Edited By ,Updated: 28 Oct, 2026 06:30 PM

भूटान पूरी दुनिया में चर्चित अपनी फिलॉसफी के लिए है और यह है 'हैप्पीनैस इंडैक्स'। यहां जी.डी.पी. (सकल घरेलू उत्पाद) को महत्व नहीं दिया जाता , जिसके लिए हम सब हैरान-परेशान रहते हैं। भूटान के चौथे राजा जिग्मे वांगचुक ने 'हैप्पीनैस इंडैक्स' के सिद्धांत...
अकु श्रीवास्तव : भूटान पूरी दुनिया में चर्चित अपनी फिलॉसफी के लिए है और यह है 'हैप्पीनैस इंडैक्स'। यहां जी.डी.पी. (सकल घरेलू उत्पाद) को महत्व नहीं दिया जाता , जिसके लिए हम सब हैरान-परेशान रहते हैं। भूटान के चौथे राजा जिग्मे वांगचुक ने 'हैप्पीनैस इंडैक्स' के सिद्धांत को लागू किया। उनका मानना था कि हमारे लिए हमारे नागरिकों की खुशियां ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। भूटान का 'ग्रॉस नैशनल हैप्पीनैस' अपने देश की प्रगति को केवल पैसों या आर्थिक विकास से नहीं मापता है बल्कि यह नागरिकों की खुशहाली और मानसिक संतोष से मापता है।
दरअसल, यह सरकार की नीतियों को तय करने का एक वैज्ञानिक ढांचा भी है। इस ढांचे के पीछे उद्देश्य है कि भूटान की पारंपरिक संस्कृति को बनाए रखा जाए, पर्यावरण संरक्षण के फार्मूले पर लगातार काम किया जाए और यह नजर भी आता है। भूटान दुनिया का अकेला कार्बन नैगेटिव देश है यानी यह देश जितनी कार्बन डाइऑक्साइड पैदा करता है ,उससे ज्यादा वहां के जंगल उसे सोख लेते हैं। इसी भूटान की धरती को छूते ही हवा बदली-सी लगती है।
खुशियों से मापी जाती है तरक्की
पूरे भूटान में आप कहीं भी जाएंं, भूटानियों का अपनी संस्कृति, पहनावे, खान-पान और भाषा के प्रति प्यार कूट-कूट कर दिखता है। उनकी कोशिश होती है कि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग को मिले। हमारी यात्रा में रही गाइड तैशी का मानना था कि हम खुश रहते हैं, होड़ में नहीं रहते और अपनी संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं। हमारी राजशाही सर्वश्रेष्ठ है। कोविड के दौरान जब हमारी देश की आय का मुख्य साधन पर्यटन नगण्य हो गया तो राजा ने ही अपने शेयर बेच हमारी मदद की।
भूटान पहुंचते ही आपको लगता है कि आप धरती के किसी अलग कोने में हैं। हवाएं अलग, हरियाली भरपूर और माहौल बिल्कुल अलग। कोई हबड़-तबड़ नहीं। भारतीयों के लिए वीजा की जरूरत नहीं होती लेकिन इमीग्रेशन में कोई खौफ तो नहीं दिखता। 'कीरा' ड्रैस के साथ युवतियां आपका स्वागत, स्वागत के अंदाज में ही करती हैं। थिम्पू के पास परो हवाई अड्डा आपका स्वागत समानान्तर रूप से बह रही नदी के साथ करता है। थिम्पू तक पहुंचने के बीच में आपको फल और सब्जी की कुछ छोटी दुकानें दिखेंगी और वे भी बड़े करीने से।
अनुशासन, संस्कृति और सादगी में बसी है भूटान की खूबसूरती
अनुशासन तो भूटानियों में कूट-कूट कर दिखेगा। यहां पुलिस तो दिखेगी, ट्रैफिक पुलिस भी दिखेगी, रॉयल भूटान आर्मी भी दिखेगी लेकिन उनका कहीं आतंक नहीं दिखेगा। किसी को कोई जल्दी नहीं। ट्रैफिक नियमों का पूरी तरह से पालन। आम नागरिकों में भी सड़क पार करने की कोई जल्दबाजी नहीं। अपने पांच दिन के प्रवास में हमने किसी गाड़ी को अपनी लेन छोड़कर आगे जाते नहीं देखा और न ही किसी को हॉर्न बजाते सुना।
