आग की लपटें और सिस्टम की नाकामी!

Edited By Updated: 26 Jun, 2026 03:32 AM

flames and failure

भारत में हाल के दिनों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जो न केवल जान-माल को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि हमारे प्रशासनिक, नियामक और शहरी नियोजन तंत्र की गहरी खामियों को भी उजागर कर रही हैं। 3 जून, 2026 को दिल्ली के मालवीय नगर में एक बैड एंड...

भारत में हाल के दिनों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जो न केवल जान-माल को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि हमारे प्रशासनिक, नियामक और शहरी नियोजन तंत्र की गहरी खामियों को भी उजागर कर रही हैं। 3 जून, 2026 को दिल्ली के मालवीय नगर में एक बैड एंड ब्रेकफास्ट होटल में लगी आग ने 22 लोगों की जान ले ली, जिनमें 12 विदेशी नागरिक शामिल थे। 22 जून को लखनऊ के अलीगंज में एक कोचिंग सैंटर वाली इमारत में लगी आग ने कम से कम 15 छात्रों की जान ले ली। इससे पहले कोलकाता में एक रेस्तरां की आग, ओडिशा के अस्पताल की घटना और अन्य कई छोटी-बड़ी आग की घटनाएं इस सिलसिले को जारी रखती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के आंकड़ों के अनुसार, हर साल 13,000 से 15,000 लोग आग से संबंधित दुर्घटनाओं में जान गंवाते हैं। सवाल है कि क्या ये महज दुर्घटनाएं हैं, या सिस्टम की नाकामी।

दिल्ली के मालवीय नगर की घटना विशेष रूप से चौंकाने वाली है। एक व्यस्त इलाके में बिना फायर क्लियरैंस के चल रहे होटल में आग लगी, जहां बचाव के रास्ते अवरुद्ध थे, ग्रिल्स लगे हुए थे और इमारत की संरचना नियमों के विपरीत थी। कई पीड़ित ऊपरी मंजिलों से कूदकर बचने की कोशिश में घायल हुए। लखनऊ की घटना भी शॉर्ट शर्किट से शुरू हुई और आग ने ऊपरी मंजिलों पर फंसे छात्रों को जकड़ लिया। डिजिटल लॉक बंद हो गए और फायर एग्जिट व अन्य सेफ्टी साधनों की अनुपस्थिति ने स्थिति को और घातक बना दिया।

गौरतलब है कि इन घटनाओं में एक सांझा पैटर्न दिखता है। अवैध निर्माण, विद्युत ओवरलोडिंग, अवरुद्ध निकास मार्ग, गैर-कार्यशील फायर अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम तथा प्रशासनिक लापरवाही। अस्पतालों, स्कूलों, कोचिंग सैंटरों, होटलों और शॉपिंग कॉम्प्लैक्सों में ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं। 2026 में दिल्ली में ही जनवरी से मई तक 45 लोग आग में मारे गए। ये घटनाएं व्यक्तिगत लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता हैं। सबसे बड़ा दोष निर्माण और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन है। नैशनल बिल्डिंग कोड और स्थानीय निर्माण नियम स्पष्ट रूप से फायर एग्जिट, फायरप्रूफ सामग्री, अलार्म सिस्टम और नियमित ऑडिट की मांग करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण और आॢथक दबाव के कारण अवैध मंजूरी मिल जाती है।

विद्युत सुरक्षा की अनदेखी दूसरी बड़ी समस्या है। पुरानी वायरिंग, ओवरलोडिड सॢकट, खराब रखरखाव वाले ए.सी. और अन्य बिजली उपकरणों की गलत हैंडङ्क्षलग से शॉर्ट सॢकट आम बात है। वहीं अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलैंडर के पास विद्युत उपकरणों का उपयोग और रसोई गैस लीकेज भी जोखिम बढ़ाते हैं। ऐसे में प्रवर्तन तंत्र की कमजोरी सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। फायर विभागों में स्टाफ, उपकरण और वाहनों की भारी कमी है। कई शहरों में फायर टैंडर कई इलाकों तक नहीं पहुंच पाते क्योंकि सड़कें संकरी हैं या वहां पर अवैध कब्जे हैं। न्यायपालिका के आदेश भी कागजी रह जाते हैं। ठेकेदार, मालिक और अधिकारी की मिलीभगत नियमों को दरकिनार करते हैं। परिणामस्वरूप, उपहार सिनेमा (1997), राजकोट गेमिंग जोन, गोवा नाइटक्लब जैसी पुरानी त्रासदियों के सबक बड़ी आसानी से भुला दिए जाते हैं।
इन घटनाओं को रोकने के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है।

