खेत मेरे गांव के...

Edited By Updated: 27 Sep, 2019 03:26 AM

farm in my village

मौसमी माहिरों ने डरा दिया है कि सितम्बर से पंजाब में तेज बारिश, आंधियां और कहीं ओले भी पड़ेंगे। अक्तूबर तक मौसम खराब ही रहेगा। यह कालम लिखते समय लाहौर की ओर से बादल चढ़ रहा है। धान की फसल सिट्टे निकाल रही है। खेतों में एकसार खड़े धान पर यदि...

मौसमी माहिरों ने डरा दिया है कि सितम्बर से पंजाब में तेज बारिश, आंधियां और कहीं ओले भी पड़ेंगे। अक्तूबर तक मौसम खराब ही रहेगा। यह कालम लिखते समय लाहौर की ओर से बादल चढ़ रहा है। धान की फसल सिट्टे निकाल रही है। खेतों में एकसार खड़े धान पर यदि सीधी-सपाट व उड़ती नजर डालें और इसकी हरियाली को आंखों में भर लें तो लगता है कि कुदरत ने हमें हरियाली से लदी एक बहुत लम्बी तथा चौड़ी चादर सौगात के तौर पर दी है, जिसके आखिरी सिरे तक भी देखते न उकताहट और न ही थकावट नजदीक आए। आंखों को ठंडक पड़ती है। 

मन चाहे मैं पंछी होऊं और कभी न समाप्त होने वाली एक लम्बी उड़ान इस हरी-भरी चादर के ऊपर से भरूं तथा उड़ता ही रहूं, मस्ती में पंख फडफ़ड़ाऊं व मनमर्जी का गीत गाऊं। पर मेरी किस्मत में तूने यह कहां लिखा है कुदरत, मेरा पंछी होना, हरियाली चादर पर उडऩा-खेलना, गाना तथा मस्ताना। कितने प्यारे तथा भाग्यशाली हैं ये पंछी जो छोटे-छोटे पंखों से लम्बी उड़ान भरने वाले, हरी चादर पर उड़ते चहक रहे हैं, गा रहे हैं तथा सुबह की मीठी-मीठी ठंडक को रमणीक बना रहे हैं। 

सूए के किनारे पर खड़ा देख रहा हूं कि इसमें लाल मिट्टी के रंग का पानी ऊपर तक भर कर बहता जा रहा है, पीछे सूखते दरियाओं ने जैसे सबक देकर बहने के लिए भेजा हो कि जा धान की फसल को ताकतवर कर और भर-भर कर बह। अब किसानों को इस पानी की उतनी जरूरत नहीं। धान सिट्टे निकाल कर खड़ा है और किसान इंतजार कर रहे हैं धान के खेतों से पानी सूखने का। स्प्रे जोर-शोर से हो रहे हैं और धान अच्छा निकालने के लिए खादों के कई-कई बोरे फैंके गए हैं। 

दूर तक देखा, हमारे गांव की बूढ़ी दलित महिलाएं झुक-झुक कर धान से गंदगी निकाल रही हैं। ये आधी दिहाड़ी लगाएंगी और जब सूरज ने आंखें दिखानी शुरू कर दीं तो पसीने से भीगी घरों को लौट आएंगी। मुझे उन पर तरस आता है मगर अफसोस है कि मन मसोसने के अतिरिक्त इनके लिए कुछ नहीं कर सकता। यदि मैं कुछ करने के काबिल होता तो अपनी मां, दादी तथा ताइयों की जगह लगती मजदूरनों के लिए कुछ जरूर करता मगर मेरे बस में नहीं। 

जब कभी हल्की काली बदली बन कर उडऩे लगती है तो किसान फिक्र करने लगते हैं-‘रब्बा, अब और जरूरत नहीं, बस अब तो मेहर ही रख।’ किसान अपने छोटे बच्चों से मानसून की हवाओं बारे पूछते हैं कि पीछे लौट गई हैं कि नहीं या अभी यहीं पर गेड़े लगा रही हैं। लड़को, देखो तो तुम्हारा फोन क्या कहता है...डर लगता है कि कहीं मरजाणियां कणियां न आ जाएं अब...। आज की सैर से लौटते हुए मैं हरी-भरी चादर को आंखों में भर कर लौटा हूं, कभी-कभी मन हरा-भरा करने के लिए इस हरियाली चादर को आंखों के आगे बार-बार साकार करूंगा।-मेरा डायरीनामा निन्दर घुगियाणवी
 

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