Edited By ,Updated: 19 Mar, 2021 04:54 AM

देश भर में हथकरघा बुनकरों की हालत एक जैसी है। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले महीने में लगभग 9000 तक कमा लेते हैं लेकिन एक बुनकर जो अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर काम करता है औसतन महीने में 8000 रुपए से ज्यादा नहीं कमा सकता...
देश भर में हथकरघा बुनकरों की हालत एक जैसी है। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले महीने में लगभग 9000 तक कमा लेते हैं लेकिन एक बुनकर जो अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर काम करता है औसतन महीने में 8000 रुपए से ज्यादा नहीं कमा सकता। उसकी एक वजह यह है कि ज्यादातर बुनकर या तो महाजन के लिए काम करते हैं या अपना बनाया सामान महाजन को बेचने के लिए मजबूर हैं।
हम कौन हैं?
पिछले लगभग तीन दशकों में भागलपुर सिल्क की दुनिया बदली है। एक वक्त था जब भागलपुर के आसपास कोकून को पाला जाता था लेकिन अब छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड से कोकून आता है और भागलपुर में उसकी हाथ से कताई होती है, जिसे पूरी तरह से औरतें ही कातती हैं, जिसके लिए उन्हें बमुश्किल 50 रुपए प्रतिदिन मिलते हैं। वैसे अब अधिकांश सिल्क का धागा फैक्टरी से ही बनकर आता है और उन धागों से फिर हथकरघा पर बुनाई होती है।
ऐसी ही परिस्थितियों में कोलिका की शुरूआत हुई जब कोलिका के निदेशकों में से एक संस्था के प्रोजैक्ट मैनेजर और शोधार्थी के तौर पर भागलपुर के पुरैनी इलाके में गए और फिर बुनकरों के बीच ही रहने लगे। बुनकरों के साथ बातचीत के बाद कोलिका नाम से कम्पनी की शुरुआत की गई। दिसंबर 2017 में कोलिका वीवर्स क्लैक्टिव प्राइवेट लिमिटेड के नाम से एक कम्पनी की स्थापना हुई। जिसके दो अन्य निदेशकों में एक पुश्तैनी बुनकर हैं और एक कशीदाकारी का काम करती हैं।
कम्पनी के तीनों निदेशक पहली बार इस तरह के किसी उपक्रम की शुरूआत कर रहे थे जिसका मकसद था आम बुनकरों को लाभ पहुंचाना। लेकिन इस काम में एक समस्या आ रही थी पूंजी की। कुछ लोग इस कम्पनी में निवेश करने के इच्छुक थे, लेकिन फिर कम्पनी का स्वामित्व उनके हाथ में चला जाता जो पैसा लगाते। ऐसी स्थिति में कम्पनी उस उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाती जो इसके तीनों निदेशक चाह रहे थे।
हमें क्यों आपकी मदद की दरकार है?
इस कम्पनी को शुरू करने के पीछे का एक उद्देश्य यह भी है कि यह एक सामाजिक उपक्रम है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि बिना सामाजिक या सामूहिक एकजुटता के इस प्रोजैक्ट को आगे बढ़ा पाना मुश्किल है। इसीलिए हम आप से इस पहल की सहायता करने की अपील करते हैं ताकि बुनकरों, पेंटरों और कलाकारों को अपने उत्पाद को औने-पौने दाम पर बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े और वे कंपनी के ब्रांड तले अपनी कम्पनी चला सकें।
एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के रूप में इस कम्पनी ने सीमित मात्रा में अपने उत्पाद बनाए, जिसे बहुत पसंद किया गया। कम्पनी किसी की निजी मिलकियत न हो जाए, इस बात को ध्यान में रखते हुए कोलिका के तीनों निदेशकों ने फैसला किया कि कोलिका को एक ग़ैर लाभकारी कम्पनी के रूप में रजिस्टर किया जाए।
दिसंबर 2019 में कोलिका क्लैक्टिव डिवैल्पमैंट फैडरेशन नाम से एक गैर-लाभकारी कम्पनी रजिस्टर्ड कराई गई और इसमें हैंडलूम के साथ-साथ हैंडीक्राफ्ट को भी शामिल किया गया और चौथे निदेशक के रूप में मंजूषा पेंटिंग में रुचि रखने वाली एक महिला को जोड़ा गया। कोलिका पूरी तरह हथकरघा पर स्थानीय डिजाइन के और पारंपरिक तरीके से बुने हुए कपड़ों से साड़ी और दुपट्टा के अलावा बंडी, कुर्ता, सूट आदि का उत्पादन करता है। हम पारंपरिक और पूरी तरह हाथ से बने भागलपुर रेशम के उत्पादन को बचाने, बढ़ाने और बुनकरों तक लाभ पहुंचाने को प्रतिबद्ध हैं।
इसी तरह मधुबनी और मंजूषा जैसी पेंटिंग जो हमेशा से लोककला के रूप में प्रचलित हैं उनको बनाने वाली अधिकतर महिलाएं गैर-सवर्ण जाति की रही हैं लेकिन वे उसका व्यापार नहीं कर पातीं, उनकी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करना भी कोलिका का काम होगा। समाज का वह हिस्सा जो मेहनतकश कामगारों और कलाकारों की दुर्दशा से ङ्क्षचतित है वो हमारे साथ जुड़े। हम सभी मिलकर पूरी पारदर्शिता के साथ काम करें। हम उन्हें यह भी बता सकें कि हम कहां और किनके साथ काम कर रहे हैं। वह अगर उन कलाकारों से मिलना चाहें तो हम उन्हें मिलवा भी सकें। ऐसे में सामाजिक और सामूहिक भागीदारी के बिना यह काम आगे नहीं बढ़ सकता।-जफर इकबाल