दुनिया के ‘नए मानचित्र’ ने भारत की चिंताओं को फिर से जीवित किया

Edited By Updated: 20 Sep, 2026 03:01 AM

the  new map  of the world has revived india s concerns

भारत में, जहां सीमा की एक गलत रेखा जेल की सजा का कारण बन सकती है, वहां मानचित्रकला कभी भी तटस्थ भूगोल का विषय नहीं रही। यह पक्की स्याही में लिखी गई राष्ट्रीय संप्रभुता का एक अडिग दावा है।

भारत में, जहां सीमा की एक गलत रेखा जेल की सजा का कारण बन सकती है, वहां मानचित्रकला कभी भी तटस्थ भूगोल का विषय नहीं रही। यह पक्की स्याही में लिखी गई राष्ट्रीय संप्रभुता का एक अडिग दावा है। 4 सितम्बर, 2026 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 164 के मुकाबले 1 मत से (6 देशों के अनुपस्थित रहने के साथ) उस बात को स्वीकार करने के पक्ष में मतदान किया, जिसे मानचित्रकार 2 शताब्दियों से जानते थे और बाकी सभी नजरअंदाज करना पसंद करते थे-कि मानक विश्व मानचित्र अफ्रीका के आकार को लेकर सच्चाई से काफी दूर है। इसके विरोध में एकमात्र मत वाशिंगटन से आया, जिसने इस पूरी कवायद को सर्वथा अनावश्यक बताकर खारिज कर दिया। 

‘करैक्ट द मैप’ शीर्षक वाला यह प्रस्ताव अफ्रीकी संघ की ओर से टोगो द्वारा लाया गया था और यह सरकारों, स्कूलों और प्रौद्योगिकी कंपनियों को 1569 के मर्केटर प्रोजैक्शन को त्यागने का निर्देश देता है, जो भूमध्य रेखा से दूर की हर चीज को इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है कि ग्रीनलैंड उस महाद्वीप के आकार का दिखने लगता है जिसके भीतर वह 14 बार समा सकता है। इसके स्थान पर यह ‘इक्वल अर्थ’ की सिफारिश करता है, एक ऐसा प्रोजैक्शन, जिसे तीन मानचित्रकारों ने 2018 में विशेष रूप से संबंधित महाद्वीपों के वास्तविक सापेक्ष क्षेत्रफल को बनाए रखने के लिए बनाया था। यह एक वास्तविक सुधार है। जिस बात ने 2 महीने बाद भारत, जापान और यूक्रेन को वास्तव में विचलित किया, वह एक अलग, अधिक शांत दस्तावेज था।

वह दस्तावेज़ संयुक्त राष्ट्र का अपना ‘विश्व का मानचित्र’ है, एक संदर्भ पत्रक, जिसे संयुक्त राष्ट्र की एजैंसियां और बहुपक्षीय प्रणाली का अधिकांश हिस्सा अकाट्य सत्य मानकर चलता है। इसके भू-स्थानिक सूचना अनुभाग ने मतदान से 2 महीने पहले, 1 जुलाई, 2026 को चुपचाप एक नया संस्करण जारी किया था। सचिवालय के अपने मानचित्रकार दशकों से रॉबिन्सन, विंकेल ट्रिपेल और एकर्ट ढ्ढङ्क पर निर्भर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, जिस प्रस्ताव ने मर्केटर को समाप्त करने का बीड़ा उठाया था, उसने दरअसल एक पुतले (काल्पनिक शत्रु) का शिकार किया, जबकि वह मानचित्र जो वास्तव में मायने रखता है, सीमाओं सहित, सभी की नजरों के सामने बदल गया। प्रत्येक संयुक्त राष्ट्र मानचित्र पर एक ही संकेत-विवरण (लेजेंड) एक रक्षा-कवच या दोषमुक्ति की तरह अंकित होता है। लेजेंड इस बात पर जोर देता है कि इस पर दर्शाई गई कोई भी बात किसी क्षेत्र की कानूनी स्थिति या उसके चारों ओर खींची गई सीमाओं के बारे में ‘संयुक्त राष्ट्र के सचिवालय की ओर से किसी भी प्रकार की राय’ का संकेत नहीं देती। 

भारत अधिकांश देशों की तुलना में अधिक समय से अपने स्वयं के मानचित्रों को लेकर बहस करता रहा है। जुलाई 1948 और फरवरी 1950 में प्रकाशित सरकारी मानचित्रों में मैकमोहन रेखा को भारत की तय पूर्वी सीमा के रूप में दिखाया गया था, और अक्साई चिन सहित पूरे पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों को केवल ‘अपरिभाषित’ छोड़ दिया गया था। पंचशील समझौते के 2 महीने बाद, 1 जुलाई, 1954 को, नेहरू ने आदेश दिया और शायद उस दौर के मिजाज को देखते हुए यह सही भी था, कि प्रत्येक पुराने सीमांत मानचित्र को वापस ले लिया जाए। उनका मानना था कि यह सीमा ‘मुख्य रूप से दीर्घकालिक प्रथा और परंपरा द्वारा परिभाषित’ थी। उनके निर्देश में आगे कहा गया कि नए मानचित्रों में ‘यह नहीं कहा जाना चाहिए कि कोई भी क्षेत्र गैर-सीमांकित है।’ एक रेखा जो 6 वर्षों से अपरिभाषित थी और एक मैकमोहन रेखा जो एक टूटी हुई, अभी तक गैर-सीमांकित, गैर-आरेखित और अनिर्धारित सीमा के रूप में चलती थी, दोनों रातों-रात ठोस रेखाओं में बदल गईं, जिसने एक पूर्व साम्राज्य के सीमांतों को एक संप्रभु राष्ट्र की सीमाओं में परिवर्तित कर दिया।

