ईरान युद्ध : भारत के सामने उर्वरक की चुनौती और संभावित समाधान

Edited By Updated: 28 Apr, 2026 05:59 AM

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इस महीने की शुरुआत में, ‘इंडियन पोटाश लिमिटेड’ (आई.पी.एल.) ने 2.5 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया के आयात के लिए एक टैंडर जारी किया था। टैंडर में पश्चिमी तट के लिए $935 डालर प्रति टन और पूर्वी भारतीय बंदरगाहों के लिए $959 डालर प्रति टन, (लागत और माल भाड़ा...

इस महीने की शुरुआत में, ‘इंडियन पोटाश लिमिटेड’ (आई.पी.एल.) ने 2.5 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया के आयात के लिए एक टैंडर जारी किया था। टैंडर में पश्चिमी तट के लिए $935 डालर प्रति टन और पूर्वी भारतीय बंदरगाहों के लिए $959 डालर प्रति टन, (लागत और माल भाड़ा सहित)की न्यूनतम बोली प्राप्त हुई। इसकी तुलना 18 फरवरी को ‘राष्ट्रीय कैमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स’ (आर.सी.एफ.) द्वारा जारी एक टैंडर से करें, जिसने पश्चिमी और पूर्वी तट की डिलीवरी के लिए क्रमश: $508 और $512 डालर प्रति टन की बोलियां प्राप्त की थीं।
यह अंतर (दो महीनों के भीतर कीमतों का लगभग दोगुना होना)28 फरवरी से चल रहे  ‘अमरीका-इसराईल बनाम ईरान संघर्ष’ और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण आए आपूर्ति झटकों को दर्शाता है। यह केवल यूरिया तक सीमित नहीं है। ‘गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर्स एंड कैमिकल्स’ द्वारा हाल ही में आयातित ‘डाइ-अमोनियम फास्फेट (डी.ए.पी.)’ की कीमत लगभग $865 डालर प्रति टन थी, जबकि युद्ध-पूर्व स्तर $720 डालर था और पिछले साल इस समय $680 डालर था। वर्तमान अपेक्षित लैंडेड कीमतें  $925 डालर प्रति टन होने का अनुमान है।

इसी तरह, तैयार उर्वरकों को बनाने में उपयोग किए जाने वाले मध्यवर्ती उत्पादों की कीमतों में भी भारी उछाल आया है। आयातित सल्फर की युद्ध-पूर्व कीमतें $550 डालर प्रति टन थीं (अप्रैल 2025 में $300 डालर), आज ये $900 डालर से कम नहीं हैं। अमोनिया भी इसी तरह $850-900 डालर प्रति टन पर है, जो 2025 में औसतन $435 डालर था।
ईरानी हमलों के बाद  ‘कतर एनर्जी’ और सऊदी अरब की ‘माडेन’ की अमोनिया सुविधाएं बंद हो गई हैं, जिससे हमें मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से स्रोत जुटाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। सऊदी अरब हमारा सबसे बड़ा डी.ए.पी. आपूर्तिकत्र्ता भी था। अब, मोरक्को और जॉर्डन हैं  जिन्हें  दक्षिण अमरीका और अन्य बाजारों की जरूरतों को भी पूरा करना है।

खरीफ की चुनौती : यह सब आगामी ‘खरीफ फसल सीजन’ के लिए चुनौती पैदा कर सकता है, जिसकी बुवाई जून से दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत के साथ शुरू होगी। खरीफ  2026 के लिए यूरिया की कुल आवश्यकता 19.4 मीट्रिक टन थी, जबकि अप्रैल की शुरुआत में वास्तविक उपलब्धता मुश्किल से 5.5 मीट्रिक टन थी।

भारत सालाना 39-40 मीट्रिक टन यूरिया की खपत करता है, जिसमें से 30-31 मीट्रिक टन घरेलू स्तर पर उत्पादित होता है और शेष आयात किया जाता है। खाड़ी सहयोग परिषद (जी.सी.सी.) के देश-ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात  और बहरीन-युद्ध से पहले भारत के यूरिया आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा थे। भारत के द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एल.एन.जी.)  आयात का 60 प्रतिशत से अधिक जो यूरिया के स्वदेशी विनिर्माण के लिए कच्चा माल है, कतर, यू.ए.ई. और ओमान से आता था। हम सामान्य रूप से प्रति माह लगभग 2.5 मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन करते हैं। मार्च में,एल.एन.जी. आपूर्ति में व्यवधान के कारण हम केवल 1.5 मीट्रिक टन ही कर सके।  आई.पी.एल. टैंडर में अनुबंधित 2.5 मीट्रिक टन कार्गो के साथ जहाजों को 14 जून तक रवाना होने के लिए कहा गया था, ताकि खरीफ सीजन के दौरान समय पर पहुंच जाए। आर.सी.एफ. आयात के लिए, अंतिम लोडिंग तिथि (मूल टैंडर के तहत) 31 मार्च से बढ़ाकर 30 अप्रैल करनी पड़ी क्योंकि जहाज या तो उपलब्ध नहीं थे या फारस की खाड़ी में होर्मुज समुद्री चैक प्वॉइंट पर फंसे हुए थे।

‘चुनौती का सामना करना’ : भारत की वार्षिक उर्वरक बिक्री में यूरिया की 55 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिसके बाद डी.ए.पी., एन.पी.के.एस. कॉम्प्लैक्स और एस.एस.पी. का स्थान है। युद्ध के कारण होने वाली कमी से भारी सबसिडी वाले इन उत्पादों, विशेष रूप से यूरिया और डी.ए.पी. की खपत में कमी आ सकती है।यूरिया (जिसमें 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है) के संबंध में, उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख निर्माता ने प्रस्ताव दिया कि सरकार कंपनियों को इन जिंस उर्वरकों को सूक्ष्म पोषक तत्वों (जिंक, लोहा, तांबा, बोरान,मैंगनीज और मोलिब्डेनम) के साथ कोट करने की अनुमति दे और इन संवर्धित उत्पादों को अधिकतम खुदरा मूल्य नियंत्रण से मुक्त रखे।

‘‘हमें यूरिया या डी.ए.पी. को सूक्ष्म पोषक तत्वों या द्वितीयक पोषक तत्वों (सल्फर, कैल्शियम और मैग्नीशियम) के साथ कोट करने की अनुमति दें। किसान अधिक भुगतान करने में संकोच नहीं करेंगे यदि संवर्धित उर्वरकों के परिणामस्वरूप फसल की पैदावार अधिक होती है। उनमें से कई पहले से ही यूरिया के ऊपर जिंक सल्फेट (एक गैर-सबसिडी वाला उर्वरक) का छिड़काव कर रहे हैं। यहां, उन्हें सूक्ष्म पोषक तत्व की एक पतली परत के साथ समान रूप से कोटेड यूरिया मिलेगा। इससे उन्हें अलग से जिंक सल्फेट खरीदने और डालने की लागत से बचत होगी। वर्तमान संकट भारत के उभरते ‘बायोस्टिमुलेंट्स ’ उद्योग के लिए भी एक मौका हो सकता है।-हरीश दामोदरन

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