जहर युक्त से जहर मुक्त तक कृषि का सफर

Edited By Updated: 23 Dec, 2023 06:20 AM

the journey of agriculture from poison rich to poison free

कृषि अर्थव्यवस्था को एक बार फिर से सजीव करने के सफल प्रयत्न को लेकर ‘सम्पूर्ण कृषि पूर्ण रोजगार, जहरयुक्त से जहरमुक्त-एक सफर’ के नारे के अंतर्गत पंजाब की धरती से लोगों को एक आवाज आई है कि समाज के समक्ष मुख्य संकट क्या है और उनका समाधान कैसे किया जा...

कृषि अर्थव्यवस्था को एक बार फिर से सजीव करने के सफल प्रयत्न को लेकर ‘सम्पूर्ण कृषि पूर्ण रोजगार, जहरयुक्त से जहरमुक्त-एक सफर’ के नारे के अंतर्गत पंजाब की धरती से लोगों को एक आवाज आई है कि समाज के समक्ष मुख्य संकट क्या है और उनका समाधान कैसे किया जा सकता है? इस मिशन का मानना है कि इस समय समाज और कृषि सैक्टर के समक्ष मुख्य तौर पर 3 संकट हैं :

1. आर्थिक संकट, 2. पौष्टिक संकट, 3. प्रदूषण संकट

आर्थिक संकट : आधुनिक युग में आॢथक संकट से पूरा समाज ही प्रभावित है मगर पंजाब की अर्थव्यवस्था प्रमुख तौर पर कृषि केंद्रित होने के कारण किसान प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हैं। यह संकट निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। सरकारी और गैर-सरकारी विभाग इस संकट के समाधान के लिए प्रयत्नशील तो हैं मगर उनके सार्थक नतीजे सामने नहीं आ रहे बल्कि यह संकट दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।

इसके प्रमुख कारण क्या हैं? इसे समझने की जरूरत है। इस मिशन का मानना है कि कृषि पैदावार में लागत वस्तुओं की कीमतें और खेती उपज की बिक्री कीमतों पर किसान का कोई नियंत्रण नहीं है जिसके फलस्वरूप किसान का खर्चा निरंतर बढ़ रहा है लेकिन उसे अच्छी कीमत प्राप्त नहीं हो रही जिसके नतीजे में अगली फसल की बिजाई के लिए उसे ऋण लेना पड़ता है। कृषि की प्रारंभिक जरूरतें जैसे डीजल, मशीनरी, बीज, रासायनिक खादें और नदीन नाशक और कीड़ेमार दवाइयों की कीमतें बहुत अधिक हैं और किसान महंगी दर पर इन्हें खरीदने के लिए विवश हैं। 

2. पौष्टिक संकट : रासायनिक उर्वरक और कीड़ेमार दवाइयों का निरंतर लम्बे समय से इस्तेमाल होने के कारण खेती उपज में इनके अंश जमा हो रहे हैं। इसके नतीजे में अनाज, फल, सब्जियां और पशुओं के चारे की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। मवेशी उत्पाद दूध और मीट भी पौष्टिक नहीं रहे।

3. प्रदूषण संकट : रासायनिक उर्वरकों और कीड़ेमार दवाइयों के इस्तेमाल ने कृषि के लिए हवा, पानी और भूमि के प्रदूषण की एक बहुत बड़ी समस्या पैदा कर दी है। यदि वक्त पर इस ओर ध्यान न दिया गया तो आने वाले कुछ सालों में पंजाब की धरती बंजर बन जाएगी। उपरोक्त तथ्यों से क्या नतीजा निकलता है और क्या यह किसानी वर्ग और कृषि के साथ इंसाफ हो रहा है?

