Edited By ,Updated: 03 May, 2017 11:33 PM

पहलु खान की अंधी मां अपने इकलौते बेटे को याद कर बिलख-बिलख कर रो रही .....
पहलु खान की अंधी मां अपने इकलौते बेटे को याद कर बिलख-बिलख कर रो रही थी। सांत्वना के शब्द बेमानी थे। मेरा मन 80 साल पुरानी घटना को याद कर रहा था, जब शायद पहलु की मां पैदा हुई होगी। सन् 1936 में हिसार में बकरीद पर गाय की बलि को लेकर दंगा हुआ था। उस दंगे में मेरे दादाजी मास्टर राम सिंह का कत्ल हुआ था। पहलु की मां का हाथ पकड़े मेरे मन में फैज की पंक्तियां गूंज रही थीं :‘‘खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद’’।
मैं गौरक्षा का समर्थक हूं। हमारे यहां बहुसंख्यक समाज गाय को पवित्र मानता है। वैदिक काल में भले ही गौमांस का उपभोग होता हो लेकिन आज एक औसत हिंदूू का धार्मिक संस्कार उसे गौमांस खाने से रोकता है। मांस खाने वाले हिंदूू भी कुछ अपवाद छोड़कर गाय का मांस खाने से परहेज करते हैं। यूं भी कई धार्मिक संस्कारों की तरह गौरक्षा का विचार अपने आप में एक सुंदर विचार है। मानवीय संवेदना को केवल अपनी और मानव जाति की रक्षा की बजाय जीव मात्र की रक्षा से जोडऩा नि:संदेह एक श्रेष्ठ विचार है। अगर गाय इस आदर्श का प्रतीक बनती है तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?
अगर हिंदूू का धर्म उसे गौहत्या से रोकता है तो मुसलमान का धर्म उसे गाय को मारने या खाने का निर्देश नहीं देता। कुरान शरीफ का दूसरा सूरा ‘गाय’ से जुड़े किस्सों पर आधारित है। बेशक, इस्लाम में गौहत्या और गौमांस की पूरी मनाही नहीं है लेकिन कुरान शरीफ का निर्देश प्रतिबंध की दिशा में ही है-दुधारू गाय, खेती में प्रयोग न आने वाली गाय, छोटे बछड़े और बूढ़ी गाय की बलि देने पर पाबंदी है और चूंकि हजरत मोहम्मद ने गाय पाली थी, इसलिए गाय पालने को ‘सुन्नत’ यानी मुसलमान के लिए धर्मोपयुक्त काम माना गया है और सच यह है कि पहलु खान जैसे गांव में बसने वाले मुसलमान किसान सदियों से गौपालक रहे हैं। आज भी बाकी हरियाणा की तुलना में मुस्लिम बाहुल्य वाले मेवात जिले में गाय ज्यादा पाली जाती हैं।
यानी गौरक्षा के सवाल पर हिंदूू और मुसलमान का एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होना जरूरी नहीं है। इसी समझ के आधार पर भारत के संविधान में गौरक्षा को नीति निर्देशक सिद्धांत बनाया गया। अगर ईमानदार कोशिश हो तो गौरक्षा के पक्ष में एक राष्ट्रीय सहमति बन सकती है। लेकिन इसके लिए गौरक्षा समर्थकों को एक सवाल पूछना होगा :हमें गाय की रक्षा करनी है या इस बहाने मुसलमान का शिकार करना है?
