Edited By ,Updated: 02 Feb, 2026 05:18 AM

केंद्रीय बजट 2026-27 ऐसे समय में आया है जब भारत की व्यापक आॢथक तस्वीर संतुलित दिखाई देती है। विकास दर स्थिर है, महंगाई में उल्लेखनीय गिरावट आई है, राजकोषीय अनुशासन कायम है लेकिन वैश्विक परिदृश्य में संरक्षणवाद और प्रमुख निर्यात बाजारों में बढ़ती...
केंद्रीय बजट 2026-27 ऐसे समय में आया है जब भारत की व्यापक आर्थिक तस्वीर संतुलित दिखाई देती है। विकास दर स्थिर है, महंगाई में उल्लेखनीय गिरावट आई है, राजकोषीय अनुशासन कायम है लेकिन वैश्विक परिदृश्य में संरक्षणवाद और प्रमुख निर्यात बाजारों में बढ़ती टैरिफ बाधाएं नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। ऐसे माहौल में यह बजट किसी नाटकीय बदलाव का प्रयास नहीं करता, बल्कि एक परिचित और सुनियोजित रणनीति को आगे बढ़ाता है-सार्वजनिक पूंजी व्यय को बढ़ाना, घरेलू विनिर्माण क्षमता को मजबूत करना, लघु उद्यमों को संरक्षण देना और राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना।
बजट के 7 बड़े संकेत : पहला, सबसे प्रमुख बात है पूंजी व्यय में निरंतर वृद्धि, जिसे अब बढ़ाकर 12.22 लाख करोड़ रुपए किया गया है। यह कोई एकमुश्त वृद्धि नहीं, बल्कि कई वर्षों से जारी उस प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें केंद्र ने सड़क, रेल, लॉजिस्टिक्स, रक्षा, ऊर्जा और शहरी ढांचे में निवेश को लगातार बढ़ाया है, ताकि दीर्घकालिक उत्पादक परिसंपत्तियां बनें और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिले। दूसरा, बजट में रणनीतिक विनिर्माण पर विशेष जोर है-इलैक्ट्रॉनिक्स, सैमीकंडक्टर, बायो-फार्मा और उन्नत सामग्रियों जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता तथा आपूर्ति शृंखला की मजबूती को नीति का केंद्र बनाया गया है। तीसरा, हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर और लॉजिस्टिक्स आधुनिकीकरण जैसे बड़े कनैक्टिविटी प्रोजैक्ट यह दर्शाते हैं कि बुनियादी ढांचा अब केवल विकास का नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा का आधार माना जा रहा है।
चौथा, एम.एस.एम.ई. के लिए विशेष ग्रोथ फंड यह स्वीकार करता है कि छोटे उद्यम वैश्विक टैरिफ दबाव और घरेलू लागत वृद्धि से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। पांचवां, राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में निरंतर कमी बाजारों को यह भरोसा देती है कि बढ़ता पूंजी व्यय वित्तीय अनुशासन की कीमत पर नहीं है। छठा, सीमा शुल्क में तर्कसंगत बदलाव और व्यापार सुगमता के उपाय यह संकेत देते हैं कि सरकार भारतीय निर्यात को टैरिफ विकृत दुनिया में अधिक सक्षम बनाना चाहती है। सातवां, स्वास्थ्य, रेमिटैंस और अनुपालन से जुड़े राहत उपायों के जरिए जीवन सुगमता बढ़ाने का प्रयास, भले ही आयकर स्लैब में बदलाव न हुआ हो।
