवा स्नातक एक अदद अच्छी नौकरी के लिए संघर्ष कर रहा हो।

नौकरीपेशा परिवार की बचत बच्चों की भारी-भरकम फीस में खत्म हो रही है, तो वहीं बुजुर्ग पैंशनभोगी इस डर में जी रहे हैं कि कहीं एक मैडिकल एमरजैंसी उनकी जीवनभर की कमाई न बहा ले जाए। लाखों लोग बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवा, बीमा, मकान और बिजली के बढ़ते बिलों को लेकर चिंतित हैं। जी.डी.पी. का आंकड़ा आम आदमी की रातों की नींद और उसकी चिंताओं को नहीं मापता। विडंबना यह है कि मध्यम वर्ग भारत की अर्थव्यवस्था का असली इंजन है लेकिन राजनीति के मैदान में वह बेसहारा नजर आता है। वह कमाता है, खर्च करता है और लगन से टैक्स देता है-आय पर इंकम टैक्स, खपत पर जी.एस.टी., सर्विस टैक्स, रोड टैक्स और साथ ही निजी सुरक्षा, स्कूल फीस और इलाज का खर्च खुद उठाता है। बदले में उसे नाममात्र की सबसिडी मिलती है और सुविधाएं वही जर्जर अवस्था में-बढ़े हुए बिल, टूटी सड़कें, गड्ढे, जलभराव और भ्रष्टाचार। उससे उम्मीद की जाती है कि वह आर्थिक विकास का ताली बजाकर स्वागत करे, महंगाई की मार सहे, हर नए डिजिटल नियम का पालन करे और अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए लगातार खर्च करता रहे। इसके साथ ही, उससे यह विचित्र अपेक्षा भी रखी जाती है कि जिन बुनियादी सुविधाओं का वादा राज्य सरकारें करती हैं, उनके लिए वह अपनी जेब से निजी स्तर पर भुगतान करे।

ऐसे में मध्यम वर्ग का आक्रोशित होना स्वाभाविक है, क्योंकि भारत की राजनीति अब वोट बैंक का खेल बनकर रह गई है। हर जाति की गिनती होती है, उन्हें लुभाया जाता है और राहत दी जाती है। गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं हैं, किसानों के पास संगठित दबाव समूह हैं, जातिगत समूहों के पास राजनीतिक गणित है और अमीर वर्गों की अपनी पैठ है। नेता यह सटीक हिसाब बता सकते हैं कि उन्हें किस जाति और समुदाय से कितने वोट चाहिएं। लेकिन जैसे ही मध्यम वर्ग की बात आती है, यह सारा राजनीतिक गणित काम करना बंद कर देता है। मध्यम वर्ग न तो इतना गरीब है कि उसे सीधे कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिया जाए और न ही इतना ताकतवर कि वह अपनी शर्तें मनवा सके। लेकिन उस पर टैक्स विभाग की नजरें बनी रहती हैं। हालात ऐसे बन चुके हैं कि मध्यम वर्ग अब खुद को इस गणराज्य का महज एक ‘ए.टी.एम.’ महसूस करने लगा है।

क्या हमारे नेताओं को बिल चुकाने वाले इस मध्यम वर्ग की बढ़ती जीवनयापन लागत की चिंता है? क्या हमारी राजनीति पूरी तरह से केवल पुनर्वितरण पर केंद्रित हो गई है, जिससे करदाता मध्यम वर्ग को अनदेखा किया जा रहा है? जब सरकार का टैक्स राजस्व रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रहा है, तो सार्वजनिक सुविधाओं में सुधार क्यों नहीं दिख रहा? ‘वल्र्ड हैप्पीनैस रिपोर्ट’ जी.डी.पी. को पूरी तरह खारिज नहीं करती, बल्कि यह स्वीकार करती है कि आय बेहतर जीवन का केवल एक हिस्सा है। सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता और एक सार्थक जीवन जीने की क्षमता भी उतनी ही मायने रखती है।

यदि विकास दर 7.8 प्रतिशत है, तो यह सरकार के लिए केवल जश्न मनाने का अवसर नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर है, जिसका लाभ उठाया जाना चाहिए। मजबूत विकास से निवेश, रोजगार और उच्च आय का सृजन होना चाहिए, ताकि एक सुरक्षित मध्यम वर्ग का निर्माण हो सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मध्यम वर्ग को राष्ट्र निर्माण का केंद्र बताते हैं और टैक्स राहत व ‘ईज ऑफ लिविंग’ का जिक्र करते हैं। लेकिन अगर यह वर्ग इतना ही महत्वपूर्ण है, तो राजनीति में उसकी आवाज इतनी कमजोर क्यों है? आर्थिक विकास की असली परीक्षा यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था कितना उत्पादन करती है, बल्कि यह है कि उस उत्पादन से लोगों के जीवन में क्या बदलाव आता है? कितने नए रोजगार पैदा हुए? परिवारों की क्रय शक्ति का क्या हुआ? क्या उत्पादकता का लाभ वेतन, सामाजिक सुरक्षा, भरोसे और बेहतर अवसर के रूप में आम नागरिकों तक पहुंच रहा है? असली बहस यह नहीं है कि भारत का जी.डी.पी. 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ा या नहीं। असली बहस यह है कि क्या इसके साथ देश का मध्यम वर्ग भी आगे बढ़ा है? क्योंकि कागजों पर तो अर्थव्यवस्था अमीर हो सकती है, लेकिन अवसर, सुरक्षा और उम्मीदों के मामले में नागरिक गरीब रह सकते हैं। एक न एक दिन जी.डी.पी. के आंकड़े को सरकारी फाइलों से निकलकर नागरिक की रसोई, क्लासरूम, कार्यस्थल और उसकी जेब तक पहुंचना ही होगा।-पूनम आई. कौशिश

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