भारत के गौरव : भगवान बिरसा मुंडा

Edited By Updated: 16 Nov, 2021 04:59 AM

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वर्तमान में भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। दमनकारी ब्रिटिश राज के खिलाफ मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए निडर होकर प्रयास करने वाले महान सेनानियों में एक विशिष्ट नाम

वर्तमान में भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। दमनकारी ब्रिटिश राज के खिलाफ मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए निडर होकर प्रयास करने वाले महान सेनानियों में एक विशिष्ट नाम है- भगवान बिरसा मुंडा। बिरसा मुंडा ने केवल 25 वर्षों का छोटा लेकिन बहादुरी भरा जीवन व्यतीत किया। वीरतापूर्ण कार्यों और उनकी नेक भावना ने बिरसा को उनके अनुयायियों के लिए भगवान बना दिया। अन्याय और उत्पीडऩ के खिलाफ लडऩे के वीरतापूर्ण प्रयासों से भरी उनकी जीवन कहानी, औपनिवेशक ब्रिटिश राज के खिलाफ प्रतिरोध की एक बुलंद आवाज का प्रतिनिधित्व करती है। 

बिरसा का जन्म 15 नवम्बर, 1875 को वर्तमान झारखंड के उलिहातू गांव के एक आदिवासी मुंडा परिवार में हुआ था। उन्होंने अपना बचपन अत्यंत गरीबी में बिताया। यह वह समय था, जब शोषक ब्रिटिश राज मध्य और पूर्वी भारत के घने जंगलों में घुसने लगा था और प्रकृति व प्राकृतिक संसाधनों के साथ तालमेल बिठाकर रहने वाले आदिवासियों के लिए कई तरह की बाधाएं पैदा कर रहा था। अंग्रेजों ने छोटा नागपुर क्षेत्र में एक सामंती जमींदारी प्रथा की शुरूआत की, जिसने आदिवासी ‘खुंटकट्टी’ कृषि प्रणाली को नष्ट कर दिया।

विभिन्न मिशनरी गतिविधियां ब्रिटिश राज के सक्रिय समर्थन से लगातार संचालित होती रहीं। वनों में रहने वाले आदिवासियों के धार्मिक-सांस्कृतिक लोकाचार का अपमान और उनकी परम्पराओं में हस्तक्षेप जारी रहा। 

युवा बिरसा इन सब को अपनी आंखों के सामने देखते हुए बड़े हुए और यह समझने लगे कि कैसे ये औपनिवेशक ताकतें और दिकु (आदिवासियों के बाहरी दुश्मन) स्थानीय लोगों के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं। इस अपवित्र गठजोड़ के खिलाफ लडऩे के बिरसा के संकल्प को इन बातों से और मजबूती मिली। 

जमींदारी व्यवस्था ने जल्द ही आदिवासियों को भूस्वामियों से भू-मजदूर की स्थिति में ला दिया। सामंती व्यवस्था ने पेड़-पौधों से भरे आदिवासी क्षेत्रों में जबरन मजदूरी (वेठ बिगारी) को और बढ़ा दिया। गरीब, निर्दोष आदिवासियों का शोषण अब चरम सीमा पर पहुंच गया था। इन सबका नतीजा यह हुआ कि बिरसा ने आदिवासियों के हितों से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाना शुरू कर दिया। उन्होंने आदिवासियों को धर्म से जुड़े मामलों में एक नई रोशनी दिखाई। 

वह आदिवासियों के जीवन एवं उनकी संस्कृति को कमतर आंकने वाले मिशनरियों के खिलाफ मजबूती से डटे रहे। उन्होंने कई अंधविश्वासों को हतोत्साहित किया और नए सिद्धांतों एवं प्रार्थनाओं की शुरूआत की। बिरसा ने आदिवासियों को ‘सिरमारे फिरुन राजा जय’ या ‘पैतृक राजा की जीत’ की ओर प्रेरित करते हुए भूमि पर आदिवासियों के पैतृक स्वायत्त नियंत्रण का आह्वान किया। बिरसा एक जन नेता बन गए और उन्हें उनके अनुयायियों द्वारा भगवान और धरती आबा के रूप में माना जाने लगा। 

बिरसा मुंडा ने स्पष्ट रूप से इस तथ्य को पहचान लिया था कि ब्रिटिश औपनिवेशक शासन ही सभी समस्याओं और उत्पीडऩ का मूल कारण है। उनके जेहन में यह पूरी तरह से स्पष्ट था कि ‘अबुआ राज सेतर जाना, महारानी राज टुंडू जाना’ (अर्थात महारानी का राज समाप्त हो और हमारा राज कायम हो)। भगवान बिरसा ने जनता के मन में विरोध की ङ्क्षचगारी जलाई। मुंडा, उरांव एवं अन्य आदिवासी और गैर-आदिवासी लोग उनके आह्वान पर उठ खड़े हुए तथा ‘उलगुलान’ या विद्रोह में शामिल हो गए। 

बिरसा ने लोगों से कोई लगान नहीं देने के लिए कहा और सामंती, मिशनरी एवं औपनिवेशक ब्रिटिश राज के अधिकारियों की चौकियों पर हमला किया। मध्य और पूर्वी भारत के आदिवासियों ने पारंपरिक तीर और धनुष के साथ ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक प्रभावी सशस्त्र प्रतिरोध किया। जल्द ही उन्हें ब्रिटिश पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया और जेल में डाल दिया गया, जहां 9 जून, 1900 को जेल में उनकी मृत्यु हो गई। 

लेकिन भगवान बिरसा मुंडा का ओजपूर्ण संघर्ष व्यर्थ नहीं गया। इसने ब्रिटिश राज को आदिवासियों की दुर्दशा और शोषण का संज्ञान लेने व आदिवासियों की सुरक्षा के लिए ‘छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908’ लाने पर मजबूर किया। इस महत्वपूर्ण अधिनियम ने आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर रोक लगा दी, जिससे आदिवासियों को भारी राहत मिली और यह जनजातीय लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कानून बन गया। ब्रिटिश शासन ने वेठ बिगारी या जबरन मजदूरी की प्रथा को समाप्त करने के लिए भी कदम उठाए। 

भगवान बिरसा मुंडा अपनी मृत्यु के 121 साल बाद यानी आज भी लाखों भारतीयों को निरंतर प्रेरित करते हैं। वह हमारे स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान प्रतीकों में से एक हैं।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रखर नेतृत्व में अब हर साल 15 नवम्बर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाकर जनजातीय गौरव और योगदान को पूरी श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है।-डॉ. एल मुरुगन(सूचना-प्रसारण व पशुपालन राज्य मंत्री)

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