नहीं रहे उर्दू शायरी का परचम बुलंद करने वाले डा. बशीर बद्र

Edited By Updated: 29 May, 2026 05:11 AM

dr bashir badr who raised the flag of urdu poetry is no more

मेरे परम मित्र, उर्दू के विद्वान सेवानिवृत्त एस.डी.एम. महरूम जनाब बी.एल. सिक्का साहब ने वर्ष 1988 में फाजिल्का में एस.डी.एम. रहते हुए एक अंतर्राष्ट्रीय मुशायरे का आयोजन  करवाया था।

मेरे परम मित्र, उर्दू के विद्वान सेवानिवृत्त एस.डी.एम. महरूम जनाब बी.एल. सिक्का साहब ने वर्ष 1988 में फाजिल्का में एस.डी.एम. रहते हुए एक अंतर्राष्ट्रीय मुशायरे का आयोजन  करवाया था। इस मुशायरे में देश के महान शायरों ने भाग लिया था। मुझे याद है कि उस समय भी डा. बशीर बद्र ने मुशायरा लूट लिया था।
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा, 
इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा।
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, 
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।
मैं खुदा का नाम ले कर पी रहा हूं दोस्तो, 
जहर भी इसमें अगर होगा दवा हो जाएगा।

उनका जन्म 15 फरवरी, 1935 को फैजाबाद (अब अयोध्या) उत्तर प्रदेश में हुआ था। अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, जहां उन्होंने कला में स्नातक की डिग्री पास की। मास्टर ऑफ आटर््स और पीएच.डी. करने के बाद उन्होंने इसी विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में कार्य किया। उन्होंने 17 वर्षों तक मेरठ के कॉलेज में भी सेवा की।
बशीर बद्र (जन्म सैयद मुहम्मद बशीर) ने 7 साल की उम्र में कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। उन्होंने इकई, कुल्लियते बशीर बद्र, आमद, छवि, आहट और देवनागरी लिपि की गजलों का शीर्षक ‘उजाले अपनी यादों के’ नाम से गजलों का संग्रह लिखा। अपने करियर के दौरान उन्होंने 2 किताबें, जिनका शीर्षक था आजादी के बाद उर्दू गजलों का तनकिदी मुताला (स्वतंत्रता के बाद उर्दू गजल का आलोचनात्मक अध्ययन) और ‘20वीं शताब्दी में गजलें’ जो साहित्यिक आलोचना पर केंद्रित थीं, लिखीं।
मुखालिफत (विरोध) से मेरी शख्सियत संवरती है, मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम (सम्मान) करता हूं। मुझे खुदा ने मुझे गजल का दयार बख्शा है, मैं यह सल्तनत मोहब्बत के नाम करता हूं।
उन्होंने अध्यक्ष के रूप में बिहार उर्दू अकादमी में भी काम किया है। खुद अपने बारे में डा. बशीर बद्र कहते हैं, ‘‘मैं गजल का आदमी हूं, गजल से मेरा जन्म-जन्म का साथ है। गजल का फन मेरा फन है, गजल का तजुर्बा मेरा तजुर्बा है। मैं कौन हूं? मेरी तारीफ ङ्क्षहदुस्तान की तारीफ के आस पास है।’’
बशीर साहब जब मेरठ में पढ़ा रहे थे तो उस दौरान वहां साम्प्रदायिक दंगे भड़के और दंगाइयों ने उनका घर जला डाला, घर के साथ ही उनकी लाइब्रेरी भी जला दी गई। उन्होंनेअपनी टीस इस तरह व्यक्त की-लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
उनकी एक गजल के शे’र जो मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत पसंद हैं और जैसे मैंने बहुत सारी महफिलों में डॉ. साहब को याद करते हुए पढ़ा भी है:
जिस दिन से चला हूं मिरी मंजिल पे नजर है,
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।
ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मिरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा।
यारों की मोहब्बत का यकीं कर लिया मैंने,
फूलों में छुपाया हुआ खंजर नहीं देखा।
महबूब का घर हो कि बुजुर्गों की जमीनें,
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा।
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूं उसने मुझे छू कर नहीं देखा।
देखिए जिंदगी की सच्चाई को इस अजीम शायर ने किस तरह बयान किया है :
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।

