संकट है पर इतना गहरा नहीं कि उसकी थाह न पा सकें

Edited By Updated: 16 May, 2026 05:05 AM

there is a crisis but it is not so deep that it cannot be fathomed

यह किसी से छिपा नहीं है कि भारत के धार्मिक स्थलों तथा अन्य धार्मिक संस्थानों, ट्रस्ट और कालेधन से खरीदे गए सोने का भंडार 15 से 20 हजार टन या इससे अधिक का होगा। इसका अर्थ है कि इसे अगर संवैधानिक और कानूनी तरीके से तिजोरियों से बाहर निकलवा लिया जाए और...

यह किसी से छिपा नहीं है कि भारत के धार्मिक स्थलों तथा अन्य धार्मिक संस्थानों, ट्रस्ट और कालेधन से खरीदे गए सोने का भंडार 15 से 20 हजार टन या इससे अधिक का होगा। इसका अर्थ है कि इसे अगर संवैधानिक और कानूनी तरीके से तिजोरियों से बाहर निकलवा लिया जाए और उसका इस्तेमाल तेल, गैस और अन्य नितांत आवश्यक वस्तुओं के आयात पर किया जाए तो हम वर्तमान विदेशी मुद्रा संकट, अगर वास्तव में है, से बखूबी निपट सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह संभव कैसे हो? सीधा सा उत्तर है कि जैसे नोटबंदी की थी, वैसे ही सोनाबंदी कर दो, आधे-अधूरे मन से नहीं, जैसी 2014 में की थी। 

किसी को परेशानी न हो और जो सोना खजाने में आए, उसके बदले में गोल्ड बांड दे दो, जिस पर इतना ब्याज या मुनाफा मिले कि बांड रखने वाले को एक अवधि के बाद भुनाने पर अफसोस न हो। आप सोना खरीदने पर सख्ती करेंगे और उसे सामाजिक व्यवस्था से बाहर धकेलेंगे तो सोने की तस्करी अंदर आ जाएगी। साल भर ही सही, सोना न खरीदने की बात कहते ही स्मगलर अपनी पौ बारह होने के सपने देखने लगे हैं क्योंकि इसकी खपत रोक पाना न तो उचित है और न ही संभव, बल्कि अर्थव्यवस्था के पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।

सोना कहां लगता है : यह समझना और सरकार द्वारा समझाया जाना जरूरी है कि सोना माइक्रोचिप्स, उच्च गुणवत्तापूर्ण इलैक्ट्रॉनिक कनैक्टर्स, रक्षा उपकरणों, उपग्रह तकनीक, दंत चिकित्सा और नैनो-रिसर्च तथा कुछ वैज्ञानिक और तकनीकी उपकरणों में इस्तेमाल होता है। इसलिए सोना केवल निवेश या आभूषण नहीं, इसका वैज्ञानिक और औद्योगिक उपयोग बड़े पैमाने पर होता है जैसे सैटेलाइट टैक्नोलॉजी, हाई प्रिसीजन सैंसर्स, मैडिकल डायग्नोस्टिक आदि। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जंग नहीं लगता और अत्यधिक कंड्यूसिव होने से क्रिटिकल सिस्टम के लिए एकमात्र विश्वसनीय धातु है। 

हमारे यहां सोना और चांदी कब और कौन खरीदता है? जाहिर है ब्याह-शादी के अवसर या तीज-त्यौहार जैसे दीवाली या गणेश चतुर्थी या किसी भी पर्व पर इसका खरीदना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद लॉकर में रख दिया जाता है और किसी विशेष अवसर पर ही बाहर निकलता है। वैसे भी गहने पहनकर निकलना खतरे से ख़ाली नहीं है। चेन खींचने की घटनाएं इसका उदाहरण है। वैसे हकीकत यह है कि रिजर्व बैंक में रखे सोने से कई गुना अधिक स्वर्ण भंडार इधर-उधर यहां-वहां तालों में बंद है लेकिन सरकार के उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं हैं। धार्मिक या पारिवारिक सोना एक ऐसी वित्तीय शक्ति है जो यदि राष्ट्रीय संसाधन बन जाए तो बेड़ा पार हो जाए, शर्त यही है कि जनता के साथ धोखा न हो और व्यवस्था कांच की तरह पारदर्शी तथा भागीदारी अपनी मर्जी से हो। देशवासियों द्वारा सोना न खरीदना समस्या का समाधान न होकर केवल थोड़े समय के लिए राहत मात्र है।