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। यहां एक बात वर्णनीय है कि उपरोक्त बताई गई मुश्किलें किसान के शरीर के इर्द-गिर्द लिपटी हुई जंजीरें हैं जिनकी ताकत और जकड़ निरंतर मजबूत होती जा रही है। इन जंजीरों की बढ़ती जकड़ ही पौष्टिक संकट और प्रदूषण संकट को जन्म देती है। डीजल, रासायनिक खादें, कीड़ेमार दवाइयां और बीजों की बढ़ती कीमतों के साथ किसान मानसिक व शारीरिक तौर पर कमजोर होता जा रहा है और समाज में उदासीनता का माहौल दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

क्या कृषि सैक्टर से संबंधित नीति -निर्माण विभिन्न एजैंसियों और सरकार के पास इसका कोई सार्थक समाधान है? नहीं, यह सिर्फ विभिन्न स्कीमों को शुरू कर टाइमपास करने के लिए कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए कैसा सिस्टम होना चाहिए : 

  • किसान के लिए मुनाफा हो।
  • सिस्टम लागू करने में आसान हो।
  • खेती की रोजाना आमदन में बढ़ौतरी हो।
  • लागतों के लिए किसानों को कम खर्चा करना पड़े।
  • प्राकृतिक संसाधनों का योग्य इस्तेमाल हो। 
  • वातावरण को शुद्ध करने के लिए  सक्षम हो।

ऐसे सिस्टम को लोकहित सिस्टम कहा जा सकता है। यहां यह भी बताते हुए खुशी महसूस हो रही है कि पिछले 30-31 वर्षों की मेहनत के उपरांत पंजाब की धरती पर प्रयोग और परीक्षण की धारणा के तहत अब भी ऐसा सिस्टम चल रहा है जिसका विधिवत तरीके के साथ निपटान निम्नलिखित है :

कृषि का प्रकृतिकरण

मूल सिद्धांत : वैज्ञानिक नजरिए के साथ कुदरत की ओर से प्रदान किए गए 5 तत्व (भूमि, गगन, वायु, अग्रि और नीर) का योग्य इस्तेमाल। 
उद्देश्य : कृषि को सेहतमंद, लाभदायक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए बनाना। 
मिशन की सामथ्र्य : किसानों, संस्थाओं और सरकारी एजैंसियों को कृषि संकट में से निकलने के लिए सक्षम बनाना। कृषि  सैक्टर को अक्सर तीन भागों जैसे पैदावारी हिस्सा, प्रोसैसिंग और मंडीकरण में बांटा जाता है।

वर्तमान में चल रहा पैदावारी सिस्टम जो ज्यादा लागत वाला माडल है, के स्थान पर ऐसे कृषि सिस्टम की जरूरत है जो कम लागत, लागू करने में आसान, स्तरीय उपज देने और ज्यादा आमदन देने में सक्षम हो। इस मिशन के तहत पैदावारी सिस्टम को कृषि का प्रकृतिकरण नाम दिया गया है। विश्वास पत्थर में भी जान डाल देता है और किसानी समूहों का विश्वास एक करिश्मा है। ऐसी सोच को अपनाकर फाम्र्स प्रोड्यूस प्रोमोशन सोसायटी (फैपरो) गांव घुगियाल जिला होशियारपुर में एक सोसायटी 300 से अधिक किसानों के प्रयास से रजिस्टर करवाई गई है और विभिन्न क्षेत्रों में कार्य आरंभ किए गए हैं।

फैपरो उद्यम बुद्धिजीवियों, सामाजिक दार्शनिकों, भारत सरकार के कुछ अधिकारियों की ओर से एक नया उद्यम स्थापित किया गया है और भविष्य में इसे लागू करने के लिए सिफारिशें भी की गई हैं। समाज के प्रत्येक वर्ग, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, किसानों, पंचायतों और प्रत्येक स्तर की सरकारों को इस मिशन में शामिल होने की अपील की गई है। आओ मिलकर प्रयत्न करें और कृषि संकट को तिलांजलि देते हुए आगे बढ़ें। -अवतार सिंह ‘फगवाड़ा’

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