संसद ने 7 साल बाद इस पर कानूनी मुहर लगाई। आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1961 ने देश की सुरक्षा के प्रतिकूल तरीके से शब्दों, संकेतों या चित्रों द्वारा भारत की ‘क्षेत्रीय अखंडता या सीमाओं’ पर सवाल उठाने को 3 साल तक की कैद से दंडनीय अपराध बना दिया। 1990 के एक संशोधन ने इसे और कड़ा कर दिया, विशेष रूप से भारत के किसी भी ऐसे मानचित्र के प्रकाशन को अपराध घोषित कर दिया, जो सर्वे ऑफ इंडिया (भारतीय सर्वेक्षण विभाग) के आधिकारिक मानचित्र से भिन्न हो। यह ध्यान देने योग्य है कि मूल 1961 का अधिनियम जम्मू और कश्मीर पर लागू भी नहीं होता था। इस प्रकार, 13 वर्षों के भीतर, भारत एक अपरिभाषित सीमांत से एक ऐसी ठोस सीमा की ओर बढ़ गया, जिसे एक कानूनी फरमान द्वारा पवित्र माना गया, जिसने इसे किसी अन्य तरीके से खींचने को एक गैर-जमानती/जेल-योग्य अपराध बना दिया।

संयुक्त राष्ट्र के नए मानचित्र ने इन पुरानी चिंताओं में से अधिकांश को फिर से जीवित कर दिया है और कुछ नई चिंताएं भी सौंप दी हैं। भारत का अपना विवाद घर के अधिक करीब है और बहुत कुछ बयां करता है। जम्मू और कश्मीर को अभी भी संयुक्त राष्ट्र का सबसे उदार व्यवहार मिलता है, एक बिंदीदार (डॉटेड) रेखा और एक नोट कि इसकी अंतिम स्थिति ‘अभी तक पक्षों द्वारा सहमत नहीं हुई है।’ अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को ऐसा कोई शिष्टाचार नहीं मिलता और वास्तव में कभी मिला भी नहीं है। नया मानचित्र तिब्बत के साथ अरुणाचल प्रदेश के उत्तरी किनारे को एक कथित ‘भारतीय रेखा’ के रूप में खींचता है और नगालैंड के साथ इसकी सीमा को पूरी तरह से मिटाते हुए इसके दक्षिणी किनारे को एक आभासी ‘चीनी रेखा’ के रूप में दिखाता है, निहितार्थ द्वारा, न कि स्पष्ट दावे द्वारा। अक्साई चिन के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया जाता है-एक तरफ एक भारतीय रेखा, दूसरी तरफ एक चीनी रेखा और बीच में नो-मैन्स लैंड (लावारिस भूमि) की एक पट्टी, जिसे फिर से प्रत्यक्ष घोषणा की बजाय गुप्त तरीके से खींचा गया है।

कोई भी फुटनोट इनमें से किसी की व्याख्या नहीं करता और कभी किसी ने की भी नहीं है। स्पष्ट रूप से यह पूछना वाजिब है कि जब पाकिस्तान सीमा के दूसरी तरफ बैठता है तो एक रेखा तत्काल बिंदीदार क्यों हो जाती है और जैसे ही चीन बैठता है, वह रेखा सघन और दु:साहसपूर्ण तरीके से क्यों खींच दी जाती है। एक अस्वीकरण जो इस बात पर जोर देता है कि वह कोई राय नहीं रखता, इन प्रमाणों के आधार पर लगता है कि वह वास्तव में बहुत सारी राय रखता है।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसका वोट केवल समान-क्षेत्रीय मानचित्रकला के अंतॢनहित सिद्धांत पर था और भारत के संप्रभु क्षेत्र को ‘भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुसार ही दर्शाया जाना चाहिए।’ अंतर्राष्ट्रीय मामलों में इन दिनों भारतीय रुख के लिए यह एक परिचित रूपरेखा बन चुकी है। भारत ने एक मानचित्र के पक्ष में मतदान किया। भारत अब विस्तार से समझा रहा है कि उस मानचित्र का कोई महत्व क्यों नहीं है। शायद भारत अफ्रीकी संघ से नाता नहीं तोडऩा चाहता था, जिसने मानचित्रकला के इस नए टुकड़े को ‘संज्ञानात्मक न्याय और स्मरणीय क्षतिपूर्ति’ करार दिया है। हालांकि, उम्मीद है कि अफ्रीका महाद्वीप के साथ एकजुटता आने वाले समय में राष्ट्रीय क्षेत्रीय निहितार्थों की कीमत पर नहीं आएगी।-मनीष तिवारी
 (वकील, सांसद एवं पूर्व मंत्री)

 

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