तेल-भारत की आर्थिक धड़कन : भारत की सबसे बड़ी आयात निर्भरता तेल है। तेल बचत का अर्थ आयात बिल कम होने से महंगाई का दबाव अधिक न होना है। आज वाहन केवल सुविधा नहीं, अर्थव्यवस्था का प्रतीक भी है। पैट्रोल और डीजल वाहन खरीदने में कई बार सस्ते लगते हैं लेकिन लंबी अवधि में ईंधन खर्च भारी पड़ सकता है। चलिए कोई नया वाहन खरीदना है तो बिजली से चलने वाला ले लेंगे लेकिन जिनके पास अभी पैट्रोल-डीजल से चलने वाली गाडिय़ां हैं, वे उनका इस्तेमाल बंद या उन्हें कचरा तो होने देंगे नहीं, हां तेल महंगा हो जाएगा तो बहुत जरूरी होने पर ही इस्तेमाल करेंगे। साथ ही जो निर्माता इन्हें बनाते हैं, वे फैक्ट्री में ताला तो लगाएंगे नहीं। अब समस्या यह है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने की बात जब कही जाती है तो थोड़ी हंसी आती है क्योंकि सभी शहरों में मैट्रो नहीं चलती, बाकी सब जगह तो बस हो या रेल, इतनी असुविधा होती है कि यात्रा टालने में ही समझदारी लगती है।

कहा गया कि वर्क फ्रॉम होम या वर्चुअल मीटिंग कर तेल बचाइए पर मुसीबत यह है यह केवल कॉर्पोरेट कार्यालयों तक ही सीमित है और वे तो पहले से ही इस तरीके को बरसों से यानी कोरोना काल से जरूरत पडऩे पर अपना ही रहे हैं। यह सुझाव अपने आप में बचकाना है क्योंकि व्यावहारिक नहीं है। एक तो दफ्तरों में पहले ही बाबू या अफसर अपनी सीट पर हाजिरी लगाने के बाद बहुत कम नजर आते हैं, ऐसे में घर से काम करना तो उनके लिए मौज-मस्ती का जरिया बन जाएगा। फाइलें तो दफ्तर में रहती हैं और उन्हें घर ले जाने देना गोपनीयता के लिए चुनौती है और रिश्वतखोर के लिए आसामियों को घर बुलाकर सैटिंग करने का सुलभ साधन बन जाएगा। अब कल-कारखाने या फैक्ट्री या इंडस्ट्री तो घर बैठकर नहीं न चल सकती, अलबत्ता मालिक घर से निगरानी जरूर कर सकते हैं। कामगार और कर्मचारी को तो पहुंचना ही होगा चाहे जिस भी साधन से हो। 

खानपान की बात चली तो बताइए वैवाहिक भोज से लेकर सरकारी भोज और पार्टियों में जो बर्बादी होती है, वह रुकने वाली नहीं, जब तक हर कोई इतना समझदार न हो जाए कि प्लेट में उतना ही डाले जितना आसानी से खा सके। क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि देश में जो एक करोड़ से ज़्यादा लोग कुपोषण का शिकार हैं और करोड़ों ऐसे हैं जिनको दो वक्त का भोजन जुटाने में ही दिन और रात निकल जाते हैं, उनकी खाद्य सुरक्षा का इंतज़ाम किया जाए? ठीक है 90 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दे रहे हैं लेकिन क्या यह उन्हें देते रहना हमेशा के लिए कामचोर या निठल्ला बनाना नहीं है? 

भारत का भविष्य : सोना सरकार की तिजोरी में, तेल टैंक में, अन्न थाली में और रणनीतिक धातुएं प्रयोगशालाओं में, यही भारत की आॢथक स्वतंत्रता, वैज्ञानिक शक्ति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की असली परीक्षा है। भविष्य की महाशक्ति वह नहीं होगी जिसके पास केवल धन हो, बल्कि वह होगी जो अपने संसाधन समझदारी से बचाए, बनाए और नियंत्रित करे। इस युद्ध ने सिद्ध कर दिया कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, यह रसोई गैस, गेहूं, बिजली बिल और मुद्रा विनिमय दरों में भी लड़ा जाता है।-पूरन चंद सरीन 
 

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