अग्रिकांड कोई आकस्मिक दुर्घटनाएं नहीं, संस्थागत विफलताएं हैं

Edited By Updated: 29 Jun, 2026 02:23 AM

fire incidents are not accidental incidents they are institutional failures

भारत में बार-बार होने वाली आग की त्रासदियां कोई आकस्मिक दुर्घटनाएं नहीं हैं। वे संस्थागत विफलता का एक ऐसा परिणाम हैं, जिसे पहले से देखा जा सकता था-आधिकारिक उपेक्षा द्वारा बर्दाश्त किया गया अवैध निर्माण, जिसे भ्रष्टाचार ने बढ़ावा दिया और कमजोर...

भारत में बार-बार होने वाली आग की त्रासदियां कोई आकस्मिक दुर्घटनाएं नहीं हैं। वे संस्थागत विफलता का एक ऐसा परिणाम हैं, जिसे पहले से देखा जा सकता था-आधिकारिक उपेक्षा द्वारा बर्दाश्त किया गया अवैध निर्माण, जिसे भ्रष्टाचार ने बढ़ावा दिया और कमजोर प्रवर्तन ने संरक्षण दिया। हर बार जब कोई आग किसी भीड़-भाड़ वाले बाजार, घने आवासीय ब्लॉक या अवैध रूप से बढ़ाई गई व्यावसायिक इमारत को अपनी चपेट में लेती है, तो देश की प्रतिक्रिया एक जैसी ही होती है-सदमा, दुख, गुस्सा और फिर खामोशी। दर्जनों लोग मारे जाते हैं, परिवार तबाह हो जाते हैं, आजीविका राख में मिल जाती है और करोड़ों रुपए की संपत्ति मलबे में तब्दील हो जाती है। 

टैलीविजन कैमरे आते हैं, राजनेता कार्रवाई का वादा करते हैं, बुलडोजर नाटकीय रूप से चलते हैं और नागरिक एजैंसियां अचानक उन उल्लंघनों को ढूंढ निकालती हैं, जो स्पष्ट रूप से वर्षों से अदृश्य बने हुए थे। लेकिन असली सवाल सीधा है-राज्य हमेशा चिताओं के ठंडी होने के बाद ही क्यों जागता है? इसका जवाब असहज करने वाला लेकिन स्पष्ट है, क्योंकि निर्माण में अवैधता को उपेक्षा, समझौते और भ्रष्टाचार के माध्यम से संस्थागत रूप दे दिया गया है।

भारत के किसी भी घनी आबादी वाले व्यावसायिक या आवासीय क्लस्टर में चले जाइए, वहां के खतरे नंगी आंखों से दिखाई दे जाएंगे। पार्क किए गए वाहनों से भरी संकरी गलियां, खतरनाक रूप से नीचे लटकती बिजली की तारें, स्वीकृत सीमाओं से आगे मंजिल दर मंजिल ऊंची उठती इमारतें, सड़कों पर फैलती दुकानें और कहीं भी कोई स्पष्ट आपातकालीन निकास नहीं। एक घर गोदाम में बदल जाता है, फिर एक मिनी-फैक्ट्री में, फिर एक शॉपिंग कॉम्प्लैक्स में। पूरे के पूरे पड़ोस आग के जाल में विकसित हो जाते हैं। यह बदलाव रातों-रात नहीं होता। इसमें महीनों, कभी-कभी साल लग जाते हैं। तो नगर निगम के अधिकारी, नगर योजनाकार, बिजली बोर्ड के निरीक्षक, जल बोर्ड के इंजीनियर और अग्निशमन विभाग कहां हैं? आपदा आने के बाद की जाने वाली रस्मी प्रतिक्रिया स्थिति को और अधिक क्रोधित करने वाली बनाती है। अचानक, अवैध संपत्तियों को सील करने, बिजली की लाइनें काटने, आपराधिक मामले दर्ज करने और संरचनाओं को गिराने के लिए बुलडोजर भेजने की बातें होने लगती हैं। लेकिन जो जानें चली गईं उन्हें वापस नहीं लाया जा सकता और उस सदमे को मिटाया नहीं जा सकता। 

