‘सतलुज’ की खामोशियां : इस फिल्म के जवाब में हैं कई और पहलू

Edited By Updated: 19 Jul, 2026 05:07 AM

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‘सतलुज’ फिल्म में कुछ ऐसे पल हैं जब पंजाब पुलिस के अनैतिक तौर-तरीके आपका दिल दहला देते हैं। 1988 में, पंजाब की रिपोर्टिंग करते समय, मैंने खालिस्तान के लिए लडऩे वाले आतंकवादियों द्वारा आम लोगों पर बरपाई गई भयानक क्रूरता को देखा था। तब भी मेरा दिल दहल...

‘सतलुज’ फिल्म में कुछ ऐसे पल हैं जब पंजाब पुलिस के अनैतिक तौर-तरीके आपका दिल दहला देते हैं। 1988 में, पंजाब की रिपोर्टिंग करते समय, मैंने खालिस्तान के लिए लडऩे वाले आतंकवादियों द्वारा आम लोगों पर बरपाई गई भयानक क्रूरता को देखा था। तब भी मेरा दिल दहल गया था। कहानी का यह हिस्सा फिल्म से पूरी तरह गायब है। ‘सतलुज’ उन लोगों की कहानी बयां करती है जिनकी न्याय की तलाश हर मोड़ पर नाकाम कर दी गई। यह हमें जसवंत सिंह खालड़ा द्वारा पुलिस से हजारों गायब हुए लोगों का हिसाब मांगने के सफर पर ले जाती है। लेकिन जैसा कि लगभग सभी कहानियों में होता है, इसके भी कई पहलू हैं। ‘सतलुज’ आतंकवादियों द्वारा फैलाई गई हिंसा और खौफ को पूरी तरह से खारिज (नजरअंदाज) कर देती है।

यह अक्तूबर 1988 की बात है, जब  मैं एक वीडियो—‘द चिल्ड्रन ऑफ पंजाब’ (पंजाब के बच्चे) का संपादन कर रही थी—चारों तरफ दुख का माहौल गहरा था। एक आठ साल के लड़के ने कहा, ‘पंजाब कभी एक खूबसूरत जगह हुआ करता था। अब हम इस डर में जीते हैं कि किसी भी पल आतंकवादी हमारे घर आ जाएंगे।’ फिर वह रो पड़ा और पंजाबी में बोला, ‘आंटी जी, तुहानु अंदाजा नहीं है कि असीं किना दुख झलिया है।’ आतंकवादियों ने उसके 18 साल के बड़े भाई को गोलियों से भून दिया था। छोटा भाई उसे बहुत याद करता था। एक बच्चा जो बस में हुए बम धमाके में अंधा हो गया था। इंटरव्यू के समय, उसे यह नहीं पता था कि जब उसकी आंखों से पट्टियां हटाई जाएंगी, तो वह अंधा हो चुका होगा। उसके बिस्तर के पास बैठी उसकी मां सदमे से गूंगी हो गई थी। आठ साल के दो पड़ोसी बच्चे जो हर दिन एक ही जगह साथ खेलते थे, उसी जगह पर हुए बम धमाके में मारे गए। एक हिंदू था, दूसरा सिख। दोनों परिवार गम में एक-दूसरे में सिमट गए थे।

1984 में इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने और उसके बाद दिल्ली में सिखों के भयानक नरसंहार के बाद, पंजाब में गुस्सा भड़क उठा। हजारों लोग आतंकवादियों के साथ जुड़ गए, जो एक स्वतंत्र खालिस्तान बनाने में विश्वास रखते थे। राजीव गांधी ने, असम में अपने कार्यकाल से के.पी.एस. गिल की साख को अच्छी तरह से जानते हुए, उन्हें पंजाब में हिंसा को दबाने के लिए नियुक्त किया।  जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है, गिल और उनके लोग बेरहम थे। लापता युवाओं के बारे में बाद में इंटरव्यू में, गिल को कोई पछतावा नहीं था। उनकी नजऱों में, वह युद्ध में एक सैनिक थे और युद्ध में दुश्मन का खात्मा होना ही चाहिए। लेकिन युद्ध में, वर्दी आपके दुश्मन की पहचान कराती है। गिल ने वह किया जिसे अब बिना किसी जवाबदेही के  ‘प्रोफाइल टारगेटिंग’ कहा जाता है। युवाओं को बसों, ट्रेनों, मोटरसाइकिलों से उतार दिया जाता था और वे ऐसे ले जाए जाते थे कि फिर कभी दिखाई नहीं देते थे।

खालिस्तान के लड़ाकों की बर्बरता इससे भी बदतर थी और इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। हिंदुओं को अलग कर दिया गया और महिलाओं व बच्चों सहित बेरहमी से गोली मार दी गई। खालिस्तान के लड़ाकों ने नागरिकों और अधिकारियों पर भीषण हमले किए, जिसमें 21,000 से अधिक लोग मारे गए। जुलाई 1987 में लालड़ू में 38 हिंदुओं को बस से उतारकर मार डाला गया। अगले दिन फतेहाबाद में 34 हिंदू यात्रियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जून 1991 में लुधियाना के पास एक ट्रेन में 76 हिंदुओं का नरसंहार किया गया। दिसंबर 1991 में एक और ट्रेन हमले में 52 और हिंदू मारे गए। जून 1991 में यू.पी. और बिहार से ट्रेनों में आ रहे 126 प्रवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया। 

पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह, जनरल अरुण वैद्य और लाला जगत नारायण सभी की हत्या कर दी गई। दर्जनों निचली अदालत के जजों, मजिस्ट्रेटों और पंजाब पुलिस के कर्मियों के परिवारों को निशाना बनाया गया और मार डाला गया। पुलिस और सरकार को जवाबदेह होना ही होगा। ‘सतलुज’ यही मांग करती है। लेकिन वही मापदंड उन आतंकवादियों पर क्यों नहीं लागू किए जाते जिन्होंने ऐसे जघन्य कृत्य किए?  यह फिल्म भारत में प्रतिबंधित है। यह उल्टा असर डालने वाला है, क्योंकि लोग इसे देखने का कोई न कोई तरीका ढूंढ ही लेते हैं, जैसा कि मैंने ढूंढा।  ‘सतलुज’   एक ऐसी कहानी कहती है जिसे बताया जाना जरूरी था। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। यह चिंताजनक है कि पंजाब के युवा, जो कुछ दिखाया गया है, उससे भड़क सकते हैं। अगर पंजाब का इतिहास हमें कुछ सिखाता है, तो वह यह है कि जब हम कहानी का केवल आधा हिस्सा ही बताते हैं, तो अगली पीढ़ी इसे पूरा सच मान बैठती है। मैंने उस इतिहास के एक हिस्से की रिपोर्टिंग की थी। यह फिल्म दूसरा हिस्सा बताती है। पंजाब इन दोनों को याद रखने का हकदार है।-मधु त्रेहन

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