Edited By Pardeep,Updated: 29 Sep, 2018 04:39 AM

सुप्रीम कोर्ट ने गत 27 सितम्बर को अयोध्या भूमि विवाद की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत के 1994 के एक फैसले में की गई टिप्पणी से जुड़ा सवाल पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने 1994 के फैसले में टिप्पणी की थी कि मस्जिद...
सुप्रीम कोर्ट ने गत 27 सितम्बर को अयोध्या भूमि विवाद की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत के 1994 के एक फैसले में की गई टिप्पणी से जुड़ा सवाल पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने 1994 के फैसले में टिप्पणी की थी कि मस्जिद इस्लाम का अंग नहीं है।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में दीवानी वाद का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर होगा और 1994 का निर्णय इस मामले में प्रासंगिक नहीं है। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितम्बर 2010 के निर्णय के खिलाफ दायर अपीलों पर अब 29 अक्तूबर से सुनवाई होगी। स्पष्ट है कि अब अयोध्या मामले का परीक्षण साक्ष्यों के आधार पर होगा, न कि मस्जिद के धार्मिक महत्व के आधार पर।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि ढांचा गिराए जाने के इतने वर्षों बाद भी इस मामले का हल नहीं निकाला जा सका है। इन सालों में इतना जरूर हुआ कि जनता इस मुद्दे पर राजनीति करने वाले धर्माचार्यों एवं राजनेताओं के चरित्र को अच्छी तरह समझ चुकी है। यही कारण है कि अयोध्या में सामाजिक ताना-बाना पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। हालांकि राम जन्मभूमि विवाद को अनेक बार बातचीत के माध्यम से हल करने का प्रयास किया गया लेकिन इस मुद्दे पर दोनों ही सम्प्रदायों के कुछ राजनेताओं ने ईमानदारी नहीं दिखाई। इस विवाद पर कुछ राजनेता और धर्माचार्य अपना बयान बदलते रहे हैं। ऐसे मुद्दों पर कुछ राजनेताओं की बदली हुई भाषा इस देश की राजनीति के उस चरित्र की ओर इशारा करती है जो निरन्तर अपनी सुविधानुसार बदलता रहता है।
पिछले कुछ सालों में हिन्दू और मुस्लिम स्वार्थी तत्वों ने जिस तरह से देश की मूलभूत आवश्यकताओं को नकार कर भारतीय जनमानस का ध्यान मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों की ओर आकृष्ट किया है, उसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति रही है। विडम्बना यह है कि इस समयावधि में मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों से सबसे बड़ा नुक्सान आम आदमी का ही हुआ है। अयोध्या और गोधरा-गुजरात की घटनाओं के बाद शायद किसी को यह समझाने की जरूरत नहीं है कि इस तरह की घटनाओं में दंगे कराने वाले मठाधीशों का कुछ नहीं बिगड़ता है जबकि आम आदमी काफी समय तक ऐसी घटनाओं का दंश झेलता रहता है । इस समय देश में अनेक समस्याएं मुंहबाए खड़ी हैं, ऐसे में कोई भी साम्प्रदायिक तनाव देश को गर्त में पहुंचाने के लिए काफी है।
देश के कुछ स्वार्थी तत्व ऐसे मौकों का फायदा उठाकर अपना हित साधने की ताक में रहते हैं । दरअसल, ऐसे तत्वों को सबसे अधिक चिन्ता यही रहती है कि उनकी नाक ऊंची कैसे रहे। समय-समय पर ऐसे तत्वों का चरित्र उजागर होता रहता है । अनेक बार उनका यह चरित्र ही समस्या के समाधान में बाधा बन जाता है। ये स्वार्थी तत्व मंदिर-मस्जिद के जुनून में विभिन्न गंभीर समस्याओं से जकड़े इस देश के आम आदमी के दुख-दर्द से कोई सरोकार नहीं रखते हैं। यही कारण है कि ये तत्व अधार्मिक कार्य करते हुए जनता की आस्था और श्रद्धा को ढाल की तरह प्रयोग करना चाहते हैं। क्या किसी की आस्था और श्रद्धा के सामने एक लोकतांत्रिक देश की न्यायपालिका का कोई महत्व नहीं है? आस्था और श्रद्धा जनता में एक विश्वास पैदा करती हैं। ठीक उसी तरह किसी भी लोकतांत्रिक देश की न्यायपालिका का कार्य भी न्याय के माध्यम से जनता में विश्वास पैदा करना है। हमें यह समझना होगा कि हिंसा और प्रतिहिंसा का तत्व विश्व के किसी भी धर्म में नहीं है।