अगर हमारा असली उद्देश्य गौ रक्षा है तो हमें एक कड़वे सच का सामना करना होगा। आज गाय को सबसे बड़ा खतरा उनसे नहीं है जो गौमांस खाते हैं बल्कि उनसे है जो गाय की फोटो की पूजा करते हैं। कड़वा सच यह है कि गाय के बारे में हिंदूू समाज का रवैया पाखंड से भरा हुआ है। कहने के लिए हिंदूू समाज गाय को माता कहता है, उसे तिलक लगाता है और उसके नाम पर झगड़ा करता है लेकिन वही हिंदूू गाय को बचाने के लिए रत्ती भर भी काम नहीं करता है। भारत के हर शहर में हजारों गाय प्लास्टिक और कचरा खाते हुए देखी जा सकती हैं।
पिछले साल सूखे के समय लाखों गाय गांव के बाहर घास का दाना खोज रही थीं, तड़प कर मर रही थीं। मैंने उनकी दशा पर लेख लिखे, गुहार लगाई। हिंदूू समाज उनकी रक्षा के लिए नहीं आया। एक तरफ गौ रक्षा का शोर बढ़ रहा है, दूसरी तरफ गौशालाएं बंद हो रही हैं। यानी कि गाय को बचाने की प्रथम जिम्मेदारी जिस हिंदूू समाज की है वह गाय की दशा का पहला अपराधी है। दूसरा कड़वा सच यह है कि गौ हत्या के लिए जिम्मेदार सिर्फ वह कसाई नहीं है जो जानवर को काटता है। गौ वध की पहली जिम्मेदारी उस गौ पालक की है जो दूध सूख जाने के बाद गाय को बेच देता है और बछड़ों को छोड़ देता है। इस शृंखला में उसके बाद दलाल आता है जो गाय को बूचडख़ाने तक पहुंचाता है। इस शृंखला के अंत में बड़े-बड़े स्लॉटर हाऊस आते हैं जो हजारों-लाखों गाय को काट कर उनका मांस निर्यात करते हैं। अधिकांश लोग मुसलमान नहीं, हिंदूू हैं।
तीसरा कड़वा सच यह है कि गौ हत्या और गौ मांस पर कानूनी प्रतिबंध लगाने से कुछ फायदा नहीं होगा। देश के अधिकांश राज्यों में गौ हत्या पर प्रतिबंध है लेकिन गाय को पालने में असमर्थ किसान बूढ़ी गाय को बेचता है। गौ रक्षा की व्यवस्था ठीक किए बिना गौ मांस पर प्रतिबंध लगाने का मतलब होगा हर रसोई में पुलिस इंस्पैक्टर की घुसपैठ। अखलाक जैसे कांड हर रोज हुआ करेंगे। अगर गौ रक्षा की व्यवस्था करने के बाद गौ हत्या के विरुद्ध राष्ट्रीय सहमति बनाई जा सकती है तो गैर हिंदू भी इस बात को स्वीकार कर सकते हैं लेकिन सबसे पहले हिंदू समाज अपनी जिम्मेदारी निभाए।
अगर गौ रक्षा का संकल्प लेने वालों की नियत इस बहाने मुसलमान का शिकार करने की नहीं है तो उन्हें सबसे पहले हिंदूू समाज के पाखंड का पर्दाफाश करना होगा। देश में 25 करोड़ हिंदू परिवार हैं और कुल 12 करोड़ गाय। अगर गाय की पूजा करने वाला हर परिवार एक-एक गाय को पाल ले और दूध न देने पर भी उसकी सेवा करे तो गौ रक्षा अपने आप हो जाएगी। आज किसान इस स्थिति में नहीं हैं कि वे बछड़े और बूढ़ी गाय को पाल सकें। जो गाय को पाल नहीं सकते वे गाय पालने के लिए गौशाला को चंदा दें तो गाय बच सकती है। अगर सरकारें भी गौशाला को बचाने में योगदान दें तो उसमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन मुख्य जिम्मेदारी समाज को उठानी चाहिए। पहलु खान की मां गौ सेवा के लिए तैयार है। गौ रक्षा के प्रयास में शहीद हुए, मेरे दादा जी भी जिम्मेदारी को स्वीकार कर लेते लेकिन गाय को सिर्फ टी.वी. पर देखने वाले गौ रक्षक इससे भागेंगे?