Edited By ,Updated: 19 Feb, 2026 05:26 AM

पंजाब की राजनीति के उतार-चढ़ाव भरे अखाड़े में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दबाव के बीच एकजुट होने की कला में महारत हासिल कर ली है, ठीक उसी तरह, जैसे कोई परिवार तूफान के दौरान एक साथ खड़ा हो जाता है। यह शाश्वत गाथा एक बार फिर 16 फरवरी, 2026 को सामने...
पंजाब की राजनीति के उतार-चढ़ाव भरे अखाड़े में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दबाव के बीच एकजुट होने की कला में महारत हासिल कर ली है, ठीक उसी तरह, जैसे कोई परिवार तूफान के दौरान एक साथ खड़ा हो जाता है। यह शाश्वत गाथा एक बार फिर 16 फरवरी, 2026 को सामने आई, जब पंजाब कांग्रेस के प्रमुख नेता रणनीतिक ‘डिनर मीटिंग’ के लिए चंडीगढ़ में प्रताप सिंह बाजवा के आवास पर एकत्रित हुए। पंजाब विधानसभा में वर्तमान विपक्ष के नेता बाजवा द्वारा आयोजित इस सभा ने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले एकजुटता का एक शक्तिशाली संकेत दिया।
बाजवा, जो अप्रैल, 2022 से विपक्ष के नेता का पद संभाल रहे एक अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं, ने हालिया अंतर्कलह के बीच मतभेदों को सुलझाने के लिए इस कार्यक्रम का आयोजन किया। उपस्थित लोगों में पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वङ्क्षडग़, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, और सुखजिंदर सिंह रंधावा, भारत भूषण आशू, गुरजीत सिंह औजला, सुखजिंदर सिंह सरकारिया, ओम प्रकाश सोनी और जसबीर सिंह ङ्क्षडपा जैसे कई दिग्गज शामिल थे। यह बैठक पार्टी के ऐतिहासिक पैटर्न को दोहराती है- जब दाव ऊंचे होते हैं, तो आंतरिक प्रतिद्वंद्विता एकजुटता में बदल जाती है। यदि 2024 के लोकसभा चुनावों पर नजर डालें, जहां पंजाब की 13 संसदीय सीटों पर कड़ा मुकाबला था, तो टिकट बंटवारे के दौरान कांग्रेस के दावेदारों में तीखी झड़प हुई थी। लेकिन एक बार जब हाईकमान ने उम्मीदवारों को अंतिम रूप दे दिया, तो वे एकजुट हो गए और 7 सीटें हासिल कीं, जो कि सबसे अधिक संख्या थी। आम आदमी पार्टी (आप) को 3, शिरोमणि अकाली दल (शिअद) को 1 और निर्दलीयों को 2 सीटें मिलीं, जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का खाता भी नहीं खुला।
यह जीत 2017 के विधानसभा चुनावों की याद दिलाती है, जब कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने 117 में से 77 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाई थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह, जो कांग्रेस से 2 बार पंजाब के मुख्यमंत्री (2002-07 और 2017-21) रहे, उन्होंने नवजोत सिद्धू के साथ विवाद और खुद को दरकिनार किए जाने के बाद सितम्बर 2021 में पार्टी छोड़ दी थी। उन्होंने अक्तूबर 2021 में पंजाब लोक कांग्रेस बनाई, 2022 के चुनावों के लिए भाजपा के साथ गठबंधन किया और फिर 19 सितम्बर, 2022 को अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया और आधिकारिक तौर पर उसमें शामिल हो गए।
‘डिनर डिप्लोमेसी’ (भोज की राजनीति) भारतीय राजनीति में एक समय-परीक्षित रणनीति है, जो सार्वजनिक चकाचौंध से दूर गठबंधन बनाने और दरारों को भरने के लिए सांझा भोजन की आत्मीयता का लाभ उठाती है। चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे आलोचकों को पंजाबी व्यंजनों-जैसे कि ‘मक्खन वाला सरसों का साग और मक्की की रोटी’ पर आमंत्रित करके, इस कार्यक्रम ने एकजुटता का एक ऐसा नैरेटिव बुना, जो गुटबाजी की धारणाओं को चुनौती देता है। यह नेताओं के मानवीय पक्ष को सामने लाकर काम करता है, जिससे ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ बातचीत के जरिए अहंकार को सुलझाने और रणनीति बनाने में मदद मिलती है, जबकि लीक हुई तस्वीरें या बयान मीडिया में ‘सब ठीक है’ की कहानी को पुख्ता करते हैं, जिससे कार्यकत्र्ताओं का मनोबल और मतदाताओं का विश्वास बढ़ता है।
भोज के दौरान छनकर आई बातों ने माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया-हल्की-फुल्की गपशप हुई, जैसे वङ्क्षडग़ के अंदाज पर चुटकुले और चन्नी द्वारा विपक्ष की सीट को लेकर किया गया मजाक। यह सब अच्छे हंसी-मजाक में हुआ, जिससे पुराने तनाव को कम करने में मदद मिली। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई, लेकिन ऐसी दोस्ताना बातचीत दिखाती है कि कैसे एक साधारण भोजन झगड़ों को दोस्ती में बदल सकता है और पार्टी की भविष्य की लड़ाइयों के लिए एकजुटता की एक मजबूत कहानी लिख सकता है। आज, 2022 में चुनी गई पंजाब विधानसभा में, कांग्रेस 16 सीटों के साथ आधिकारिक विपक्ष है, जबकि ‘आप’ के पास 94 सीटों का भारी बहुमत है। प्रताप सिंह बाजवा के आवास पर एकजुटता का हालिया प्रदर्शन किसी भी सत्ता-विरोधी लहर का लाभ उठाने के पार्टी के संकल्प को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे, यह नई एकजुटता अंतर को पाटने और ‘आप’ के गढ़ को कड़ी चुनौती देने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
जैसा कि बाजवा की डिनर डिप्लोमेसी रेखांकित करती है, जब ‘दबाव बढ़ता है, तो पंजाब कांग्रेस घड़ी की सूइयों की तरह एक साथ खड़ी हो जाती है। अब सभी की निगाहें 2027 पर टिकी हैं, जहां यह एकजुटता सत्ता में विजयी वापसी की पटकथा लिख सकती है और राज्य के राजनीतिक सिंहासन पर फिर से दावा कर सकती है। आने वाला वर्ष यह परीक्षण करेगा कि क्या कांग्रेस आंतरिक एकजुटता को चुनावी गति में बदल पाती है और पंजाब की राजनीति में अपना ऐतिहासिक प्रभाव वापस पा सकती है?-रविंदर सिंह रॉबिन