समृद्धि से संकट तक : पंजाब की बदलती तस्वीर

Edited By Updated: 29 Jun, 2026 03:21 AM

from prosperity to crisis the changing face of punjab

एक समय था जब पंजाब का नाम ही समृद्धि का प्रतीक था। पांच नदियों की इस धरती को केवल विरासत में महानता नहीं मिली थी, बल्कि उसने अपनी मेहनत, बलिदान और भविष्य पर अटूट विश्वास के बल पर यह स्थान बनाया था। वर्ष 2022 में जिस बदलाव का वादा किया गया था, वह आज...

एक समय था जब पंजाब का नाम ही समृद्धि का प्रतीक था। पांच नदियों की इस धरती को केवल विरासत में महानता नहीं मिली थी, बल्कि उसने अपनी मेहनत, बलिदान और भविष्य पर अटूट विश्वास के बल पर यह स्थान बनाया था। वर्ष 2022 में जिस बदलाव का वादा किया गया था, वह आज लोगों को केवल एक अधूरा सपना लगता है। पंजाब आज बढ़ते कर्ज, बिगड़ती सुरक्षा व्यवस्था, उद्योगों के घटते भरोसे और दिशा तलाशती अर्थव्यवस्था से जूझ रहा है। बदलाव का वादा धीरे-धीरे ठहराव में बदल गया है।

1993 में पंजाब के लोगों की प्रति व्यक्ति आय देश में तीसरे स्थान पर थी। आज 15 से अधिक राज्य पंजाब से आगे निकल चुके हैं। यह गिरावट अचानक नहीं आई, बल्कि कई वर्षों से लगातार बढ़ती रही है। वर्ष 1991-92 से 1995-96 के बीच पंजाब की औसत जी.एस.डी.पी. वृद्धि दर 4.36 प्रतिशत थी। जब देश के अन्य बड़े राज्यों ने आर्थिक सुधारों का लाभ उठाकर तेजी से विकास किया, तब वर्ष 2001-02 से 2005-06 के बीच पंजाब की औसत वृद्धि दर घटकर 4.34 प्रतिशत रह गई। इसके बाद कुछ सुधार जरूर हुआ लेकिन उतना नहीं, जिससे राज्य तेज गति से आगे बढ़ सके। आज पंजाब की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का केवल 106.7 प्रतिशत है और इस आधार पर राज्य लगभग 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पीछे है। सबसे बड़ा अंतर हरियाणा के साथ दिखाई देता है। 1966 में पंजाब से अलग बना हरियाणा आज राष्ट्रीय औसत की 176.8 प्रतिशत प्रति व्यक्ति आय हासिल कर चुका है। यह बताता है कि कभी देश के सबसे समृद्ध राज्यों में गिना जाने वाला पंजाब कितना पीछे चला गया है।

राज्य की आर्थिक स्थिति भी ङ्क्षचता बढ़ाने वाली है। जब आम आदमी पार्टी की सरकार बनी थी, तब पंजाब पर लगभग 2.83 लाख करोड़ रुपए का कर्ज था। अब यह बढ़कर लगभग 4.17 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। राज्य का कर्ज-से-जी.एस.डी.पी. अनुपात लगभग 46 प्रतिशत है, जबकि हरियाणा में यह केवल 25.5 प्रतिशत है। पंजाब में प्रति व्यक्ति कर्ज 1.23 लाख रुपए है, जो देश में सबसे अधिक है। स्थिति यह है कि सरकार द्वारा लिए गए हर 100 रुपए में से लगभग 35 रुपए पुराने कर्ज चुकाने में और 50 रुपए केवल ब्याज देने में खर्च हो जाते हैं। विकास कार्यों के लिए केवल 15 रुपए बचते हैं और उनमें से भी पूंजीगत खर्च पर सिर्फ 3.9 प्रतिशत ही खर्च किया जाता है। राज्य की पूरी आय वेतन, पैंशन, ब्याज और सबसिडी में ही समाप्त हो जाती है। स्कूल, सड़क और नई परियोजनाओं के लिए पर्याप्त धन नहीं बचता। जब कोई सरकार अपनी आय से विकास कार्य नहीं कर पाती, तो वह विकास नहीं, बल्कि बढ़ते आॢथक संकट का प्रबंधन कर रही होती है।

