किसान की जमीन और मेहनत का शोषण रोकने की नीति जरूरी

Edited By Updated: 23 Dec, 2023 06:02 AM

policy necessary to stop exploitation of farmers  land and hard work

हमारे एक पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की स्मृति में प्रति वर्ष 23 दिसंबर को किसान दिवस मनाने की परम्परा है। प्रश्न उठता है कि क्या हम अब तक किए गए उपायों से उसे गरीबी से मुक्ति दिला पाए, उसके साथ हो रहे सामाजिक और आॢथक अन्याय को रोक पाए और क्या...

हमारे एक पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की स्मृति में प्रति वर्ष 23 दिसंबर को किसान दिवस मनाने की परम्परा है। प्रश्न उठता है कि क्या हम अब तक किए गए उपायों से उसे गरीबी से मुक्ति दिला पाए, उसके साथ हो रहे सामाजिक और आॢथक अन्याय को रोक पाए और क्या उसे देश की मुख्यधारा में एक संभ्रांत तथा संपन्न नागरिक होने का दर्जा दिला पाए? जरूरी हो जाता है कि उसकी दशा- दुर्दशा पर गंभीरता से विचार हो क्योंकि देश की आधी से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है और उसमें से केवल 5 प्रतिशत खुशहाल कहे जा सकते हैं।

कृषि नीति कैसी हो? : खेतीबाड़ी, किसानी और कृषक की खुशहाली को लेकर पहले से लेकर आज तक के प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री योजनाएं बनाते रहे हैं लेकिन एक बहुत बड़ा किसान वर्ग न तो संपन्न हो पा रहा है और न ही उसकी आमदनी बढ़ पा रही है, दोगुनी आय करने के दावे खोखले ही साबित हुए। इसका कुछ न कुछ तो कारण होगा जिसका निदान किए बिना कोई गति नहीं है। तो किया क्या जाए, एक फार्मूला सुझाते हैं। सबसे पहले यह समझ लीजिए कि खेतीबाड़ी के लिए जिन 4 चीजों, खाद, सिंचाई, उर्वरक और बीज की जरूरत होती है, उनकी पूर्ति होनी चाहिए।

इसके लिए पहला सुझाव यह है कि ये सब 3 से 5 हैक्टेयर जमीन रखने वाले को 3 साल तक सरकार द्वारा नि:शुल्क यानी मुफ्त प्रदान की जाएं। उसके लिए उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित कर दिया जाए कि इतनी पैदावार तो करनी ही है। इसका मतलब यह कि किसान की जमीन और मेहनत उसकी, संसाधन सरकार के। अब उपज सीधे सरकार खरीदे या उसकी बिक्री का प्रबंध करे, यह उसकी मर्जी, किसान को उसके दाम मिल जाएं, बस इतना काफी है।

दूसरा सुझाव यह कि 3 वर्ष बाद सर्वेक्षण हो कि किस किसान ने लक्ष्य पूरा किया और किसने नहीं। जिसने कर लिया, उसे 2 और वर्ष तक यही सुविधाएं मिलें और जिसने नहीं किया, उसके सामने विकल्प हो कि वह खेतीबाड़ी छोड़कर कोई अन्य व्यवसाय कर ले और अपनी जमीन और मेहनत के इस्तेमाल का विकल्प खोजे। यह भी किया जा सकता है कि उसकी सहमति से उसे एक मौका और दिया जाए तथा उन कारणों को दूर किया जाए जिनकी वजह से वह लक्ष्य पूरा नहीं कर पाया। इसमें सूखा, बाढ़, प्राकृतिक आपदा, आधुनिक कृषि टैक्नोलॉजी उस तक न पहुंच पाना या उसका इस्तेमाल न कर पाना जैसे कारणों का अध्ययन कर उसके लिए एक रिलीफ पैकेज बनाया जाए और उसे 2 वर्ष और दिए जाएं।

तीसरा सुझाव यह कि सरकार ने अभी जो किसान सम्मान निधि, उसकी फसल का बीमा, यूरिया पूॢत जैसी योजनाएं शुरू की हुई हैं, इन्हें धीरे-धीरे वापस लिया जाए और इनकी जगह उसे आत्मनिर्भर बनाने, उसकी आमदनी बढ़ाने और गरीबी रेखा से बाहर निकालने की नीतियां बनें। सहकारिता पर आधारित खेती जैसी पुरानी नीतियों से किनारा कर लिया जाए और व्यक्तिगत किसान को खुशहाली की तरफ ले जाया जाए।

युवाओं को रोजगार : इसके  साथ ही खेती के लिए अयोग्य हो चुके किसानों के सामने जो विकल्प हों, वे ऐसे हों जिनका किसी न किसी प्रकार से खेत खलिहान से संबंध हो। जैसे कि परिवार के अनुभवी सदस्यों और शिक्षित युवाओं को कृषि उपज खरीदने, बेचने, कृषि उपकरणों का व्यापार करने, फार्म प्रोड्क्शन कंपनी बनाने, ग्रामीण क्षेत्रों में स्टार्ट अप खोलने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और इसी तरह के दूसरे कामों में लगाया जा सकता है। वह अपनी जमीन से जुड़े रहेंगे और उन्हें यह भी नहीं लगेगा कि उन्हें उजाड़ दिया गया है और वे विस्थापित हो गए हैं, बस उनका काम बदल गया है।

आज देहातों में अमीर किसानों को आधुनिक सुविधाओं जैसे नई से नई कार, विलासिता के साधन मुहैया कराने की होड़ लगी हुई है। नैशनल और मल्टी नैशनल कंपनियां उन तक पहुंचने की कोशिश में लगी हैं। इसी तरह खेती की आधुनिक मशीनें, बिजाई, कटाई के उपकरण ये देशी और विदेशी उत्पादक पहुंचा रहे हैं। इस काम में ग्रामीण युवा वर्ग को लगाने के लिए उन्हें आर्थिक साधन उपलब्ध कराने होंगे ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें और नए परिवेश में अपने को एडजस्ट कर सकें।

महिलाओं का योगदान : यहां एक बहुत ही महत्वपूर्ण पर ज्यादातर अनदेखे पहलू का जिक्र करना जरूरी है। यह एक वास्तविकता है कि खेतीबाड़ी का सबसे अधिक ज्ञान और उसके व्यावहारिक पक्ष का ध्यान महिलाओं को ही रहता है जबकि सबसे अधिक उपेक्षा उनकी ही की जाती है। सरकारी योजनाओं और नीतियों की जानकारी उन्हें नहीं मिलती क्योंकि पुरुष समाज को प्राथमिकता दी जाती है जबकि सबसे अधिक योगदान महिलाएओं का होता है।

हमारे साहित्य में मुंशी प्रेम चंद से लेकर कृष्ण चन्द्र्र तक ने किसानों को लेकर बहुत-सी कहानियों और उपन्यासों की रचना की है। उन सब में महिलाओं का योगदान बाखूबी दिखाया गया है। इसी तरह हमारे नाटकों से लेकर फिल्मों तक में महिलाओं के योगदान को दर्शाया गया है। क्या कारण है कि वास्तविक धरातल यानी खेतीबाड़ी में उनकी भूमिका को नकारा जाता रहा है। किसान दिवस पर इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है कि सरकार हो या नागरिक कुछ तो नया सोचें और उसे अमली जामा पहनाएं। -पूरन चंद सरीन

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