महात्मा गांधी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में लिखते हैं, ‘‘हिन्दुस्तान में चाहे जिस धर्म के आदमी रहें, उससे यह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है । जो नए लोग इसमें शामिल होते हैं, वे इसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे इसकी प्रजा में घुल-मिल जाते हैं। ऐसा हो, तभी कोई मुल्क एक राष्ट्र माना जाएगा। ऐसे मुल्क में दूसरे लोगों को समावेश करने का गुण होना चाहिए। हिन्दुस्तान ऐसा था और आज भी है। यूं तो जितने आदमी, उतने धर्म मान सकते हैं। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक-दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते, अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं हैं। अगर हिन्दू मानें कि सारा हिन्दुस्तान सिर्फ हिन्दुओं से भरा होना चाहिए तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं एक-देशी, एक-मुल्की हैं। वे देशी भाई हैं और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।
महात्मा गांधी का यह वक्तव्य न केवल हमारे देश की समन्वयवादी एवं सांस्कृतिक परम्परा पर प्रकाश डालता है बल्कि हिन्दुस्तान की हजारों वर्ष पुरानी सहिष्णुता की भावना को भी दर्शाता है। इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आज भी हमारे राजनेताओं के मन में हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरोने की भावना प्रबल है? कुछ राजनेताओं को साम्प्रदायिकता की आग में घी डालते देख तो उनकी इस भावना पर शक होता है । सवाल यह है कि महात्मा गांधी ने जिस रामराज की कल्पना की थी, क्या वह एक कल्पना ही रह जाएगा ?
विचारणीय प्रश्न यह है कि आज हमारे सामने मंदिर-मस्जिद का मुद्दा ज्यादा अहम है या फिर आम आदमी की रोजी-रोटी का? जिस देश में दिन-प्रतिदिन अनेक निर्दोष लोग आतंकवादियों एवं नक्सलवादियों की गोलियों का शिकार हो रहे हों ,जिस देश में बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही हो ,जिस देश में अनेक लोग भूख से मर रहे हों ,जो देश विभिन्न मोर्चों पर आर्थिक समस्याएं झेल रहा हो और जिस देश में लोग बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए ही तरस रहे हों, वहां मंदिर-मस्जिद का मुद्दा ज्यादा अहम हो सकता है या फिर आम आदमी के अस्तित्व का मुद्दा? लेकिन धर्म के ठेकेदारों ने ही धर्म को सबसे अधिक समझा है, शायद इसीलिए देश के अन्य मुद्दों को नकारते हुए धर्म के नाम पर अधार्मिक कार्य करने का अधिकार भी उन्हें ही प्राप्त है।
यदि हम नर में नारायण के दर्शन करते हुए एक आम आदमी की जिन्दगी को बेहतर बनाने के बारे में सोचते हैं तो शायद धर्म के ठेकेदारों के अनुसार यह धर्म नहीं है । धर्म के ठेकेदारों को यह कौन समझाएगा कि देश का आम आदमी कर्म को ही पूजा या इबादत मानता है और जिस दिन वह कर्म नहीं करेगा उसका मंदिर या मस्जिद तो उसी दिन डगमगाने लगेगा। देश के आम आदमी को आज अयोध्या में मंदिर या मस्जिद बनने की चिन्ता नहीं है बल्कि उसकी पहली चिन्ता तो यह है कि उसके घर रूपी मंदिर में नर रूपी नारायण किस प्रकार सुखी रहेंगे लेकिन धर्म के ठेकेदार अपना ही राग अलापते रहते हैं। अब समय आ गया है कि इस सम्बन्ध में सभी पक्ष गम्भीरता एवं संयम से काम लें । इस समय देश को साम्प्रदायिकता की आग से बचाने के लिए एक सार्थक पहल की जरूरत है।-रोहित कौशिक