खादी के चरखे से उद्यम के सर्वर तक

Edited By Updated: 27 Jun, 2026 03:11 AM

from the spinning wheel of khadi to the server of enterprise

चरखे को घर-घर पहुंचाकर बापू गांधी ने देश को आत्मनिर्भरता का पहला पाठ पढ़ाया। आज उद्यम पर 6 करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन हैं। पर सच्चाई यह है-बेटा बाप की दुकान या कारखाना संभाल रहा है, बैंक से लोन मांग रहा है, इंस्पैक्टर को ‘चाय’ पिला रहा है। यही...

चरखे को घर-घर पहुंचाकर बापू गांधी ने देश को आत्मनिर्भरता का पहला पाठ पढ़ाया। आज उद्यम पर 6 करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन हैं। पर सच्चाई यह है-बेटा बाप की दुकान या कारखाना संभाल रहा है, बैंक से लोन मांग रहा है, इंस्पैक्टर को ‘चाय’ पिला रहा है। यही एम.एस.एम.ई. की कहानी है, जिसे 27 जून को विश्व दिवस के रूप में मनाया जाता है।

इतिहास की नजर से : अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाए रखने के लिए यहां से कच्चा माल अपने देश ले जाकर पक्का माल बनाकर यहां मनमानी कीमत पर बेचने से शुरुआत की। बड़ी बात यह कि इसका प्रतिकार करने के लिए स्वदेशी आंदोलन और विदेशी कपड़ा जलाओ का नारा दिया गया जो एक लहर के रूप में पूरे देश में गूंज उठा। गांव का जुलाहा, कुम्हार, लोहार, बढ़ई इससे जुड़ा और किसान की खेतीबाड़ी संबंधित जरूरतों को पूरा करने लगा। उसका आंगन कारखाना बन गया, जिसमें जीरो पूंजी पर हुनर सौ प्रतिशत। बापू जब भारत आए और पूरे देश का भ्रमण कर गरीबी को जाना तो चरखा आत्मनिर्भरता का ही नहीं स्वतंत्रता प्राप्ति का हथियार बन गया। लाखों कारीगर और खादी यूनिट खुल गए, जो आज के एम.एस.एम.ई. की नींव बने।

आजादी के बाद लाइसैंस राज शुरू हुआ और सरकार की इजाजत और छत्रछाया के बिना किसी भी हुनरमंद के लिए कुछ भी करना असंभव हो गया। विडंबना यह कि सरकार ने कहा कि छोटे उद्योग देश की रीढ़ हैं लेकिन इतनी बंदिशें कि इनका टूटना शुरू हो गया। 1960 में एस.एस.आई. रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ और इन्वैस्टमैंट लिमिट 5 लाख रुपए रखी लेकिन बिजली कनैक्शन के लिए 2 साल लाइन में लगो। अफसरों की मुठ्ठी भरो और कुछ भी करा लो और यह रिवाज आज तक बदस्तूर चल रहा है। 

1991-2005 : ‘उदारीकरण की सौगात’, 1991 में लाइसैंस राज खत्म। एम.एस.एम.ई. कानून बना, एस.एस.आई. लिमिट 1 करोड़ रुपए हुई। 675 आइटम रिजर्व थे। पर चीन का माल 1995 के बाद बाजार में आ गया। सूरत का डायमंड, तिरुपुर की हौजरी, लुधियाना की मशीन-निर्यात पर निर्भरता।

संख्या 1991 : 20.5 लाख ? 2005 : 1.19 करोड़। 5 गुणा ग्रोथ। 2004 में रिजर्वेशन खत्म। 675 में से 500 आइटम ‘डी-रिजर्व’। बड़े उद्योग ने सीधा वही बनाना शुरू कर दिया जो एम.एस.एम.ई. बनाता था। सरकार ने कहा ‘अब तुम बड़े उद्योगों से टक्कर लो, जो उसके पैरों पर कुल्हाड़ी मारना हुआ। नतीजा, अब तक वह एन्सिलरी मेकर और सप्लायर बना हुआ है। मनमोहन सिंह सरकार में एम.एस.एम.ई. डिवैल्पमैंट एक्ट पास हुआ और पहली बार ‘माइक्रो-स्मॉल-मीडियम’ की डेफिनिशन बनी। मैन्युफैक्चरिंग-सॢवस दोनों। 45 दिन पेमैंट का कानून बना। 2006-07 तक 1.26 करोड़ यूनिट। 11 करोड़ रोजगार और जीविका का साधन। वायदों की झड़ी लग गई। 1 करोड़ तक बिना कोलैटरल लोन, मुद्रा योजना और सबसिडी की लत लगने लगी, जो आत्मघाती सिद्ध हुई।