6 कमियां और चुनौतियां : सबसे स्पष्ट निराशा वेतनभोगी वर्ग के लिए आयकर स्लैब में किसी ठोस बदलाव का न होना है, जबकि पिछले वर्षों में बढ़ती जीवन लागत के बीच राहत की उम्मीद थी। दूसरी, रोजगार सृजन की बात जरूर की गई है लेकिन बड़े पैमाने पर औपचारिक नौकरियों के लिए स्पष्ट कार्यक्रम या प्रोत्साहन का अभाव है। तीसरी, टैरिफ दबाव से राहत के उपाय परोक्ष हैं, जो वस्त्र, चमड़ा और हल्के इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में मांग में आई गिरावट की तत्काल भरपाई नहीं कर सकते। चौथी, वित्तीय बाजार के कुछ खंडों में लेन-देन कर में वृद्धि निवेशक भावना को प्रभावित कर सकती है। पांचवीं, बुनियादी ढांचे पर जोर के बावजूद त्वरित उपभोग बढ़ाने के लिए प्रत्यक्ष प्रोत्साहन सीमित हैं। छठी, राजकोषीय अनुशासन के बावजूद सरकारी उधारी का स्तर अभी भी ऊंचा है, जो वैश्विक परिस्थितियां बिगडऩे पर ब्याज दरों और मौद्रिक लचीलेपन पर दबाव डाल सकता है।
आम नागरिक के लिए क्या : आम नागरिक के लिए यह बजट बड़े लाभों की बजाय छोटी लेकिन अर्थपूर्ण राहतें देता है। गंभीर बीमारियों की दवाओं पर सीमा शुल्क में छूट परिवारों के स्वास्थ्य व्यय को कम कर सकती है। विदेश में शिक्षा और चिकित्सा उपचार के लिए भेजी जाने वाली राशि पर कर संग्रह में कमी से छात्रों और परिवारों को राहत मिलेगी। कृषि और सेवाओं से जुड़ी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में सुधार ग्रामीण आबादी के लिए उत्पादकता और पहुंच बढ़ा सकता है। बेहतर सड़क, रेल और लॉजिस्टिक्स का लाभ नागरिकों को धीरे-धीरे कम लागत और बेहतर कनैक्टिविटी के रूप में मिलेगा।
मध्यवर्ग और वेतनभोगी वर्ग-राहत से अधिक स्थिरता : आयकर स्लैब में कोई बदलाव नहीं होने से अतिरिक्त बोझ नहीं बढ़ता, लेकिन खर्च योग्य आय भी नहीं बढ़ती। अनुपालन में सरलता और कुछ कर राहतें सीमित सुकून देती हैं। प्रत्यक्ष कर कटौती का अभाव उपभोग और भावना बढ़ाने का अवसर चूकने जैसा प्रतीत होता है। निवेश और बाजार से जुड़े पेशेवरों के लिए लेन-देन कर में वृद्धि अतिरिक्त लागत के रूप में देखी जा सकती है। कुल मिलाकर, मध्यवर्ग को दीर्घकालिक विकास का लाभार्थी बनने का धैर्य रखने को कहा गया है।
क्या टैरिफ प्रभाव को निष्प्रभावी कर सकता है : बजट इस समस्या को स्वीकार करता है और एम.एस.एम.ई. सुदृढ़ीकरण, सीमा शुल्क सुगमता, लॉजिस्टिक्स सुधार और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने जैसे उपाय प्रस्तुत करता है। ये कदम लचीलापन और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाते हैं, जो टैरिफ झटकों से बचाव के लिए आवश्यक हैं। बजटीय उपाय लागत और प्रक्रियागत बाधाएं कम कर सकते हैं लेकिन बाजार पहुंच में आई कमी की पूरी भरपाई नहीं कर सकते। इसके लिए व्यापार कूटनीति, बाजार विविधीकरण और दीर्घकालिक औद्योगिक नीति की आवश्यकता होगी।
लोकलुभावन से अधिक व्यावहारिक: इस बजट में बड़े कर कटौती, व्यापक अनुदान या चकाचौंध करने वाली योजनाएं नहीं हैं। इसकी बजाय बुनियादी ढांचा निर्माण, विनिर्माण सुदृढ़ीकरण, लघु उद्यम समर्थन, राजकोषीय विश्वसनीयता और प्रणाली सुधार की निरंतर रणनीति दिखाई देती है। यह बजट मानता है कि विकास, प्रतिस्पर्धा और स्थिरता ही भविष्य की चुनौतियों के उत्तर हैं। असल परीक्षा क्रियान्वयन में : यदि पूंजी व्यय समय पर परियोजनाओं में बदले, एम.एस.एम.ई. फंड सही उद्यमों तक पहुंचे, विनिर्माण मिशन वास्तविक क्षमता में तब्दील हों और व्यापार सुगमता से वास्तविक लागत घटे, तो बजट के शांत संकेत प्रभावशाली परिणाम दे सकते हैं। ऐसे समय में जब आॢथक झटके अक्सर सीमाओं के बाहर से आते हैं, इस बजट का संदेश स्पष्ट है-भारत बाहरी अनिश्चितताओं के लिए अपनी घरेलू तैयारी मजबूत कर रहा है।-के.एस. तोमर