आई.पी.एस. व राज्य पुलिस अधिकारियों के संबंधों में कटुता

Edited By Updated: 22 Jun, 2026 03:39 AM

bitterness in relations between ips and state police officers

पुलिस विभाग को सुचारू रूप से चलाने के लिए भारतीय स्तर व राज्य स्तर के अधिकारियों को निश्चित अनुपात के आधार पर नियुक्त किया जाता है। दोनों प्रकार के अधिकारी विभाग की गरिमा  व कानून-व्यवस्था बनाए रखने में संगठित  संस्था के रूप में  अपना-अपना योगदान...

पुलिस विभाग को सुचारू रूप से चलाने के लिए भारतीय स्तर व राज्य स्तर के अधिकारियों को निश्चित अनुपात के आधार पर नियुक्त किया जाता है। दोनों प्रकार के अधिकारी विभाग की गरिमा  व कानून-व्यवस्था बनाए रखने में संगठित  संस्था के रूप में  अपना-अपना योगदान निभाते रहते है। दोनों वर्गों के अधिकारियों के संबंधों की बात करें तो कहीं न कहीं कटुता का एहसास होता है, जिसका विवरण इस प्रकार से है: 

1. नियमों  के अनुसार विभाग में सभी महत्वपूर्ण पद, जैसे कि जिला कप्तान, बटालियन कमांडैंट इत्यादि आई.पी.एस. अधिकारियों के लिए ही चिन्हित किए गए हैं, मगर देखा गया है कि राज्य पुलिस अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं से नजदीकियों के कारण जिला कप्तान के पदों पर आसीन हो जाते हैं तथा स्वभाविक है कि आई.पी.एस. अधिकारियों के साथ अन्याय व भेदभाव किया जाता है। कोई भी  आई.पी.एस.  अधिकारी इस संबंध में कहीं भी अपील करने से हिचकिचाता है क्योंकि उसे डर रहता है कि उसके करियर को राजनीतिक लोग खराब न कर दें। 
2. आई.पी.एस. अधिकारियों की ग्रूमिंग व एक्सपोजर निश्चित तौर पर बहुत ऊंचे स्तर का होता है, जिसके फलस्वरूप उनकी सोच व विभाग के प्रति चिन्तन इत्यादि भी ज्यादा होता है।
3. राज्य पुलिस अधिकारियों के लोगों व राजनीतिज्ञों  के साथ घनिष्ठ संबंध होते हैं तथा उनकी आम जनता में पहुंच अधिक होती है और उनमें से कुछ अधिकारी कोई भी अनचाहे काम करने के लिए तैयार रहते हैं।
4. राज्य स्तर के अधिकारियों का सेवाकाल का अनुभव अधिक होता है और ये अधिकारी अधिक व्यवसायी भी होते हैं व सामान्यत: ये लोग आई.पी.एस. अधिकारियों को गाईड करना शुरू कर देते हैं तथा कई आई.पी.एस. अधिकारी तो उनकी उंगलियों पर नाचना शुरू कर देते हैं।

5. किसी आई.पी.एस. अधिकारी को सफल बनाने व गिराने के लिए राज्य स्तर के अधिकारी अहम भूमिका  निभाते हैं, जिनका मीडिया के साथ भी घनिष्ठ व मैत्रीपूर्ण संबंध होता है क्योंकि यह अधिकारी  स्थानीय निवासी होते हैं तथा मीडिया को हर खबर से अवगत कराते रहते हैं। 
6. भारतीय स्तर के अधिकारी को अपनी ईमानदारी व नैतिकता के प्रति  अधिक सचेत इसलिए रहना पड़ता है, क्योंकि उसे पता है कि वह अपनी अनैतिकता के कारण पूरे भारत में बदनाम हो जाएगा, इसलिए वह सीधे तौर पर अवांछित कार्य करने से हिचकिचाता है। यह बात अलग है कि कुछ आई.पी.एस. अधिकारी बिकाऊ माल बन कर राजनीतिज्ञों के तलवे चाटते  रहते हैं तथा भ्रष्टाचार की सारी हदें लांघकर अपनी वर्दी और रैंक को दागदार बनाते रहते हैं।
7. उधर राज्य स्तर के भी कुछ ऐसे अधिकारी होते हैं, जो अपनी कर्मठता,  निष्ठा व ईमानदारी के लिए पूरे विभाग में जाने जाते हैं तथा किसी भी अनुचित कार्य को करने से इंकार कर देते हैं। ऐसे में इन दोनों वर्गों के अधिकारियों में मतभेद  होना स्वाभाविक हो जाता है।

मनोवैज्ञानिक तौर पर राज्य पुलिस अधिकारियों में एक हीन भावना सी उत्पन्न हो जाती है तथा वे अपने पंखों को पूर्णत: खोलकर उडऩा ही भूल जाते हैं। मैंने अपने अनुभवों के आधार पर भी देखा है कि कई समारोहों में आई.पी.एस. व राज्य पुलिस अधिकारी अपने अलग-अलग समूह बनाकर बैठ जाते हैं तथा आई.पी.एस. अधिकारी भी अपनी श्रेष्ठता के कारण उनके साथ ज्यादा मिलते-जुलते नहीं हैं। इसके अतिरिक्त दोनों वर्गों के अधिकारियों में एक वांछित शिष्टाचार व व्यवहार की कमी भी आम तौर पर देखने को मिलती है तथा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं ट्रेनिंग में सिखाए गए अनुशासन को बनाए रखने की कमी जरूर पाई जाती है। कुछ अधिकारी दूसरों की समस्या को अपनी समस्या समझ कर कार्य नहीं करते तथा वास्तव में फरियादी की शिकायत का निवारण हुआ या नहीं का एहसास भी नहीं करते। हमारे समय में हमारे वरिष्ठ अधिकारी हमें शिष्टाचार व ईमानदारी का पाठ पढ़ाते थे तथा हमें रिटायर्ड अधिकारियों के घर शिष्टाचार के नाते जाने के लिए भी बताया जाता था। मगर अब यह सब फरमान ‘पेपर टाइगर’ बन कर रह गए हैं, जोकि विभाग पर कहीं न कहीं बट्टा लगाते हैं।

दोनों वर्गों के अधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ कार्य करना तथा एक-दूसरे को नीचा नहीं दिखाना चाहिए। न जाने किन कारणों से पुलिस विभाग में प्रवेश पाते ही बहुत से अधिकारियों के सिर पर कौन सा दम्भरूपी भूत सवार हो जाता  है कि वे अपने मूलभूत मूल्यों को ताक पर रखकर पुलिस की परम्परागत अपसंस्कृति में बरबस ही ढल जाते हैं। समाज में उच्च कोटि का आदर्श एवं छवि बनाए रखने के लिए उच्चतम  अनुशासन, आचरण, कुशल नेतृत्व व नैतिक बल की आवश्यकता रहती है। अधिकारियों को अपने जमीर को जागृत करना चाहिए तथा जमीर को अनुशासन रूपी चाबुक से उन्हें अपनी प्रतिभा, क्षमता चरित्र-चित्रण को इस तरह से गढऩा चाहिए, जिससे राष्ट्रीय व वैश्विक चुनौतियों का कारगर हल ढूंढा जा सके। दोनों वर्गों के अधिकरियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि शतंरज का खेल समाप्त हो जाने पर राजा व सिपाही एक ही डिब्बे में बन्द करके रख दिए जाते हैं।-राजेन्द्र मोहन शर्मा डी.आई.जी. (रिटायर्ड)
 

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