‘सबसे बड़ा झटका’ : 2016 की नोटबंदी और 2017 में जी.एस.टी.। 35 प्रतिशत माइक्रो एम.एस.एम.ई. का कैश फ्लो 6 महीने बंद। उद्योग आधार पर 90 लाख यूनिट रजिस्टर पर 40 प्रतिशत ‘कागज पर’ ही थे।

नाम मिल गया, इज्जत नहीं : बैंक अभी भी घर की रजिस्ट्री मांगता है, बिना कोलेट्रल लोन मिलने की योजना होते हुए भी सभी बैंक जमीन-जायदाद और बिना गारंटी दिए काम नहीं करते, चाहे कितनी भी गुहार लगा लो। 2020-2026 : उद्यम युग-पंजीकरण हुए लेकिन रोजगार गायब होने लगा। कोविड ने 37 प्रतिशत यूनिट बंद करा दिए लेकिन जून 2026 तक 6.29 करोड़ उद्यम। बढ़त : 3.79 करोड़ 6 साल में। पर ‘एक्टिव’ सिर्फ 3.8 करोड़। 2.5 करोड़ बंद या फर्जी। जेम पोर्टल पर सरकारी खरीद। महिला उद्यमी लगभग एक-चौथाई हो गईं लेकिन उन्हें भी पुरुषों की तरह जद्दोजहद करने से मुक्ति नहीं मिली। 

2022-25 में कच्चा माल 40 प्रतिशत महंगा। साथ में बड़े ब्रांड का प्राइस वॉर। लागत 100 रुपए, रेट  95 रुपए। सौ साल में संख्या 4 लाख से 6 करोड़ हो गई। पर आज भी 98 प्रतिशत ‘माइक्रो’ मोहल्ले की दुकान ही हैं। स्केल नहीं हुआ। खादी ने 10 लाख रोजगार दिए पर तब इज्जत थी, आज 11 करोड़ होने पर भी मदद कहलाती है, अपने पैरों पर खड़ा होकर स्वयं निर्णय नहीं ले सकता, सरकार से पूछना पड़ता है। प्रशासन हो या बैंक, बाबू को मनाना पड़ता है लेबर या कोई भी इंस्पैक्टर ‘दीवाली का बोनस’ लिए बिना नहीं मानता। उद्यमी बाबू और बड़े ब्रांड से लड़ रहा है। चरखे से क्लाऊड तक का सफर किया, पर पेमैंट अभी भी 90 दिन बाद आता है। मतलब कि एम.एस.एम.ई. को ‘सब्सिडी’ नहीं, ‘समान मैदान’ चाहिए, नहीं तो अगले 100 साल भी यही कहानी दोहराई जाएगी।

‘दुनिया की फैक्ट्री बनाम भारत का बटन’ : विदेशों में यूनिट के फेल होने पर सरकार हाथ पकड़ कर दोबारा खड़ा करती है। 2 साल टैक्स माफ। भारत में सिबिल खराब तो 7 साल लोन नहीं। ‘डिफॉल्टर’ का ठप्पा एक बार लगा तो कभी हटता नहीं। विषमता देखिए, चीन ने 40 साल में मछुआरों को अरबपति बना दिया। हमने इतने समय में कारीगर को एक्सपोर्ट लेबर बनाया। फर्क ‘पॉलिसी की नीयत’ का है। चीन का लड़का 25 साल में ड्रोन कंपनी खोल देता है। यहां अपने बाप की 20 मशीन वाली फैक्ट्री संभालता है। अमरीका का बच्चा ए.आई. बनाता है। 

भारत में बड़े ब्रांड का ठप्पा लगाता है और ‘साहब का ऑर्डर’ पूरा करता है। वहां गैराज से गूगल, ऐपल, मेटा, टैस्ला निकल रहे हैं और दुनिया में छा जाते हैं और हम उनमें नौकरी पाकर धन्य हो रहे हैं। वैली में इंजीनियर ‘दुनिया बदलने’ का कोड लिखता है, बेंगलुरु में इंजीनियर ‘क्लाइंट का टिकट’ सॉल्व करता है। फर्क ‘रिस्क लेने की आजादी’ का है। चीन चैंपियन बनाता है, अमरीका इनोवेटर और भारत वैंडर। जब तक एम.एस.एम.ई. को ‘लेबर’ की बजाय ‘लीडर’ नहीं मानेंगे, 6 करोड़ संख्या से जी.डी.पी. नहीं बदलेगी। सरकार उद्यमी बनने को प्रोत्साहन देती है लेकिन सड़े-गले नियमों और कानून का हवाला देकर बेडिय़ों में जकड़ देती है।-पूरन चंद सरीन 
 

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