बंगालियों की प्रताड़ना का पिछला हिसाब और अगली राजनीति

Edited By Updated: 18 May, 2026 05:01 AM

the past and future politics of the persecution of bengalis

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता शुभेंदु अधिकारी ने प्रदेश की सत्ता संभालते ही कई ऐतिहासिक और सख्त प्रशासनिक घोषणाएं की हैं। यह राज्य के प्रशासनिक ढांचे को नया रूप देने की एक बड़ी कवायद है। शुभेंदु अधिकारी ने शनिवार...

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता शुभेंदु अधिकारी ने प्रदेश की सत्ता संभालते ही कई ऐतिहासिक और सख्त प्रशासनिक घोषणाएं की हैं। यह राज्य के प्रशासनिक ढांचे को नया रूप देने की एक बड़ी कवायद है। शुभेंदु अधिकारी ने शनिवार को शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ अपनी पहली समीक्षा बैठक में निर्देश दिया कि राज्य के सभी थानों को पिछले 5 वर्षों के दौरान हुई पुलिस ज्यादती और उत्पीडऩ की शिकायतों को अनिवार्य रूप से स्वीकार करना होगा। यानी वे सभी मामले जो 2021 से अब तक हैं  और अभी तक पुलिस ने उन्हें दर्ज नहीं किया है। अब ऐसे लोग या भाजपा कार्यकत्र्ता, जिनके पास उत्पीडऩ की पुरानी शिकायतें हैं, वे अब थाने जाकर दर्ज करा सकते हैं।

ऐसी शिकायतों का मुख्य संबंध राजनीतिक हिंसा, अवैध वसूली, कट मनी और तोला बाजी और चुनावी गड़बडिय़ों से रहा है। हजारों मामले ऐसे बताए जाते हैं, जिनमें पीड़ितों ने डर या पुलिस की निष्क्रियता के कारण औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई या पुलिस ने उन्हें दर्ज करने से मना कर दिया। विपक्षी कार्यकत्र्ताओं (विशेषकर भाजपा) द्वारा अपने घरों से बेदखल किए जाने और संपत्ति में तोडफ़ोड़ की कई शिकायतें राजनीतिक और सामाजिक दबाव के कारण थानों तक नहीं पहुंच पाईं। चुनाव बाद की हिंसा के दौरान महिलाओं के उत्पीड़न और छेड़छाड़ के हजारों मामले सामने आए, जिनमें से कई सामाजिक कलंक और धमकियों के डर से पुलिस में औपचारिक रूप से दर्ज नहीं हो सके। 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के कारण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक जांच समिति बनी थी। समिति ने पाया था कि बहुत सी शिकायतें थानों में नहीं ली गईं और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब थी। 

शुभेंदु अधिकारी ने 4 प्रमुख श्रेणियों का उल्लेख किया, जिनके तहत पीड़ित लोग अब थानों में अपनी नई शिकायतें या प्राथमिकी दर्ज करा सकते हैं, जिनमें राजनीतिक हिंसा, पुलिस बर्बरता, महिला उत्पीडऩ, जबरन वसूली और रिश्वतखोरी शामिल हैं। शुभेंदु अधिकारी की बैठक राजनीतिक रूप से भी बेहद प्रतीकात्मक रही, क्योंकि इसका आयोजन डायमंड हार्बर में किया गया था, जो पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टी.एम.सी. महासचिव अभिषेक बनर्जी का लोकसभा क्षेत्र है। यानी सबसे ज्यादा मामले यहीं के हो सकते हैं और शिकायतें तो बहुत ही होंगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अभिषेक बनर्जी के खिलाफ रणनीति आक्रामक और कानूनी कार्रवाई पर केंद्रित है।

