ए.आई. की दौड़ में निवेश बहुत, लाभ कम

Edited By Updated: 29 Aug, 2026 03:24 AM

the race for ai has seen high investment low returns

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) आज केवल एक तकनीकी अवधारणा नहीं रह गई, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, उद्योग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और शासन व्यवस्था के केंद्र में आ चुकी है। जिस प्रकार 20वीं सदी में बिजली और इंटरनैट ने दुनिया की आॢथक संरचना को बदल...

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) आज केवल एक तकनीकी अवधारणा नहीं रह गई, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, उद्योग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और शासन व्यवस्था के केंद्र में आ चुकी है। जिस प्रकार 20वीं सदी में बिजली और इंटरनैट ने दुनिया की आर्थिक संरचना को बदल दिया था, उसी प्रकार 21वीं सदी में ए.आई. को परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम माना जा रहा है। दुनिया की लगभग सभी बड़ी कंपनियां ए.आई. पर अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। निवेशकों का विश्वास है कि ए.आई. उत्पादकता को तो बढ़ाएगा ही, साथ ही लागत को भी घटाएगा और नए व्यापारिक अवसर पैदा करेगा। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह निवेश वास्तविक लाभ में बदल रहा है?

हाल ही में प्रकाशित ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म ‘के.पी.एम.जी.’ की टैक रिपोर्ट ने इस उत्साह के पीछे छिपी वास्तविकता को सामने रखा है। यह रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश कंपनियां ए.आई. को अपनाने की होड़ में तो शामिल हैं लेकिन वास्तविक और स्थायी लाभ बहुत कम संस्थाओं को मिल पा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की बड़ी कंपनियां ए.आई. पर लगातार निवेश बढ़ा रही हैं लेकिन इससे लगातार मुनाफा सिर्फ 10 फीसदी कंपनियां ही कमा पा रही हैं। टैक रिपोर्ट में यह निष्कर्ष 1 अरब डॉलर (लगभग 9,573 करोड़ रुपए) से अधिक आय वाली 155 कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों के सर्वे के आधार पर निकाला गया है। 

रिपोर्ट के मुताबिक 74 फीसदी टैक कंपनियां डिजिटल तकनीकों पर सालाना औसतन 479 करोड़ रुपए खर्च कर रही हैं, जबकि 51 फीसदी कंपनियां औसतन 957 करोड़ रुपए से अधिक निवेश कर रही हैं। लेकिन कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के अनुसार कुल डिजिटल आय में ए.आई. का योगदान सिर्फ 21 से 40 फीसदी के बीच ही है। ए.आई. उनके ज्ञान-आधारित कर्मचारियों की उत्पादकता तो बढ़ा रहा है लेकिन केवल लगभग एक-तिहाई संस्थाएं ही ए.आई. को बड़े पैमाने पर उत्पादन और व्यावसायिक प्रक्रियाओं में सफलतापूर्वक लागू कर पाई हैं।

वस्तुत: ए.आई. से अपेक्षाएं असाधारण हैं। यह डाटा विश्लेषण, ग्राहक सेवा, अनुसंधान, वित्तीय प्रबंधन, उत्पादन नियंत्रण, चिकित्सा निदान और प्रशासनिक कार्यों में अभूतपूर्व दक्षता प्रदान कर सकता है। ‘के.पी.एम.जी.’ के एक वैश्विक सर्वेक्षण के अनुसार 64 प्रतिशत से अधिक संगठन मानते हैं कि ए.आई. पहले की तुलना में उन्हें सार्थक व्यावसायिक लाभ प्रदान कर रहा है, जिसके कारण ए.आई. एजैंट्स और स्वचालन तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। वहीं 90 फीसदी कंपनियों ने नई नौकरियों में ए.आई. को शामिल किया है एवं 89 फीसदी कंपनियां एजैंटिक ए.आई. में निवेश कर रही हैं। इसके बावजूद 54 फीसदी कर्मचारी महसूस करते हैं कि वे इस दौड़ में पीछे छूट रहे हैं। हालांकि 83 फीसदी कंपनियों को भरोसा है कि उनके कर्मचारी फैसले लेने में ए.आई. पर भरोसा करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार 61 फीसदी कंपनियों का कहना है कि तकनीक बदलने की तेज रफ्तार के कारण योजनाएं बार-बार बदलनी पड़ती हैं। पुराने सिस्टम और जटिल इंटीग्रेशन इस रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट हैं। अनेक कंपनियां अभी भी प्रयोग, परीक्षण और सीमित परियोजनाओं के स्तर पर ही हैं। कई कंपनियों को यह अनुभव हो रहा है कि ए.आई. को केवल एक अतिरिक्त उपकरण के रूप में जोडऩे से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होते। इसके लिए पूरी कार्य-संस्कृति और निर्णय प्रक्रिया में परिवर्तन आवश्यक है।

