Edited By ,Updated: 04 May, 2026 03:36 AM

आज की तेजी से बदलती दुनिया में, शिक्षा को अक्सर अंकों, रैंकिंग और प्रतिस्पर्धी सफलता से मापा जाता है। स्कूल गणित, विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों पर भारी ध्यान केंद्रित करते हैं, जो नि:संदेह महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, कई कक्षाओं से धीरे-धीरे कुछ अनिवार्य...
आज की तेजी से बदलती दुनिया में, शिक्षा को अक्सर अंकों, रैंकिंग और प्रतिस्पर्धी सफलता से मापा जाता है। स्कूल गणित, विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों पर भारी ध्यान केंद्रित करते हैं, जो नि:संदेह महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, कई कक्षाओं से धीरे-धीरे कुछ अनिवार्य चीज ओझल हो गई है-मूल्य। पुराने समय में, स्कूलों में ‘मोरल साइंस’ (नैतिक विज्ञान) नामक एक विषय होता था और सुबह की सभाएं अक्सर राष्ट्रगान और एक सरल भजन के साथ शुरू होती थीं। ये केवल अनुष्ठान नहीं थे, इन्होंने युवा दिमागों को आकार देने में एक शांत लेकिन शक्तिशाली भूमिका निभाई। आज की जटिल, डिजिटल दुनिया में बड़े हो रहे बच्चों के लिए इन प्रथाओं को वापस स्कूलों में लाना गहरा सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
मोरल साइंस कभी भी परीक्षा या ग्रेड के बारे में नहीं थी। यह एक अच्छा इंसान बनने के बारे में थी। सरल कहानियों, चर्चाओं और उदाहरणों के माध्यम से बच्चों को ईमानदारी, दया, सम्मान, धैर्य और जिम्मेदारी के साथ देने और सांझा करने की कला सिखाई जाती थी। ये सबक उस समय छोटे लग सकते थे लेकिन वे जीवन भर छात्रों के साथ रहे। उन्होंने बच्चों को सही और गलत के बीच अंतर समझने में मदद की, डर के कारण नहीं, बल्कि समझ और सहानुभूति के कारण। आज के बच्चे बहुत अलग माहौल में बड़े हो रहे हैं। सोशल मीडिया उनके दैनिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा बन गया है। जहां यह ज्ञान और जुड़ाव प्रदान करता है, वहीं उन्हें नकारात्मकता, हिंसा, बदमाशी, अवास्तविक जीवनशैली और निरंतर तुलना के संपर्क में भी लाता है। युवा दिमाग अभी विकसित हो रहे हैं और वे जो देखते और सुनते हैं, उससे आसानी से प्रभावित हो सकते हैं। उचित मार्गदर्शन के बिना, उनके लिए इन प्रभावों को स्वस्थ तरीके से समझना मुश्किल हो जाता है।
यही वह जगह है जहां मोरल साइंस फिर से बदलाव ला सकती है। यह उन्हें साथियों के दबाव को संभालने, असफलता से निपटने और बिना अहंकार के आत्मविश्वास विकसित करने में मदद कर सकती है। यह उन्हें सिखाता है कि सफलता केवल जीतने के बारे में नहीं, बल्कि निष्पक्ष, दयालु और ईमानदार होने के बारे में भी है। सुबह की सभाएं भी दिन की लय तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। दिन की शुरुआत राष्ट्रगान या वंदे मातरम या किसी देशभक्ति गीत के साथ करने से एकता और अपनेपन की भावना पैदा होती है। यह छात्रों को याद दिलाता है कि वे अपने आप से बड़ी किसी चीज (अपने देश) का हिस्सा हैं। यह जबरदस्ती नहीं, बल्कि दैनिक अभ्यास के माध्यम से सम्मान और गर्व की भावना जगाता है। भजन या एक साधारण भक्ति या प्रेरणादायक गीत जोडऩे से युवा दिमागों में शांति और एकाग्रता आ सकती है। विचार एक शांतिपूर्ण क्षण बनाने का है, जहां बच्चे अपना शैक्षणिक कार्य शुरू करने से पहले रुकें, सांस लें और सकारात्मक विचारों से जुड़ें। ऐसी दुनिया में, जहां बच्चे लगातार स्क्रीन और तेज कंटैंट से उत्तेजित रहते हैं, कुछ मिनटों का शांत चिंतन भी बहुत शक्तिशाली हो सकता है।
कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि स्कूलों को केवल शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और ऐसी किसी भी चीज से बचना चाहिए, जो पारंपरिक या पुरानी लगती हो। लेकिन सच तो यह है कि चरित्र निर्माण के बिना शिक्षा अधूरी है। एक बच्चा जो उच्च अंक प्राप्त करता है लेकिन जिसमें सहानुभूति या अखंडता की कमी है, वह वास्तविक जीवन में संघर्ष कर सकता है। दूसरी ओर, एक बच्चा जो मूल्यों को समझता है, भले ही वह पढ़ाई में औसत हो, उसके एक जिम्मेदार और संतुलित वयस्क के रूप में विकसित होने की संभावना अधिक होती है। मोरल साइंस को फिर से शुरू करने का मतलब पीछे जाना नहीं, इसका अर्थ है नींव को मजबूत करना। आधुनिक समय के अनुरूप इस विषय को अपडेट किया जा सकता है। पाठों में डिजिटल जिम्मेदारी, सोशल मीडिया पर सम्मान, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और दैनिक जीवन में दयालुता के महत्व जैसे विषय शामिल किए जा सकते हैं। शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तकों की बजाय वास्तविक जीवन के उदाहरणों, समूह चर्चाओं और गतिविधियों का उपयोग कर सकते हैं।
इसी तरह, सुबह की सभाओं को आकर्षक और समावेशी बनाया जा सकता है। गान और भजन के साथ, छात्र मूल्यों के बारे में छोटे विचार, कहानियां या अनुभव सांझा कर सकते हैं। वे दयालुता, टीम वर्क या ईमानदारी के उन कार्यों के बारे में बात कर सकते हैं, जो उन्होंने देखे या किए हैं। यह भागीदारी को प्रोत्साहित करता है और मूल्यों को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाता है, न कि केवल कक्षा का एक विषय। माता-पिता और शिक्षक दोनों की इसमें भूमिका है। अकेले स्कूल एक बच्चे को पूरी तरह से आकार नहीं दे सकते लेकिन वे एक मजबूत वातावरण बना सकते हैं, जहां अच्छे मूल्यों को प्रोत्साहित और उनका अभ्यास किया जाता है। जब बच्चे स्कूल में सिखाई जाने वाली बातों और घर में मिलने वाले अनुभवों के बीच निरंतरता देखते हैं, तो प्रभाव और भी गहरा हो जाता है। आज की दुनिया में, जहां तनाव, प्रतिस्पर्धा और विकर्षण बढ़ रहे हैं, बच्चों को केवल शैक्षणिक ज्ञान से अधिक की आवश्यकता है। उन्हें मार्गदर्शन, भावनात्मक शक्ति और सही-गलत की स्पष्ट समझ की आवश्यकता है। मोरल साइंस और सार्थक सुबह की सभाएं सरल लेकिन प्रभावी तरीके से यह सहायता प्रदान कर सकती हैं।
पीछे मुड़कर देखने पर, कई वयस्कों को अपने स्कूल के दिन केवल पाठों और परीक्षाओं के लिए नहीं, बल्कि उनके द्वारा सीखे गए मूल्यों, गाए गए गीतों और अनुशासन और एकजुटता की भावना के लिए याद आते हैं। इन यादों ने उन्हें वह बनाया, जो वे आज हैं। अब समय आ गया है कि आज के बच्चों को भी वही अवसर दिया जाए। यह बच्चों को जीवन के लिए तैयार करने के बारे में है, न कि केवल करियर के लिए। यह उन्हें विचारशील, सम्मानजनक और जिम्मेदार व्यक्तियों के रूप में बढऩे में मदद करने के बारे में है। लंबे समय में, यही वास्तव में एक मजबूत समाज का निर्माण करता है। यदि स्कूल यह कदम उठाते हैं, तो इसका प्रभाव मार्कशीट में तुरंत या प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखेगा लेकिन यह बच्चों के सोचने और दूसरों के साथ व्यवहार करने के तरीके में दिखाई देगा। और अंत में, यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है।-देवी एम. चेरियन