जनता से किए गए वादों का भी यही हाल रहा। पंजाब की महिलाओं से हर महीने 1,000 रुपए देने का वादा किया गया था। महिलाओं ने एक साल इंतजार किया, फिर दूसरा, तीसरा और चौथा साल भी बीत गया। आखिरकार मार्च 2026 के बजट में इस योजना की घोषणा की गई और भुगतान की शुरुआत 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तय की गई। 4 वर्षों तक इंतजार कराने के बाद चुनाव से पहले योजना लागू करना कल्याणकारी नीति कम और चुनावी गणित अधिक दिखाई देता है। पंजाब की महिलाओं को समय पर उनका अधिकार नहीं मिला। नशे के खिलाफ भी बड़े-बड़े वादे किए गए थे। कहा गया था कि 4 महीने में पंजाब को नशामुक्त बना दिया जाएगा। यह नारा पूरे राज्य में सुनाई दिया लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदले। नशे से होने वाली मौतें 2023 में 89 थीं, जो 2024 में बढ़कर 106 हो गईं। पंजाब आज भी देश में ड्रग ओवरडोज से होने वाली मौतों में सबसे ऊपर है। कभी जो ‘उड़ता पंजाब’ केवल एक फिल्म का नाम था, वह आज एक गंभीर सच्चाई बन चुका है।

सुरक्षा की स्थिति भी लगातार ङ्क्षचता बढ़ा रही है। सितम्बर 2024 के बाद से पंजाब में पुलिस चौकियों और अन्य स्थानों पर 30 से अधिक ग्रेनेड और विस्फोटक हमले हो चुके हैं। सीमा पार बैठे आई.एस.आई. समॢथत गिरोह और अपराधी-आतंकी नैटवर्क राज्य को अस्थिर करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। उधर पंजाब के उद्योग भी कमजोर पड़ रहे हैं। कभी ‘भारत का मैनचेस्टर’ कहलाने वाला लुधियाना आज निवेश के नए अवसर खोता जा रहा है। निवेश रुक नहीं रहा, बल्कि दूसरे राज्यों की ओर जा रहा है। निवेश वहीं जाता है जहां स्थिर सरकार, स्पष्ट नीतियां, बेहतर प्रशासन और उद्योगों के लिए भरोसे का माहौल हो। उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों ने ऐसा वातावरण तैयार किया है। निवेश भावनाओं से नहीं, भरोसे और स्थिरता से आता है और यही भरोसा पंजाब में कमजोर पड़ता दिखाई देता है।

पश्चिम बंगाल भी कभी देश का प्रमुख औद्योगिक और बौद्धिक केंद्र था। धीरे-धीरे वह लंबे समय तक विकास की दौड़ से पीछे चला गया। पंजाब भी कहीं उसी रास्ते पर न बढ़ जाए, यह ङ्क्षचता का विषय है। बंगाल को बदलाव की आवश्यकता समझने में कई दशक लग गए। पंजाब को यह समझने में इतनी देर नहीं करनी चाहिए। यह पंजाब के लिए दया की अपील नहीं है। पंजाब ने कभी दया नहीं मांगी और उसे इसकी आवश्यकता भी नहीं है। यह केवल इस बात को स्वीकार करने की अपील है कि ‘सरबत दा भला’ की भावना, गुरु नानक देव जी की सेवा, हरित क्रांति की ऐतिहासिक भूमिका और रंगला पंजाब की पहचान रखने वाला यह राज्य इससे कहीं बेहतर शासन का हकदार है। पंजाब के लोगों में आज भी चढ़दी कला की भावना जीवित है। कमी लोगों में नहीं, कमी ऐसे शासन की है, जो उनकी क्षमता और उम्मीदों के अनुरूप काम कर सके।-शहजाद पूनावाला/ रुद्र्राक्ष अनेजा-(राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपा/निदेशक, जियोज्यूरिस्टोडे रिसर्च फाऊंडेशन) 

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