Edited By ,Updated: 10 Jan, 2026 05:35 AM

पंजाब की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां के युवाओं के सपने जितने बड़े हैं, उन तक पहुंचने की राह उतनी ही धुंधली है। एक तरफ विदेश जाने की आकांक्षा, दूसरी तरफ स्थानीय रोजगार की कमी और बीच में वे युवा, जो 11वीं-12वीं के आसपास पढ़ाई छोड़ देते हैं या...
पंजाब की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां के युवाओं के सपने जितने बड़े हैं, उन तक पहुंचने की राह उतनी ही धुंधली है। एक तरफ विदेश जाने की आकांक्षा, दूसरी तरफ स्थानीय रोजगार की कमी और बीच में वे युवा, जो 11वीं-12वीं के आसपास पढ़ाई छोड़ देते हैं या 12वीं पूरी करने के बाद आगे किसी ठोस दिशा में नहीं बढ़ पाते और स्कूल छोड़ देते हैं। यही वे युवा हैं, जिनके हाथों में हुनर नहीं, जेब में पैसा नहीं और न ही दिमाग में भविष्य का स्पष्ट नक्शा। परिणामस्वरूप, वे या तो असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करते हैं या जमीन-जायदाद बेच कर विदेशों में मजदूरी के लिए डंकी रूट से जान जोखिम में डाल पलायन की राह पकड़ते हैं अथवा मानसिक अवसाद और नशे जैसी समस्याओं की चपेट में आ जाते हैं।
सरकारी आंकड़े इस संकट को और उघाड़ते हैं। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यू.डी.आई.एस.ई.) के मुताबिक, पंजाब में सैकेंडरी (12वीं) स्तर पर ड्रॉपआऊट दर 17 प्रतिशत से अधिक है। कक्षा 10 से 11 में पहुंचने वाले छात्रों की संख्या घटकर लगभग 79 प्रतिशत रह जाती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि हर 5 में से 1 छात्र 10वीं के बाद औपचारिक शिक्षा से बाहर हो जाता है। यही नहीं, कक्षा 1 से कक्षा 12 तक कुल रिटैंशन दर लगभग 64.5 प्रतिशत होना इस बात का संकेत है कि स्कूल प्रणाली बड़ी संख्या में बच्चों को अंतिम पड़ाव तक रोक पाने में असफल हो रही है। दूसरी ओर, आल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब का हायर एजुकेशन ग्रॉस एनरोलमैंट रेशो करीब 27.4 है, यानी 12वीं के बाद भी अधिकांश युवा उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज या विश्वविद्यालय तक नहीं पहुंच पा रहे।
जब शिक्षा का सीधा संबंध रोजगार, आय और सम्मानजनक जीवन से नहीं जुड़ता, तो वह गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए बोझ बन जाती है। आॢथक मजबूरी, खेती या दिहाड़ी काम की जरूरत, निजी शिक्षा का खर्च और सबसे बढ़कर करियर की अस्पष्टता, इन सबके बीच किताबों में उलझी शिक्षा युवा को यह भरोसा नहीं दिला पाती कि उच्च शिक्षा में उसका भविष्य सुरक्षित है। हुनर-शिक्षा न केवल वैकल्पिक शिक्षा नीति, बल्कि अनिवार्य समाधान बन जाती है। यदि कक्षा 9-10 से ही छात्रों को यह दिखने लगे कि पढ़ाई उन्हें किसी कौशल, किसी पेशे और किसी आय से जोड़ सकती है, तो ड्रॉपआऊट अपने-आप घटने लगेंगे।
जो विद्यार्थी पहले ही 11वीं-12वीं के आसपास सिस्टम से बाहर हो चुके हैं, उनके लिए 3 से 6 महीने के प्लेसमैंट-लिंक्ड ब्रिज कोर्स जीवन बदलने वाले साबित हो सकते हैं। इन कोर्सों में बुनियादी शिक्षा के साथ व्यावहारिक कौशल सीधे रोजगार से जुड़े होने चाहिएं। हुनर-शिक्षा भी तभी सार्थक होगी, जब उसके अंत में अप्रैंटिसशिप या नौकरी का भरोसा हो। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए ‘अर्न व्हाइल लर्न’ मॉडल विशेष महत्व रखता है, क्योंकि बिना आय के हुनर प्रशिक्षण उनके लिए संभव ही नहीं होता। पंजाब में हुनर-शिक्षा की दिशा राज्य की आॢथक वास्तविकताओं से मेल खानी चाहिए। कृषि और उससे जुड़े फूड प्रोसैसिंग उद्योग, डेयरी और कोल्ड-चेन, वेयरहाऊसिंग और लॉजिस्टिक्स, इलैक्ट्रीशियन, ऑटोमोबाइल व इलैक्ट्रिक व्हीकल रिपेयर, रैफ्रिजरेशन-ए.सी., वैल्डिंग, ब्यूटी-वैलनैस और हैल्थकेयर ऐसे क्षेत्र हैं, जहां डिग्री से अधिक हुनर की मांग है। यदि हुनर-शिक्षा इन्हीं जरूरतों पर आधारित हो, तो न केवल स्थानीय रोजगार पैदा होंगे, बल्कि युवाओं का डंकी रूट से विदेशों में पलायन भी रुकेगा।
समाधान महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर में नहीं, बल्कि सांझा संसाधनों में है। हर ब्लॉक में कुछ स्कूलों को स्किल-हब के रूप में विकसित कर सांझी लैब, ट्रेनर और स्थानीय एम.एस.एम.ईज की भागीदारी से प्रभावी मॉडल खड़ा किया जा सकता है। ट्रेनिंग प्रोग्राम की सफलता को इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि कितने युवाओं को काम मिला, उनकी आय में कितना इजाफा हुआ और कितने युवा दोबारा शिक्षा या हुनर प्रशिक्षण की मुख्यधारा से जुड़े। पंजाब को अब ड्रॉपआऊट को आंकड़ों की समस्या नहीं, बल्कि नीति का केंद्र बनाना होगा। कक्षा 10 से 11 के छात्रों पर विशेष निगरानी, ड्रॉपआऊट और रोजगार की ब्लॉक-स्तरीय मैपिंग, प्लेसमैंट-लिक्ड स्किल कोर्स और अप्रैंटिसशिप, ये सब मिलकर ही समाधान बन सकते हैं।
आखिरकार पंजाब का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने युवाओं को डिग्री के पीछे दौडऩे के लिए छोड़ देता है या उन्हें हुनर के हथियार के साथ आगे बढ़ाता है। हुनर शिक्षा वह पुल है, जो शिक्षा को रोजगार से और सपनों को जमीन से जोड़ सकता है। यदि यह पुल समय रहते नहीं बना, तो ड्रॉपआऊट केवल शिक्षा से नहीं, व्यवस्था से भी होते चले जाएंगे और इसकी कीमत पंजाब को सामाजिक और आर्थिक मोर्चों पर चुकानी पड़ेगी। (लेखक ओरेन इंटरनैशनल के संस्थापक एम.डी. हैं)-दिनेश सूद