और हां, ट्रैफिक पुलिस की कड़क वेशभूषा में सजी लड़कियों को ट्रैफिक सम्भालने के लिए बाहों/हाथों का कलात्मकता के साथ प्रयोग करते देखना भी बहुत अच्छा लगा। और अपने महानगरों में दिखनी एकदम बंद हो गई गाडिय़ां जैसे मारुति 800, आल्टो आदि वहां खूब धड़ल्ले से चलती हैं। बड़ी गाडियों को दिखाने की होड़ में भी भूटानी नहीं हैं।
वहां की नम्बर प्लेट्स भी रोचक हैं। क्चक्क- भूटान प्राइवेट , क्चञ्ज- भूटान ट्रैवल्स, क्चत्र- भूटान गवर्नमैंट, क्रक्च्र- रॉयल भूटान आर्मी, क्रक्चक्क- रॉयल भूटान पुलिस, क्रक्चत्र-रॉयल भूटान गार्ड्स के लिए तय हैं। यूं तो भूटान में 20 जिले हैं लेकिन भारत की तरह हर जिले के लिए अलग किस्म की प्लेट का स्थान नहीं। सब 'बी' से हैं यानी भूटान से। भूटान के पास तीन ही सशस्त्र बल हैं जिनमें से रॉयल भूटान गार्ड्स राजवंश की सुरक्षा में तैनात रहते हैं, आर्मी देश की सीमाओं की रक्षा और पुलिस देश के भीतर व्यवस्था बनाए रखती है। यहां भी बताते हैं कि अधिकतर मामले नशा करके झगड़ा करने के ही दर्ज होते हैं। दीवानी-फौजदारी आदि के बहुत कम सुनने में आते हैं।
भूटान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है पर्यटन। लेकिन इसके अतिरिक्त उसने अपनी जल-प्रचुरता का भी सदुपयोग किया है। भारत के सहयोग से उसने अनेक हाइड्रो-पावर प्लांट स्थापित किये हैं। जब बिजली की प्रचुरता होती है, वह भारत को बिजली निर्यात करता है और जब उसके पास स्वयं अभाव होता है तो पुन: भारत ही उसकी मदद करता है। भूटान अपनी दैनिक आवश्यकता की सभी वस्तुएं मुख्यत: भारत से आयात करता है लेकिन जो वस्तुएं वह पैदा करता है उन्हें नहीं, जैसे आलू, चावल, अंडे आदि। भूटान अपने कुटीर उद्योगों को भरपूर प्रोत्साहित करता है, चाहे वस्त्र हों, आभूषण अथवा खान-पान। साथ ही अपनी बनाई हुई बियर तथा व्हिस्की।
सच तो यह है कि भूटान अपने को जीता है। दस-बारह सालों से दुनिया का खुलापन जिस तरह से भारतीयों के समाज की परतों को उलट-पलट रहा है, भूटान में उसकी रफ्तार कम ही है। मोबाइल/इंटरनैट युग का असर भारत जैसा नहीं है, लेकिन है। इसका एक कारण तो यह भी है कि यह भारत से तीन गुना तक ज्यादा महंगा है। युवाओं का विदेश, खासतौर से ऑस्ट्रेलिया के प्रति मोह बढ़ रहा है लेकिन राजतंंत्र के प्रति सम्मान में कमी नहीं है। उसकी भी वजह है कि इलाज के लिए अगर देश में संभावनाएं कम हैं तो भारत में, विशेषकर कोलकाता में, सरकारी खर्च पर व्यवस्थाएं हैं।
भूटान की आबोहवा ऐसी है कि मन वहां रहने को हो जाए लेकिन उसके लिए जो अर्हताएं हैं, वे आसान नहीं। तमाम तकनीकी चीजों के अलावा वहां की भाषा, खान- पान और संस्कृति के साथ राजतंत्र और देश पर अटूट विश्वास जरूरी है। आवेदक को स्थानीय भाषा 'जोंगखा' बोलना, पढऩा और लिखना शानदार तरीके से आना चाहिए। साथ ही भूटान की संस्कृति, रीति-रिवाजों, परम्पराओं का भी ठीक-ठाक तरीके से ज्ञान होना चाहिए। सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय पहनावे की बाध्यता है और स्थानीय खानपान पर विश्वास बहुत जरूरी है। भूटान में लाल तीखी मिर्च की सब्जी नियमित खाई जाती है। हम जैसे लोगों के लिए यह आसान नहीं है।