इतिहास का एक अंश : 1951 में बाबासाहेब आंबेडकर की जालंधर यात्रा

Edited By Updated: 29 Oct, 2026 02:27 PM

a fragment of history babasaheb ambedkar visit to jalandhar in 1951

सड़क मार्ग की यह यात्रा अधिकतम 2 घंटे की होनी चाहिए थी, लेकिन इसमें 6 घंटे से अधिक का समय लगा। जनता की भावनाओं का सम्मान करने के लिए आंबेडकर साहब के काफिले को कई स्थानों पर सुनियोजित और स्वतःस्फूर्त रूप से रुकना पड़ा।

27 अक्तूबर, 2026 को बाबासाहेब आंबेडकर की जालंधर की युगप्रवर्तक यात्रा मात्रा के 75 वर्ष पूरे हो गए। यह बड़े सम्मान और गर्व की बात है कि इस यात्रा के दौरान वे न केवल सेठ किशन दास के आवास पर ठहरे और उनसे मिले, बल्कि उन्होंने मेरे पैतृक स्थान, बूटा मंडी-जो तत्कालीन जालंधर शहर के बाहरी इलाके में दलितों का एक प्रमुख केंद्र था, में एक विशाल जनसभा को भी संबोधित किया।

इस विषय पर लिखने की मेरी प्रेरणा बूटा मंडी के आंबेडकर भवन द्वारा इस यात्रा को 27 अक्तूबर को 'स्मृति दिवस' के रूप में मनाने के निर्णय से जागी और यह सर्वथा उचित भी है। यद्यपि नेताजी द्वारा 27 अक्तूबर को बूटा मंडी में (देश के उभरते राजनीतिक परिदृश्य पर) और 28 अक्तूबर को डीएवी कॉलेज में (भारत में संसदीय लोकतंत्र के भविष्य पर) दिए गए भाषण भली-भांति प्रलेखित हैं और आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 1951 में स्वतंत्र भारत गणतंत्र के उदय के समय थे, फिर भी इस यात्रा से जुड़े कुछ ऐसे अनमोल संस्मरण हैं जिन्हें मैंने वर्षों में संजोया है। मौखिक इतिहास के एक अंश के रूप में मैं उनमें से कुछ को यहां सांझा कर रहा हूं। बाबासाहेब आंबेडकर की जालंधर की यह ऐतिहासिक यात्रा बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिवेश के एक अत्यंत महत्वपूर्ण दौर में हुई थी।

अक्तूबर 1951 में बाबासाहेब की जालंधर यात्रा, जिसकी मेजबानी और आयोजन सेठ किशन दास के नेतृत्व में तथा उनके युवा सहयोगियों, के सुलेख, प्रीतम रामदासपुरी, भागमल पागल, करतारा राम मढ़ास सहित अन्य के सहयोग से एआईएससीएफ की पंजाब इकाई द्वारा किया गया था, इसी प्रक्रिया और लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए थी। इस यात्रा से जुड़े कुछ संस्मरण और रोचक तथ्यः बाबासाहेब अमृतसर के राजासांसी (अब श्री गुरु रामदास जी) हवाई अड्डे पर उतरे। वहां उनके अनुयायियों, जिनमें अधिकांश दलित समुदाय के थे, द्वारा उनका ऐसा अभूतपूर्व और भव्य स्वागत किया गया जो किसी आम नागरिक के लिए अकल्पनीय था। एआईएससीएफ ने सड़क मार्ग से जालंधर जाने के सभी प्रबंध किए थे। मेरे साथी बूटा मंडी निवासी और सेठ किशन दास के भतीजे प्रीतम रामदासपुरी उन्हें अपनी निजी सैलून कार में लेकर आए। सुरक्षा स्थिति को देखते हुए, समर्पित कार्यकर्ता प्रीतम रामदासपुरी निजी रिवाल्वर से लैस थे। हवाई अड्डे पर स्वागत पंक्ति में बाबासाहेब के चरण स्पर्श करने वाले युवाओं में डॉ. भगत सिंह भी शामिल थे।

सड़क मार्ग की यह यात्रा अधिकतम 2 घंटे की होनी चाहिए थी, लेकिन इसमें 6 घंटे से अधिक का समय लगा। जनता की भावनाओं का सम्मान करने के लिए आंबेडकर साहब के काफिले को कई स्थानों पर सुनियोजित और स्वतःस्फूर्त रूप से रुकना पड़ा। लोग इतने भावविभोर थे कि वे समकालीन भारत के महानतम सपूतों में से एक की एक झलक पाने के लिए एक-दूसरे पर गिरे जा रहे थे। मेरे पिता सोढी राम, जो उस समय लगभग 25 वर्ष के युवक थे और धन जुटाने वाले एक युवा स्वयंसेवक के रूप में इस यात्रा से जुड़े थे, उन्होंने मुझे बताया कि बूटा मंडी के गुरु रविदास गुरुद्वारे से लेकर आंबेडकर भवन तक, आसपास की विशाल कृषि भूमि पर 7 लाख से अधिक लोग दबे-कुचले और शोषित जनसमूह के मसीहा को देखने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मुझे लगता है कि जालंधर ने अपने सदियों के इतिहास में ऐसा विशाल जनसैलाब कभी नहीं देखा था।

सम्मानित अतिथि के लिए जालंधर के निकट स्थित एक छोटे से कस्बे करतारपुर से गुरुओं की एक विशेष और निर्दिष्ट कुर्सी (चांदी की बनी) लाई गई थी, परंतु बाबासाहेब ने इस दलील के साथ उस कुर्सी पर बैठने से इन्कार कर दिया कि वे एक साधारण व्यक्ति हैं और गरीब व बेसहारा लोगों के विनम्र प्रतिनिधि हैं। लेकिन आयोजकों के अत्यधिक आग्रह पर उन्हें मानना पड़ा, क्योंकि आयोजकों का कहना था कि उनके लिए बाबासाहेब किसी भी अन्य व्यक्ति से अधिक आदरणीय हैं। आंबेडकर ने शाम करीब 4 बजे रैली को संबोधित किया। वे ऐसी भाषा में बोले जिसे आम लोग आसानी से समझ सकते थे। उनकी शैली परिवार के किसी बुजुर्ग द्वारा छोटे सदस्यों को समझाने जैसी थी। आंबेडकर के साथ उनकी पत्नी सविता आंबेडकर, सेठ किशन दास, आर. सी. पाल (सचिव, एससीएफ)

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