जगजीत सिंह द्वारा गाई गई गजल ‘न जी भर के देखा न कुछ बात की, बारी आरजू थी मुलाकात की’ भी इसी महबूब शायर ने लिखी थी।
क्या सितम है कि जमाने की यादों में उजाले भरने वाले इस शायर की जिन्दगी की शाम में यादों के उजाले भी इनका साथ छोड़ गए। जिंदगी के अंतिम पड़ाव में आकर यह शायर अपने ही अशआर याद नहीं कर पाया। डिमेंशिया से जूझ रहे बशीर बद्र साहब को देखकर जाने कितने ख्याल जेहन से गुजरते थे लेकिन बीमारी और डिमेंशिया के बाद भी एक बात जो महसूस होती है, वह यह कि इस शख्स ने मोहब्बत बे-इंतिहा की। बशीर बद्र की मोहब्बत महसूस करने के लिए उनकी शायरी पढऩा जरूरी नहीं है, कोई उनकी जिंदगी भी देख ले तो उसे एहसास होगा कि मोहब्बत को जीना क्या होता है।
मुझे तुम से मोहब्बत हो गई है,
ये दुनिया खूबसूरत हो गई है।
खुदा से रोज तुम को मांगता हूं,
मेरी चाहत इबादत हो गई है।
वो चेहरा चांद है, आंखें सितारे,
जमीं फूलों की जन्नत हो गई है।
बहुत दिन से तुम्हें देखा नहीं है,
चले भी आओ मुद्दत हो गई है।
और साथ में यह भी कहा :
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला, 
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।

बशीर के साथ एक वाक्या और है जो उनके बारे में गहराई से बताता है। उन्हें पद्मश्री मिलने वाला था मगर बशीर को उस वक्त मुल्क के बाहर चल रहे एक मुशायरे में जाना पड़ा, सम्मान लेने के लिए बशीर बद्र राष्ट्रपति के सामने हाजिर नहीं हो सके, उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुशायरे का वादा वो पहले ही कर चुके थे और उन्हें इतनी मोहब्बत से बुलाया गया था, पद्मश्री तो घर आ गया मगर उन लोगों की मोहब्बत घर कैसे आती जो उनका इतनी दूर इंतजार कर रहे थे।
शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा हो जिसने यह शे’र न सुना हो। बहुत बार डा. बशीर बद्र ने इसे अपनी कई गजलों में इस्तेमाल किया :
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
बशीर बद्र शायरी के उन पैमानों को स्थापित करते हैं जहां आसान शब्दों में गहरी बात कह दी जाती है। ऐसे शायर ही लोगों के दिलों तक का सफर कर पाते हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि बशीर बद्र भी लोगों के शायर हैं, जिन्हें आम से खास हर कोई पसंद करता है। न जाने कितनी बार अपनी बात कहने के लिए बशीर साहब को संसद में भी पढ़ा जा चुका है।
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये 
गुंजाइश रहे, 
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो 
शॄमन्दा न हों।
उनका यह पैगाम भी लोगों तक पहुंचे :
सच सियासत से अदालत तक मसरूफ बहुत है,
झूठ बोलो, झूठ में अब भी मोहब्बत बहुत है।
सात सन्दूकों में भर कर दफन कर दो नफरतें, 
आज इंसां को मोहब्बत की ज़रूरत बहुत है।
गुलाबों की तरह शबनम में अपना दिल भिगोते हैं, 
मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं।
उर्दू की शायरी का परचम बुलंद करने वाले और उर्दू शायरी को दुनिया के कोने-कोने में पहुंचाने वाले इस महान शायर ने आज 28 मई को इस फना संसार को अलविदा कह दिया।-प्रफुल्ल चंद्र नागपाल
 

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