खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान की पी.टी.आई. के लिए परीक्षा

Edited By Updated: 29 Oct, 2026 05:06 AM

imran khan s pti exam in khyber pakhtunkhwa

11 अक्तूबर को खैबर पख्तूनख्वा (के.पी.के.)  में आपातकाल और राज्यपाल शासन लागू किए जाने को इस्लामाबाद द्वारा मुख्य रूप से बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और आतंकवाद से निपटने में प्रांतीय सरकार की विफलता की प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।...

11 अक्तूबर को खैबर पख्तूनख्वा (के.पी.के.)  में आपातकाल और राज्यपाल शासन लागू किए जाने को इस्लामाबाद द्वारा मुख्य रूप से बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और आतंकवाद से निपटने में प्रांतीय सरकार की विफलता की प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। हालांकि, इस आख्यान (नैरेटिव) के पीछे एक बहुत बड़ा मुद्दा छिपा है जो इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पी.टी.आई.), इस प्रांत और खुद संघीय सरकार का भविष्य तय करेगा। मुद्दा यह है कि क्या पी.टी.आई. प्रांत की सरकारी मशीनरी के बिना प्रभावी ढंग से लामबंद हो सकती है और टिकी रह सकती है, या फिर क्या केंद्र वास्तव में उस आतंकवाद पर काबू पा सकता है जब उसने के.पी.के. पर नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है।

संघीय सरकार ने सीधे सैन्य शासन के अतिरिक्त जो सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता था, वह उठा लिया है। संविधान के अनुच्छेद 232 के तहत आपातकाल और अनुच्छेद 234 के तहत राज्यपाल शासन लगाया गया है। यह कदम इस्लामाबाद और के.पी.के. की पी.टी.आई. सरकार के बीच उनके जेल में बंद नेता इमरान खान की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए निकाले जाने वाले ‘लॉन्ग मार्च’ को लेकर हफ्तों चले टकराव के बाद उठाया गया है। इस्लामाबाद ने आतंकवादी हमलों में भारी वृद्धि और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई से प्रांतीय सरकार के ‘जानबूझकर अलग हटने’ का हवाला देकर इस हस्तक्षेप को उचित ठहराया है। हालांकि, इसका समय बहुत कुछ बयां करता है। इस्लामाबाद की ओर पी.टी.आई. के ‘लॉन्ग मार्च’ की बढ़ती रफ्तार ने तात्कालिक राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार की।

के.पी.के. 13 वर्षों से पी.टी.आई. का गढ़ रहा है। पार्टी के लिए इसका महत्व कभी केवल चुनावी नहीं रहा। सरकार के नियंत्रण ने पी.टी.आई. को एक प्रशासनिक ढांचा, राजनीतिक वैधता और सबसे महत्वपूर्ण बात, संघीय सरकार के खिलाफ  प्रतिरोध संगठित करने के लिए एक क्षेत्रीय आधार, तथा जेल में बंद इमरान खान के लिए एक जीवनरेखा प्रदान की। इसलिए, उस मशीनरी का हटना पार्टी के सामने उसकी सबसे गंभीर संगठनात्मक और राजनीतिक परीक्षा प्रस्तुत करता है। पी.टी.आई. ने बार-बार यह प्रदर्शित किया है कि इमरान खान का जनाधार व्यापक बना हुआ है। फिर भी, एक बड़ा वोट बैंक होने और उसे सड़क पर निरंतर लामबंदी में बदलने में सक्षम होने के बीच एक अंतर होता है। इस प्रकार, पी.टी.आई. को पंजाब में अपने समर्थन को स्थायी सड़क शक्ति में बदलने में काफी कठिनाई हुई है। क्या केपीके अलग साबित होगा, यही अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

पी.टी.आई. के लिए सबसे बड़ा नुकसान यह रहा है कि एक असुरक्षित सरकार (अर्थात् सेना) ने इमरान खान तक पहुंच पूरी तरह बंद कर दी है। फिर भी वह के.पी.के. को अपने पास रखकर खुद को बनाए रखने में सक्षम रही। इसलिए, सरकार को हटाने से वह संस्थागत ढांचा हट जाता है जिसके इर्द-गिर्द पी.टी.आई. टिकी हुई थी। अत: पी.टी.आई. के लिए परीक्षा यह होगी कि क्या वह प्रांतीय सरकार के बिना भी लोगों को सड़कों पर लाना जारी रख सकती है। यदि वह ऐसा कर सकती है, तो यह साबित हो जाएगा कि उसकी ताकत वास्तविक है न कि केवल प्रशासनिक। यदि वह ऐसा नहीं कर पाती है, तो केंद्र यह प्रदर्शित करने में सफल हो जाएगा कि राज्य की सत्ता छिन जाने के बाद पी.टी.आई. की राजनीतिक पहुंच काफी सीमित हो जाती है।

पी.टी.आई. ने यह प्रदर्शित किया है कि इमरान खान का जनाधार व्यापक बना हुआ है। फिर भी एक बड़ा वोट बैंक होने और उसे सड़क पर निरंतर लामबंदी में बदलने में सक्षम होने के बीच एक अंतर है। लेकिन यह इस समीकरण का केवल आधा हिस्सा है। इस्लामाबाद के लिए परीक्षा कहीं अधिक कठिन है। सालों से, केपीके में पाकिस्तान की मुख्य समस्या आतंकवाद का बना रहना और उसका विस्तार रहा है, विशेष रूप से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी)। संघीय सरकार ने अब उस प्रमुख राजनीतिक बाधा को हटा दिया है जिसके बारे में उसका कहना था कि वह अधिक सुसंगत आतंकवाद-रोधी नीति में बाधा बन रही थी। सेना को नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए तैनात होने का अधिकार दिया गया है, जबकि केंद्र अब विशेष रूप से आतंकवाद प्रभावित जिलों में बहुत अधिक प्रशासनिक और सुरक्षा नियंत्रण का उपयोग करेगा। यह सफलता के लिए एक सीधा लेकिन क्षमा न करने वाला पैमाना तैयार करता है।

यदि आतंकवाद में कमी आती है, तो इस्लामाबाद यह तर्क दे सकेगा कि पी.टी.आई. सरकार के प्रतिरोध ने वास्तव में उग्रवाद के खिलाफ   लड़ाई में बाधा डाली थी। यदि, हालांकि, आतंकवाद बेरोकटोक जारी रहता है या बढ़ता है, तो केंद्र का आख्यान पूरी तरह विफल हो जाएगा। तब पी.टी.आई. यह तर्क देने में सक्षम होगी कि समस्या कभी भी प्रांतीय शासन नहीं थी। यह देखना दिलचस्प होगा कि संघीय सरकार प्रांत में किस प्रकार की आक्रामक रणनीति अपनाती है।-तिलक देवाशर

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