इंडिया गठबंधन में दरारें : एकता बनाम बिखराव

Edited By Updated: 10 Jun, 2026 02:47 AM

fissures in the india coalition unity vs disunity

दलबदल, आहत अहंकार और टूटी वफादारी के इस दौर में, हालिया राज्य चुनावों में तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और माकपा की हार और निराशा के कारण विपक्ष के ‘इंडिया’ ब्लॉक में दरारें और गहरी हो गईं। कल 25 विपक्षी दलों की बैठक में अंदरूनी मतभेद और तनाव और बढ़ गए।...

दलबदल, आहत अहंकार और टूटी वफादारी के इस दौर में, हालिया राज्य चुनावों में तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और माकपा की हार और निराशा के कारण विपक्ष के ‘इंडिया’ ब्लॉक में दरारें और गहरी हो गईं। कल 25 विपक्षी दलों की बैठक में अंदरूनी मतभेद और तनाव और बढ़ गए। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और आर्थिक दबाव जैसे मुद्दों पर भाजपा-विरोधी रुख बनाए रखने के बावजूद गठबंधन की एकता बहुत कमजोर स्थिति में है। यह सब राहुल गांधी के ‘एकजुट रहने पर हम टिके रहेंगे, बंटने पर गिर जाएंगे’ के आह्वान के बावजूद हो रहा है। निश्चित रूप से, गठबंधन में कांग्रेस की केंद्रीय भूमिका पर दबाव बढ़ा है और कुछ सहयोगी दल खुले तौर पर उसके रवैए पर सवाल उठा रहे हैं। इसकी शुरुआत तब हुई, जब द्रमुक ने घोषणा की कि वह लंबे समय से सहयोगी रही कांग्रेस के साथ जगह सांझा करने को तैयार नहीं, जिसने द्रमुक से संबंध तोड़कर विजय की टी.वी.के. से हाथ मिलाया और तमिलनाडु में उनकी सरकार का हिस्सा बनी। आम आदमी पार्टी और विजय की टी.वी.के. भी गठबंधन में शामिल नहीं हैं।

जहां झामुमो झारखंड की 2 राज्यसभा सीटों में से 1 के लिए कांग्रेस द्वारा एकतरफा उम्मीदवार घोषित करने से नाराज है, वहीं माकपा ने पूर्व मुख्यमंत्री विजयन पर हमलों को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है। पश्चिम बंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस और संसद में बागी संकट के बीच, जहां 59 विधायक और 20 सांसद अलग हो गए हैं, वह राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आगे की राह तय करने के लिए संघर्ष कर रही हैं, क्योंकि उनका राजनीतिक अस्तित्व संवैधानिक सत्ता बनाए रखने पर टिका है। कांग्रेस भी तृणमूल कांग्रेस के संकट पर नजर रखे हुए है। तृणमूल कांग्रेस का मामला उन क्षेत्रीय दलों के लिए पीढ़ीगत संकट को उजागर करता है, जिन्होंने पिछले 3 दशकों में करिश्माई नेताओं की बदौलत असाधारण सफलता हासिल की थी, लेकिन अब वे अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। राजद, बीजद, तृणमूल कांग्रेस, शिव सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और द्रमुक जैसी पार्टियां, जो एक मजबूत नेता के इर्द-गिर्द एकजुट होकर बची रहीं, आज उनके सामने एक कठिन विकल्प है, या तो किसी चुने हुए उत्तराधिकारी को कमान सौंपकर बगावत को न्यौता दें, या फिर अपने संस्थापक परिवारों से किनारा कर पार्टी के बिखरने का जोखिम उठाएं। 

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के नाते, क्षेत्रीय पार्टियों को संसद में परिसीमन, संघवाद और केंद्र-राज्य संबंधों जैसे मुद्दों पर उसके साथ तालमेल बिठाना होगा। हालांकि, साथ ही क्षेत्रीय पार्टियां अधिक मुखर भी हो रही हैं। द्रमुक का अलग होना और माकपा की सार्वजनिक आलोचना यह दिखाती है कि सहयोगी दल अब कांग्रेस को गठबंधन के निॢववाद नेता के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इसके अलावा, राज्य-स्तरीय प्रतिद्वंद्विताएं भी अनसुलझी हैं। कांग्रेस केरल में माकपा और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सीधे मुकाबले में है। उत्तर प्रदेश में उसकी और समाजवादी पार्टी की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं और अन्य जगहों पर भी सहयोगियों के साथ उसका टकराव है। इस प्रकार, ये विरोधाभास हमेशा से गठबंधन की संरचनात्मक कमजोरी रहे हैं। जहां तक पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, अखिलेश की सपा या लालू की राजद की बात है, तो गठबंधन को जीवित रखने के लिए उनके पास सबसे मजबूत कारण हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र में विपक्ष की एकता पर काफी हद तक निर्भर है, जहां वह कांग्रेस और ठाकरे की शिव सेना (उद्धव) के साथ मिलकर काम करती है। पवार ने ऐतिहासिक रूप से गठबंधन तोडऩे वाले की बजाय गठबंधन बनाने वाले की भूमिका निभाई है।

सपा को कांग्रेस के साथ तालमेल से बार-बार फायदा हुआ है और वह गठबंधन की केंद्रीय हस्तियों में से एक बनी हुई है। राजद के लिए, राजग के खिलाफ कांग्रेस एक जरूरी सहयोगी है, क्योंकि अलग होने से बिहार में विपक्ष कमजोर हो जाएगा। आगे की बात करें तो 3 मुख्य संभावनाएं हैं-पुनर्गठन, न कि पूरी तरह खत्म होना-भले ही कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी हुई है, लेकिन सपा, राजद, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, झामुमो जैसी क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादा आजादी चाह सकती हैं। दूसरी, एक ढीला-ढाला संसदीय मोर्चा-पार्टियां संसद के अंदर तो तालमेल बनाए रखें लेकिन राज्य चुनावों में अलग-अलग लड़ें। तीसरी, क्षेत्रीय पाॢटयां ऐसे गठबंधन ढांचे की मांग के लिए एकजुट हो सकती हैं जो कांग्रेस पर कम केंद्रित हो। 

यह ‘असहमति के बावजूद एकता’ वाला 
मामला है, न कि ‘बिखराव में एकता’ वाला। क्या यह एक सार्थक राष्ट्रीय गठबंधन के तौर पर टिक पाएगा, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि क्या कांग्रेस द्रमुक, माकपा, झामुमो, और तृणमूल कांग्रेस के साथ रिश्ते सुधार सकती है और गठबंधन को बनाए रखने के लिए मोदी के नेतृत्व वाले राजद को चुनौती देने के एक सांझा लक्ष्य पर कायम रह सकती है? साफ है कि विपक्ष को ऐसी भाषा और तरीका खोजना होगा, जो भाजपा की कुशलता, अलग-अलग आवाजों को उठाने की क्षमता, चुनाव लडऩे की जबरदस्त मशीनरी और उन संसाधनों का मुकाबला कर सके, जिनके दम पर वह अपनी संचार-प्रधानता और छवि बनाए रखती है। निश्चित रूप से, आने वाले दिनों में नैरेटिव कैसे आगे बढ़ता है, इस पर नजर रहेगी।-पूनम आई. कौशिश

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