चुनाव प्रचार के दौरान कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के आरोप में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई है। शुभेंदु अधिकारी ने अभिषेक बनर्जी के स्वामित्व वाली कंपनी ‘लीप्स एंड बाउंड्स’ की 24 संपत्तियों की सूची का खुलासा किया है और उनकी जांच की बात कही है। इसके अलावा मुख्यमंत्री ने एक और बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल में गठित पुलिस वैल्फेयर बोर्ड को तत्काल प्रभाव से भंग करने का ऐलान किया। शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि यह बोर्ड अपने मूल उद्देश्यों से भटक गया था और एक राजनीतिक संगठन की तरह काम कर रहा था।

मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी पहली कैबिनेट बैठक में, उन्होंने पश्चिम बंगाल में आयुष्मान भारत योजना और जनगणना कार्य को तुरंत लागू करने की मंजूरी दी। साथ ही, केंद्र की सहायता वाली अन्य योजनाओं को भी राज्य में हरी झंडी दे दी गई है। राज्य में अवैध वसूली सिंडिकेट और टोल नाकों को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। ऑटो चालकों, ई-रिक्शा चालकों या फेरीवालों से कोई भी अवैध वसूली नहीं करने के निर्देश भी दिए गए हैं। ऐसा होने पर लोग सीधे पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

प. बंगाल में सबसे बड़ी समस्या सरकारी योजनाओं का लाभ देने, आवास आबंटन या सरकारी नौकरियों के नाम पर तृणमूल कार्यकत्र्ताओं और स्थानीय नेताओं द्वारा अवैध रूप से ‘कटमनी’ वसूली की रही है। निर्माण सामग्री की आपूर्ति पर स्थानीय नेताओं और सिंडिकेट का कब्जा होता था, जो जबरन अपनी दरों पर घटिया सामग्री बेचकर वसूली करते थे। स्थानीय क्लबों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और ठेकेदारों को डरा-धमका कर हर महीने अवैध हफ्ता वसूली आम बात थी। सड़कों और निर्माण क्षेत्रों में अवैध रूप से ड्रॉप गेट या बैरिकेड लगाकर अवैध टोल टैक्स वसूला जाता था।  

अब तय है कि आम आदमी की उम्मीद यह रहेगी कि इस तरह की गतिविधियों पर अब पूरी तरह से लगाम लग जाए। हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के छोटे-बड़े नेता जिस तरह स्थानीय गुंडों पर पार्टी के बड़े नेताओं की शह पर यह सब होने के आरोप लगा रहे हैं उससे साफ है कि पहले जो ऐसे लोग कभी वामपंथी शासन में शह पा रहे थे, वही लोग टी.एम.सी. में आ गए। खतरा यही है कि आवरण बदलकर ये कहीं भाजपा में न आ जाएं। शुभेंदु अधिकारी जब विपक्ष में थे तो अक्सर टी.एम.सी. के नेताओं पर संगठित अपराध में शामिल होने का आरोप लगाते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में नौकरियों में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी भाजपा ने उठाया था। राज्य में साल 2016 में स्कूल सेवा आयोग की ओर से आयोजित भर्ती परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली और घोटाले के आरोप लगे थे। करीब एक साल पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 25,000 शिक्षकों की भर्ती रद्द कर दी थी। ऐसे में अब भाजपा की सरकार आने के बाद एक स्वच्छ सरकार देना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। खासतौर से तब, जब भाजपा के नेताओं पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं।

इस सबके बावजूद कहा जा सकता है कि शुभेंदु अधिकारी को और बंगाल में नई-नई सत्ता में आई भाजपा सरकार को उन सब गलतियों से बचना होगा। अपराध से निपटने के लिए उन्होंने योगी मॉडल की शुरुआत तो कर ही दी है। पार्टी कार्यकत्र्ता तृणमूल या माकपा कार्यकत्र्ताओं के ढर्रे पर न चलने पाएं, यह देखना सबसे जरूरी होगा। पश्चिम बंगाल के भद्र नागरिकों की शिकायतों पर अगर ईमानदारी से काम हुआ तो इसके नतीजे स्थाई और कारगर होंगे।-अकु श्रीवास्तव
 

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