भारतीय महिलाओं के बच्चे न पैदा करने का असली कारण

Edited By Updated: 04 Jan, 2026 05:48 AM

the real reason why indian women are not having children

महिलाओं की प्रजनन क्षमता पर हर किसी की अपनी राय है। जोहो के श्रीधर वेम्बू ने हाल ही में इस विषय पर अपनी राय देते हुए महिलाओं को सलाह दी कि वे 20 की उम्र में ही बच्चे पैदा कर लें, न कि इस फैसले को टालें। महिलाओं को प्रजनन संबंधी ज्ञान देना कोई नई बात...

महिलाओं की प्रजनन क्षमता पर हर किसी की अपनी राय है। जोहो के श्रीधर वेम्बू ने हाल ही में इस विषय पर अपनी राय देते हुए महिलाओं को सलाह दी कि वे 20 की उम्र में ही बच्चे पैदा कर लें, न कि इस फैसले को टालें। महिलाओं को प्रजनन संबंधी ज्ञान देना कोई नई बात नहीं है। गर्भनिरोधक के अभाव के दौर में, इसका मतलब था कुंवारी युवा दुल्हनों की जल्दी शादी कर देना और क्रिकेट टीम के आकार के परिवार पैदा करना। वास्तव में, कोई विकल्प नहीं था, यह प्रजाति के अस्तित्व का सवाल था। फिर, हमने बीमारियों को रोकने के तरीके खोजे, यहां तक कि कुछ को खत्म भी कर दिया। जो बच्चे पहले जन्म के समय या शिशु अवस्था में मर जाते थे, वे नहीं मरने लगे। जनसंख्या का आंकड़ा लाखों से बढ़कर एक अरब से अधिक हो गया, सटीक रूप से कहें तो 1.4 अरब। अब, अर्थशास्त्री और विचार-संस्थाएं चेतावनी दे रही हैं कि हमारा जनसांख्यिकीय लाभांश जनसांख्यिकीय गिरावट में बदल रहा है। हममें से जो लोग ऐसे युग में पले-बढ़े हैं, जहां सरकार ने ‘हम दो, हमारे दो’ को आदर्श के रूप में बढ़ावा दिया, उनके लिए यह बात स्वाभाविक रूप से भ्रमित करने वाली है। फिर, जनसंख्या को एक ‘समस्या’ के रूप में बेचा गया और निरोध को रामबाण के रूप में प्रस्तुत किया गया।

अब बात करते हैं ‘जैनरेशन एक्स’ की, जो 1990 के दशक में शादी के लिए तैयार हुई। रविवार के अखबारों में आधे से ज्यादा सांकेतिक भाषा में लिखे वैवाहिक विज्ञापन भरे रहते थे। आई.आई.एम. अहमदाबाद के 1993 बैच (जिसमें मैं भी शामिल हूं) के पास ‘प्रेम विवाह’ या ‘तयशुदा विवाह’ का विकल्प था। ‘मैं शादी नहीं करूंगा’ जैसा कोई विकल्प था ही नहीं। शादी के बाद, आप 2 से 5 साल के भीतर ‘खुशखबरी’ सुना देते थे। हममें से कई लोग ‘हमारे दो’ से ‘हमारा एक’ पर पहुंच गए, लड़का हो या लड़की, कोई भी चलेगा। तो, अगली पीढ़ी के लिए एकमात्र ताॢकक संख्या शून्य ही हो सकती थी। और अब जब आप स्वाइप करके अपनी जिंदगी जी सकते हैं, तो शादी करने की जरूरत ही क्या है? लेकिन यहां तक कि जो लोग करण जौहर से प्रेरित अपनी खुद की शादी के प्रोडक्शन के स्टार बनने से खुद को रोक नहीं सकते, उनके लिए भी बच्चे अभी नहीं हैं-अभी नहीं, और शायद कभी नहीं। ऐसा क्यों हो रहा है, इस बारे में कई तरह के सिद्धांत हैं। ‘लड़कियां करियर पर बहुत ज्यादा ध्यान देना चाहती हैं’ से लेकर ‘युवा बड़े होकर जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते’ तक। लेकिन जिन साहसी माता-पिता के बच्चे हैं, उन्हें देखकर मैं एक अलग निष्कर्ष पर पहुंची हूं। समस्या शायद वही है जिसे मैं ‘परफैक्ट पेरैंट सिंड्रोम’ कहती हूं।जीवन में उच्च उपलब्धि हासिल करने वाले आज के युवा जोड़े न केवल कार्यालय में, बल्कि पालन-पोषण के क्षेत्र में भी सर्वोच्च स्थान पाने का प्रयास करते हैं।