ए.आई. के बढ़ते उपयोग ने दुनिया भर के कर्मचारियों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न की है। यही कारण है कि कंपनियां अब केवल तकनीक में निवेश नहीं कर रहीं, बल्कि कर्मचारियों के पुनप्र्रशिक्षण और कौशल उन्नयन पर भी ध्यान दे रही हैं। जिन संगठनों ने अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया है, उन्हें ए.आई. से अधिक लाभ मिला है। ए.आई. का दूसरा बड़ा पक्ष साइबर सुरक्षा है। 36 फीसदी टैक लीडर्स इसे सबसे बड़ी चिंता मानते हैं और अगले 24 महीनों में यह आंकड़ा बढ़कर 41 फीसदी तक होने का अनुमान है। अब ए.आई. अपनाने से आगे बढ़कर इसे सुरक्षा उपायों के साथ लागू करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 

भारत के लिए यह विमर्श और भी महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश में डिजिटल भुगतान, ई-गवर्नैंस, स्टार्टअप और आई.टी. सेवाओं का व्यापक विस्तार हुआ है। भारतीय तकनीकी कंपनियां भी ए.आई. को अपनाने में अग्रणी बनने का प्रयास कर रही हैं। के.पी.एम.जी. इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 81 प्रतिशत तकनीकी कंपनियां अगले 12 महीनों में अपने उत्पादों और सेवाओं में व्यवस्थित रूप से ए.आई. को शामिल करने की योजना बना रही हैं तथा 63 प्रतिशत कंपनियां ए.आई. निवेश में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि करने की तैयारी में हैं।

हालांकि भारत के सामने पहली चुनौती डिजिटल असमानता की है। देश का एक बड़ा वर्ग अभी भी गुणवत्तापूर्ण इंटरनैट, डिजिटल शिक्षा और तकनीकी संसाधनों से वंचित है। यदि ए.आई. आधारित विकास केवल शहरी और कॉर्पोरेट क्षेत्रों तक सीमित रह गया, तो सामाजिक और आॢथक विषमता और बढ़ सकती है। दूसरी चुनौती कौशल विकास की है। विश्व आर्थिक मंच सहित अनेक संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि आने वाले वर्षों में लाखों नौकरियों का स्वरूप बदलेगा। ऐसे में भारत को अपने युवाओं को ए.आई., डाटा विज्ञान, मशीन लॄनग और डिजिटल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित करना होगा।

तीसरी चुनौती नियामकीय ढांचे की है। यूरोप, अमरीका और चीन जैसे देश ए.आई. शासन के लिए नीतियां विकसित कर रहे हैं। भारत को भी नवाचार और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने वाला मजबूत ढांचा तैयार करना होगा। तकनीक तभी लाभदायक बनती है जब उसका उपयोग स्पष्ट व्यावसायिक उद्देश्यों के साथ किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य उन्हीं संस्थाओं का होगा जो ए.आई. को केवल लागत घटाने के साधन के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार और मूल्य सृजन के उपकरण के रूप में देखें।-ऋषभ मिश्रा 
    

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