तलाक की पहल करती लड़कियां

Edited By Updated: 10 Mar, 2026 05:42 AM

girls initiating divorce

हाल ही में बाजार में एक लड़की से मुलाकात हुई। उसकी 3-4 महीने पहले ही शादी हुई थी। उसकी शादी का निमंत्रण भी आया था, लेकिन देश में न होने के कारण जा नहीं सकी थी। लौट कर शगुन देने जरूर उसके माता-पिता के घर गई थी। उससे बातें होने लगीं। पूछा कि उसके पति...

हाल ही में बाजार में एक लड़की से मुलाकात हुई। उसकी 3-4 महीने पहले ही शादी हुई थी। उसकी शादी का निमंत्रण भी आया था, लेकिन देश में न होने के कारण जा नहीं सकी थी। लौट कर शगुन देने जरूर उसके माता-पिता के घर गई थी। उससे बातें होने लगीं। पूछा कि उसके पति और ससुराल वाले ठीक हैं? वह खामोश हो गई। फिर बोली-ठीक ही होंगे। उसकी प्रतिक्रिया से थोड़ी-सी हैरानी हुई। कुछ पूछती, उससे पहले बोली-आंटी मैं अब वहां नहीं रहना चाहती। हमारी शादी नहीं चली। इससे आगे कुछ नहीं पूछा। क्यों नहीं चली, क्या हुआ, यह पूछने का भी कोई फायदा नहीं था। यूं भी किसी के जीवन में क्या गुजरी, उसे खोद-खोदकर नहीं पूछना चाहिए, लेकिन लौटते हुए लगातार सोचती भी रही कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस विवाह में घर वालों का लाखों रुपया और मेहनत लगी होगी, वह कुछ महीने भी नहीं चला। विवाह से पहले लड़का और लड़की मिले भी होंगे। एक-दूसरे को समझने की कोशिश भी की होगी। इस तरह की खबरें आजकल खूब आती भी हैं। कई बार तो लड़कियां किसी बात पर नाराज होकर बारात लौटा देती हैं। कुछ अपने मनपसंद लड़के से विवाह न होने के कारण शादी के दो-चार दिन में ही अपने पुरुष मित्र के साथ चली जाती हैं।

पिछले ही दिनों नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के एक अध्ययन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। उसमें बताया गया था कि  दो दशक पहले जहां भारत में 0.6 प्रतिशत महिलाएं  तलाकशुदा थीं, अब उनकी संख्या 1 प्रतिशत हो गई है। इसी तरह पुणे में हुए एक अध्ययन में बताया गया कि पहले पुरुष तलाक के मामलों में पहल करते थे। 1986-87 में  तलाक के कुल मामले 849 थे। इनमें से 570 पुरुषों द्वारा दायर किए गए थे। यानी कि 68 प्रतिशत। लेकिन अब महिलाएं बड़ी संख्या में इसकी पहल कर रही हैं। यह आंकड़ा 98 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। 

इसका एक बड़ा कारण यह है कि पढ़ी-लिखी महिलाएं जागरूक हैं। वे अपने कानूनी अधिकारों को भी बाखूबी समझती हैं। तलाक के कारणों में प्रमुख हैं-घरेलू ङ्क्षहसा, क्रूरता, व्यभिचार, आए दिन होने वाले झगड़े, मानसिक बीमारी, यौन समस्याएं, धोखा, धार्मिक मतभेद आदि। तलाक के मामलों में महाराष्ट्र सबसे पहले है। उसके बाद कर्नाटक, पश्चिम बंगाल आदि का नम्बर आता है। यदि दुनिया की बात करें, तो सबसे अधिक तलाक मालदीव्ज में होते हैं।  अपने देश में तलाक लेने वाले स्त्री-पुरुषों की उम्र प्राय: 31 और 36 साल होती है। मुम्बई की  एक परिवार अदालत ने अपने अध्ययन में पाया था कि अधिकतर शादियां शादी के 3 साल बाद ही टूट जाती हैं। तलाक मांगने वाली अधिकांश महिलाओं की उम्र 34-35 साल की होती है।

यदि इन आंकड़ों पर ध्यान दें, तो कई बातें सामने आती हैं। जिस उम्र के स्त्री-पुरुष तलाक मांग रहे हैं, उनमें उनकी संख्या ही सबसे ज्यादा है, जिन्हें आप जेन जी के नाम से पुकारते हैं। यह ‘जेन जी’ भूमंडलीकरण और तकनीकी क्रांति के बीच अपने देश में जन्मी है। पढ़ी-लिखी है। हाथ में मोबाइल और सामने कम्प्यूटर होने के कारण, देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है, उसे अच्छी तरह से जानती है।  यूं भी लड़कियों की पहली प्राथमिकता अब विवाह नहीं रहा। वे पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर होना चाहती हैं। कई साल अपनी आर्थिक स्वतंत्रता का आनंद लेना चाहती हैं। इसके बाद ही अगर चाहें, तो विवाह के बारे में सोचती हैं। यदि यह लेखिका अपनी दादी-नानी के बारे में सोचे तो, लड़कियों की यह तस्वीर वह है, जिसकी कल्पना भी वे नहीं कर सकती थीं। उनका जीवन तो देहरी के भीतर ही खत्म हो जाता था। आज के दौर की लड़की को भी यदि उसी पुराने चश्मे से देखा जाएगा, जहां स्त्रियों को घुट्टी में पिलाया जाता था कि जिस घर में डोली जाए, वहीं से अर्थी उठे, तो कहना चाहिए कि इस पुरानी छवि और तस्वीर से इस लड़की को नहीं समझा जा सकता। 

न जाने क्यों ऐसा है कि अब भी बहू की परिकल्पना हमारे समाज में इस तरह की है कि जैसे ही वह ससुराल में कदम रखेगी, सारी जिम्मेदारी उसके सिर पर आ जाएगी। वही घर के सारे काम निपटाएगी। जो पैसे कमा कर लाएगी, वह पति या ससुराल वालों के हाथों सौंप देगी। अपनी किसी भी इच्छा को पूरी करने के बारे में बात तक नहीं करेगी। सबकी खरी-खोटी सुनेगी, मगर उफ नहीं करेगी। तरह-तरह के अपमान और गाली-गलौच को भी मुस्कुराकर सहेगी। या फिल्मों में मीना कुमारी की तरह आंसू बहाएगी। सब कुछ सहते हुए भी घर को छोडऩे के बारे में सोचेगी तक नहीं। यही कारण है कि लड़कियां तलाक की पहल कर रही हैं। यदि बहू की यह परिकल्पना है, तो ऐसी शादी टूटने के लिए अभिशप्त है। क्योंकि बहू का मतलब ऐसा कोई रोबोट नहीं है, जो बिना किसी रिएक्शन के सब कुछ करती रहे। आखिर किसी भी शादी को चलाने की जिम्मेदारी लड़की के कंधों पर ही क्यों होनी चाहिए? सुसराल वालों को उसे किसी ऐसी इकाई की तरह क्यों देखना चाहिए, कि वह बस सबकी सहने के लिए बनी है। कोई भी रिश्ता एकतरफा नहीं होता। वह दोनों ही तरफ से चल सकता है।-क्षमा शर्मा  
 

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