मैंने ऐसे माता-पिता देखे हैं, जो आगंतुकों से कहते हैं कि ‘घंटी न बजाएं’ क्योंकि इससे बच्चे को परेशानी होगी। ऐसे माता-पिता भी हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि उनका बच्चा कभी भी अकेला न रहे, एक मिनट के लिए भी नहीं। और ऐसे भी हैं जो चम्मच लेकर उनके पीछे-पीछे दौड़ते रहते हैं और कहते हैं, ‘बस एक और निवाला!’ स्वाभाविक रूप से, इंस्टाग्राम पर दिखने वाली मनमोहक तस्वीरों के बावजूद, पालन-पोषण करना बेहद थका देने वाला काम है। ‘क्रिकेट टीम’ पालने वाली हमारी दादी-नानी को ऐसी कोई ङ्क्षचता नहीं होती थी। उनके पास चाचा-बुआ, दीदी-भैयाओं का एक पूरा समूह होता था, जो मिलकर बच्चे की परवरिश करता था। इसका मूल अर्थ था- बच्चे को खाना खिलाना और कपड़े पहनाना। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना कि कहीं वह आसपास पड़ी चमकदार धातु की वस्तुओं को निगलकर खुद को नुकसान न पहुंचा ले।अब सारा दबाव माता-पिता पर है, विशेषकर मां पर। अगर वह काम करती है, तो इसका मतलब है ऑफिस की राजनीति के साथ-साथ घर पर नौकरानी, सहायक नौकरानी, रसोइया, आया, ड्राइवर, धोबी आदि का भी ध्यान रखना। और इतनी सारी मदद के बावजूद और सिर्फ एक बच्चे के साथ भी, वह अपनी मां से 10 गुना ज्यादा तनाव में रहती है, जो दिन में 3 बार खाना खुद बनाती थी।

तो, आप पूछ सकते हैं कि इसका समाधान क्या है? कम उम्र में (20 के दशक के अंत में) बच्चे पैदा करना-हां, कुछ समय के लिए यह थोड़ा अस्त-व्यस्त जरूर होगा, लेकिन फिर आपके पास 40 और उसके बाद का पूरा जीवन आनंद लेने के लिए होगा या फिर देर से (30 के दशक के मध्य और उसके बाद) बच्चे पैदा करना-आपके पास ज्यादा संसाधन होंगे और (उम्मीद है) आप ज्यादा परिपक्व भी होंगे? हालांकि, आपको 50 की उम्र में भी स्कूल की पेरैंट्स-टीचर एसोसिएशन  (पी.टी.ए.) में भाग लेना पड़ेगा। उम्र चाहे जो भी हो, बच्चों की परवरिश करना आज के समय में पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। बच्चों के पालन-पोषण के लिए जिस तरह के सामाजिक सहयोग की जरूरत होती है, वह अब हमारे पास नहीं है, और न ही कोई वैकल्पिक सहायता प्रणाली है। हममें से कितने लोगों के पास ऐसे पड़ोसी हैं जो परिवार जैसे हैं और जिन पर हम भरोसा कर सकते हैं कि जरूरत पडऩे पर हमारा बच्चा उनके साथ 1-2 घंटे बिता सकता है? शायद ऐसे लोग मौजूद हों लेकिन हमें उन्हें जानने का समय ही नहीं मिलता।

और फिर कुछ आई.आई.एम. से पढ़े-लिखे दंपत्ति भी होते हैं, जो पूरी गंभीरता से कहते हैं, ‘हम बच्चे का खर्च नहीं उठा सकते।’ उनका असल मतलब होता है-हम अपने बच्चे को शहर के सबसे महंगे स्कूल में और बाद में किसी बेहद महंगी आइवी लीग यूनिवॢसटी में नहीं भेज पाएंगे (जो कि जन्मसिद्ध अधिकार है!)। भाई, बच्चों को इन चीजों की जरूरत नहीं होती-उन्हें बस प्यार चाहिए। और हां, थोड़ा संघर्ष किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि शायद यही उनके लिए जरूरी हो ताकि वे कूल, आत्मविश्वासी, संतुष्ट, जागरूक और समाज के लिए उपयोगी नागरिक बन सकें।-रश्मी बंसल 

Related Story

    Trending Topics

    IPL
    Royal Challengers Bengaluru

    190/9

    20.0

    Punjab Kings

    184/7

    20.0

    Royal Challengers Bengaluru win by 6 runs

    RR 9.50
    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!