किसी भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के खुलने से पहले कुछ स्वीकृतियां होनी चाहिएं-अग्नि सुरक्षा प्रमाण पत्र, ऑक्यूपैंसी सर्टीफिकेट, बिजली लोड की अनुमतियां, पानी के कनैक्शन। फिर भी हजारों व्यवसाय उनके बिना या जाली, समय-सीमा समाप्त या हेरफेर किए गए दस्तावेजों के साथ चलते हैं। कैसे? क्योंकि भ्रष्ट व्यवस्था इसकी अनुमति देती है। पैसे का लेन-देन होता है। इन सभी लोगों और प्रशासन को, जिन्होंने इन इमारतों को बनने दिया, तुरंत अभियोजित किया जाना चाहिए। सजा सख्त होनी चाहिए क्योंकि आखिरकार किसी अपने प्रियजन को खोना किसी के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी होती है। 

खराब वायरिंग से एक ङ्क्षचगारी, एक गैस सिलैंडर का धमाका, एक खचाखच भरी दुकान में एक शॉर्ट सॢकट और कुछ ही मिनटों में एक भीषण आग फैल जाती है। कई त्रासदियों में, आग खुद उतने लोगों को नहीं मारती, जितने लोग दम घुटने और देर से हुए बचाव कार्य के कारण मर जाते हैं। सबसे दुखद बात यह है कि इसमें से कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। अग्नि विशेषज्ञों ने दशकों से मिश्रित उपयोग वाली भीड़भाड़ वाली इमारतों के बारे में चेतावनी दी है। नागरिक निकायों को पता है कि कौन से क्षेत्र गैर-अनुपालन वाले हैं। सैटेलाइट इमेजरी अनधिकृत वॢटकल विकास को प्रकट कर सकती है। डिजिटल मैपिंग जोखिम वाले क्लस्टर्स की पहचान कर सकती है। तकनीक मौजूद है। कानून मौजूद हैं। समस्या ज्ञान की कमी नहीं है, यह इच्छाशक्ति की कमी है। त्रासदी के बाद एक बुलडोजर सुर्खियां बटोरता है। उससे पहले किया गया एक सख्त निरीक्षण सुॢखयां नहीं बटोरता। मैंने व्यक्तिगत रूप से शिमला में हमारे घर में लगी आग में एक बहुत बड़ा नुकसान झेला है। यह एक वी.वी.आई.पी. इलाका था और मेरे पिता का घर था, जो तत्कालीन मंत्री थे। हमारे कुत्ते जिंदा जल गए और मेरे परिवार के पास जो कुछ भी था, जिसे हमने दशकों से इकट्ठा किया था, वह सब राख में बदल गया। कपड़े, गहने, दुनिया भर से इकट्ठा किए गए स्मृति-चिन्ह, तस्वीरें, एल्बम सब चले गए। हर एक चीज के साथ भावनाएं और जज्बात जुड़े थे। यह एक गरीब आदमी या अमीर के लिए एक जैसा ही है।

समाधान की शुरुआत सहानुभूति से नहीं, जवाबदेही से होनी चाहिए। फाइलों की कडिय़ों को खोला जाना चाहिए। किस अधिकारी ने योजना पर हस्ताक्षर किए? किस इंस्पैक्टर ने अतिरिक्त मंजिलों को नजरअंदाज किया? किस विभाग ने उपयोगिता कनैक्शन को मंजूरी दी? आपदा के बाद निलंबन पर्याप्त नहीं है। यदि लापरवाही साबित होती है तो आपराधिक दायित्व तय होना चाहिए। केवल तभी, जब अधिकारियों को पता होगा कि उन पर मुकद्दमा चलाया जा सकता है, प्रवर्तन का कोई महत्व होगा। दोषियों पर गाज गिरनी चाहिए। बहुमंजिला इमारतों और बाजार क्लस्टर्स के लिए हर साल अग्नि ऑडिट अनिवार्य और सार्वजनिक होने चाहिएं, न कि दशक में एक बार। वह अतिरिक्त कमरा, अवरुद्ध सीढ़ी, बदला हुआ बेसमैंट, ये कोई हानिरहित सुविधाएं नहीं, ये भविष्य के खतरे हैं। शहरों को टिक-टिक करते टाइम बमों की तरह नहीं चलाया जा सकता। नियमन के बिना विकास प्रगति नहीं, यह टाली गई तबाही है। जब तक भारत प्रतिक्रियात्मक सजा से हटकर सक्रिय शासन की ओर नहीं बढ़ता, तब तक यह चक्र चलता रहेगा-और आग, और जनाजे, और बुलडोजर, और वादे।-देवी एम. चेरियन 
 

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