Edited By ,Updated: 19 Dec, 2020 05:00 AM

किसान या जो लोग खेतीबाड़ी और इससे जुड़े काम और व्यवसाय से जुड़े हैं, उन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है, एक वे जो बहुत समृद्ध और खुशहाल हैं और दूसरे वे जिनकी आमदनी इतनी नहीं होती कि उनका गुजारा भी ठीक से हो सके। हमेशा कर्जदार बने रहते हैं, गरीबी के...
किसान या जो लोग खेतीबाड़ी और इससे जुड़े काम और व्यवसाय से जुड़े हैं, उन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है, एक वे जो बहुत समृद्ध और खुशहाल हैं और दूसरे वे जिनकी आमदनी इतनी नहीं होती कि उनका गुजारा भी ठीक से हो सके। हमेशा कर्जदार बने रहते हैं, गरीबी के कारण अपने बच्चों को भी खेतीबाड़ी न करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, कहीं दूसरा काम खोजने के लिए कहते हैं, चाहे अपना घर-बार छोड़कर किसी शहर में छोटी-मोटी नौकरी ही क्यों न करनी पड़े।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो आज सम्पन्न है उसने अपनी जमीन, उसकी मिट्टी को आदर सम्मान दिया, उसकी देखभाल अपने कुनबे की तरह की और उसे पोषक तत्वों की खुराक से ताकतवर बनाए रखा तथा पूरा ध्यान रखा कि जमीन को न तो किसी तरह की बीमारी लगे और न ही उसकी उपज में कमी हो। वे जानते थे कि खुशहाल होने पर ही उनका सम्मान होगा। इसके विपरीत विपन्न किसान ने ज्यादातर अपनी जमीन और खेतीबाड़ी को रामभरोसे छोड़ दिया, देखभाल और पौष्टिकता के अभाव में उसे बंजर हो जाने दिया, उपजाऊपन खत्म होता दिखने पर भी जमीन का इलाज नहीं किया। जमीन लावारिस होकर सरकार की किसी भूमि अधिग्रहण योजना का इंतजार करने लगी ताकि उस पर कोई सड़क, हाईवे बन सके या कोई उद्योग लग सके या उसके एवज में उसके मालिक को मुआवजा मिल जाए।
हमारे देश में लगभग 130 मिलियन हैक्टेयर जमीन इस समय बंजर या मरुस्थल का रूप ले चुकी है जो कुल कृषि भूमि का आधे से भी अधिक है। सरकार के वायदे के अनुसार इसे 2030 तक कृषि योग्य बनाना होगा क्योंकि ऐसा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करने के लिए जरूरी है और दबाव तथा चेतावनी भी कि यदि ऐसा न हुआ तो देश में भारी संकट आ सकता है। हमारे देश में खेतीबाड़ी की दृष्टि से जो उन्नत प्रदेश हैं उनमें सबसे पहले पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के राज्य हैं।
समस्या की दृष्टि से राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर और कर्नाटक हैं जहां प्राकृतिक और मानवीय दोनों ही कारणों से जमीन से उतना लाभ नहीं मिलता जितना अपेक्षित है। यह कोई कहावत नहीं बल्कि हकीकत है कि पंजाब और हरियाणा के जाट कहीं भी जाकर खेतीबाड़ी करें, वहां की जमीन उपजाऊ और उस इलाके को चमन न बना दें तो अपना नाम बदलवा लें। जो किसान यह समझते हैं कि सही देखभाल न होने से जमीन इंसान की तरह बीमार पड़ सकती है, उसका इलाज करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। घर में किसी के अस्वस्थ होने का पता मुखिया को तुरंत चल जाता है। उसी तरह किसान को भी अपनी जमीन और उसमें होने वाली फसल में किसी भी तरह का रोग होने का अहसास हो जाता है।
किसान अगर खेतीबाड़ी को एक उद्योग की तरह मानकर अपनी जमीन पर खेती करे तो किसी के आगे झुकना नहीं पड़ेगा बल्कि वह मोहताज कहलाना तो दूर, किसी भी उद्योगपति से आॢथक दृष्टि से बराबरी कर सकता है। जिन क्षेत्रों में कृषि भूमि बदतर हालत में है उसका प्रमुख कारण पानी है जो कभी वर्षा अधिक होने के कारण बाढ़ बनकर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी की परत को बहाकर ले जाता है और कभी कम या बिल्कुल नहीं होने पर सूखे की स्थिति पैदा कर देता है और जमीन प्यासी रहकर कुछ भी उगाने के लायक नहीं रहती।
कृषि वैज्ञानिकों ने संरक्षण खेती अथवा कंजर्वेशन एग्रीकल्चर के रूप में काफी समय पहले किसान को एक विकल्प दिया था। इस तरह की खेती का महत्वपूर्ण पक्ष जीरो टिलेज है जिसमें काफी कम लागत की मशीन से जुताई किए बिना बीजारोपण होता है। नीचे एक खुरपा लगा होता है जो जमीन की उतनी खुदाई करता है जितने में बीज समा जाए और फिर उसके बाद खेत में जो छीजन है वह उसे ढंक लेती है। इस तरह दो काम हो जाते हैं, बिना जुताई किए बुआई हो गई और छीजन या पराली जलाने की नौबत नहीं आई और वायु प्रदूषण के आरोप से बच गए। जमीन को उपजाऊ बनाए रखने के लिए कृषि वैज्ञानिकों और अनुभवी किसानों तथा जानकारों के अनुसार वाटर शैड मैनेजमैंट और वाटर हार्वेसिं्टग के जरिए जल संरक्षण और जल भंडारण के लिए बनाए गए जलाशयों, तालाबों के निर्माण और उनके रखरखाव के लिए समुचित योजनाएं बनाकर उन पर अमल किया जाए तो स्थाई रूप से किसान की अधिकतर समस्याएं हल हो सकती हैं।
सरकार की उदासीनता
असल में हमारे यहां दिक्कत यह है कि सरकार अपने पास खेती की नई तकनीक और टैक्नोलॉजी के होते हुए भी किसान तक पहुंचा नहीं पाती। किसान की आमदनी बढ़ाने की बात तो की जाती है लेकिन उसके लिए कोई कमिटमैंट न होने से किसान पुराने तरीकों से ही खेतीबाड़ी करता रहता है। अगर हमें अपनी खेतीबाड़ी के लिए निर्धारित जमीन को पूरी तरह से अगले दस वर्ष में बंजर और मरुस्थल बनने से रोक कर अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरना है, पूरी कृषि भूमि को उपजाऊ बनाना है तो उसके लिए अभी से इस तरह के उपाय करने होंगे जिनके सुखद और दूरगामी परिणाम हों।-पूरन चंद सरीन