जैसे कि, सख्त कानून और प्रवर्तन : सभी सार्वजनिक भवनों का अनिवार्य फायर ऑडिट हर 6 महीने में हो। बिना एन.ओ.सी. के संचालन पर भारी जुर्माना और जेल का प्रावधान हो। बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण : फायर अलार्म, सिं्प्रकलर, स्मोक डिटैक्टर और एमरजैंसी लाइट्स अनिवार्य की जाएं। फायर टैंडरों के लिए चौड़ी सड़कें और पी.सी.आर. की तरह शहर के प्रमुख स्थानों पर तैनाती हो, जिससे आग लगने की स्थिति में जल्द से जल्द पहुंचा जा सके। 

जागरूकता और प्रशिक्षण : स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर नियमित फायर ड्रिल हो। नागरिकों को फायर एक्सटिंग्विशर उपयोग की ट्रेनिंग दी जाए। मीडिया और सोशल मीडिया अभियान भी चलाए जाएं। तकनीकी समाधान : ए.आई.-आधारित फायर डिटैक्शन सिस्टम, स्मार्ट सिटी इंटीग्रेशन और ड्रोन-आधारित निगरानी की जाए। विद्युत विभागों के साथ समन्वय से ओवरलोडिंग रोकी जाए।

जिम्मेदारी तय करना : लापरवाही पर अधिकारियों, मालिकों और ठेकेदारों के खिलाफ तुरंत एफ.आई.आर. और विभागीय कार्रवाई की जाए। इतना ही नहीं, मुआवजे के साथ-साथ दोषियों की संपत्ति भी जब्त की जाए। फंङ्क्षडग और क्षमता निर्माण : सरकारों को चाहिए कि फायर सेवाओं के लिए बजट बढ़ाएं, आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण पर जोर दिया जाए। केंद्रीय और राज्य डिजास्टर मैनेजमैंट को और मजबूत किया जाए।

उल्लेखनीय है कि दुनिया के कई देशों ने ऐसी त्रासदियों से सीखकर अपनी व्यवस्था सुधारी है। यू.के. में 2017 के ग्रेनफेल टावर हादसे में 72 मौतों के बाद वहां पर बिल्डिंग सेफ्टी एक्ट 2022 लाया गया। इसमें जिम्मेदार व्यक्ति की नियुक्ति, कड़े मैटीरियल स्टैंडर्ड और स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य हैं। भारत को भी इसी तर्ज पर स्वतंत्र फायर सेफ्टी अथॉरिटी बनानी चाहिए। सिंगापुर और जापान में सख्त भवन कोड, नियमित फायर ड्रिल और कम्युनिटी लैवल जागरूकता से आग की घटनाएं न्यूनतम हैं। 
जापान में भूकंप-प्रतिरोधी और फायर-रेटार्डेंट निर्माण मानक आदर्श हैं। अमरीका में नैशनल फायर प्रोटैक्शन एसोसिएशन (एन.एफ.पी.ए.) और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हैल्थ एडमिनिस्ट्रेशन (ओ.एस.एच.ए.) नियमों से औद्योगिक और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। ऑस्ट्रेलिया में रिस्क असैसमैंट आधारित अप्रोच अपनाई जाती है। आग की ये घटनाएं भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण के बीच खड़ी दीवार हैं। अगर हम सिस्टम को सुधारने में असफल रहे तो विकास का सपना अधूरा रहेगा।-रजनीश कपूर

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