किन्नरों को जबरन वसूली का अधिकार नहीं

Edited By Updated: 04 May, 2026 03:50 AM

transgenders have no right to extort money

हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक किन्नर की याचिका पर ‘नेग’ (दक्षिणा या उपहार) के नाम पर जबरन वसूली को गैर-कानूनी करार दिया है। अदालत ने इस तरह की वसूली को भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत अपराध बताया है। यह केस उत्तर प्रदेश के गौंडा जिले के किन्नर रेखा...

हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक किन्नर की याचिका पर ‘नेग’ (दक्षिणा या उपहार) के नाम पर जबरन वसूली को गैर-कानूनी करार दिया है। अदालत ने इस तरह की वसूली को भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत अपराध बताया है। यह केस उत्तर प्रदेश के गौंडा जिले के किन्नर रेखा देवी की याचिका पर सुना जा रहा था, जिसमें रेखा देवी ने अपनी जजमानी का इलाका निर्धारित करने की अदालत से मांग की थी। याचिकाकत्र्ता का कहना था कि इलाकों की भौगोलिक सीमा स्पष्ट न होने के कारण, प्राय: किन्नरों के अलग-अलग समूहों के बीच झड़पें व हिंसा तक होती है। पर अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए उक्त निर्णय सुनाया। 

यह सही है कि घर में खुशी के मौके पर, जैसे पुत्र या पुत्री का जन्म, विवाह या नए घर में गृह-प्रवेश के अवसर पर किन्नर बधाई देने आते हैं और नाच-गा कर अपना नेग मांगते हैं। भारत में यह अनूठी प्रथा हजारों सालों से चली आ रही है। इसकी जड़ें पौराणिक काल में हैं। सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से स्वीकृत कथा रामायण से जुड़ी है। जब भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या से जाते हैं, तो वे लोगों (पुरुषों और स्त्रियों) को वापस लौट जाने को कहते हैं। किन्नर (जो न पुरुष हैं न स्त्री) इस आदेश से खुद को बंधा नहीं मानते और राम की प्रतीक्षा में वहीं रह जाते हैं। 14 वर्ष बाद राम लौटते हैं तो उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर राम उन्हें वरदान देते हैं कि शुभ अवसरों पर उनका आशीर्वाद विशेष रूप से फलीभूत होगा। इसी वरदान को बधाई की परंपरा का मूल माना जाता है। किन्नर समुदाय गाते-बजाते, तालियां बजाते हुए आशीर्वाद देते हैं और बदले में नेग लेते हैं। यह मान्यता है कि उनकी उपस्थिति और आशीर्वाद नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है और सौभाग्य लाती है। यह कथा वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास के रामचरितमानस दोनों में मिलती है।

इसी तरह महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप (तीसरे लिंग वाला) और शिखंडी जैसे पात्र तीसरे लिंग की मान्यता दिखाते हैं। लगभग 400 ईसा पूर्व लिखे गए कामसूत्र में किन्नरों का स्पष्ट उल्लेख है। वेदों, पुराणों और अन्य शास्त्रों में भी किन्नरों का जिक्र मिलता है। किन्नरों को गायन, नृत्य और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा माना जाता था। कई विद्वान और स्रोत इस समुदाय की उपस्थिति को 4000 वर्ष से अधिक पुरानी बताते हैं। मुगल काल में हिजड़ों की भूमिका और संगठित हुई। वे हरम की रखवाली, दरबारी सेवाएं और प्रशासन में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। बधाई की परंपरा इस काल में अधिक प्रचलित और संरचित रूप में चली, जहां वे शुभ अवसरों पर नृत्य-गान करके आशीर्वाद देते और नेग प्राप्त करते थे। दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य में उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति मजबूत थी। अंग्रेजों ने 1871 के ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के तहत किन्नरों को अपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनकी पारंपरिक आजीविका और सम्मान प्रभावित हुआ। आजादी के बाद यह कानून समाप्त कर दिया गया। इस तरह बधाई-नेग की परंपरा उत्तर भारत, खासकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में आज भी जीवित है। कुछ राज्यों में सरकार ने नेग की दरें तय करने की कोशिश भी की है, पर उसमें विशेष कामयाबी नहीं मिली। 

इसी अस्पष्टता का लाभ उठा कर किन्नर समुदाय प्राय: अपने जजमानों से जबरन वसूली करता है। कभी-कभी तो वसूली का तरीका बहुत अभद्र होता है। जिसमें जजमान के परिवार के सामने निर्वस्त्र हो जाना, भद्दी गालियां देना, बद्दुआएं देना और डराना धमकाना। कभी-कभी यह सब नाटक इस सीमा तक हो जाता है कि भयभीत जजमान अपनी आर्थिक हैसियत से कई गुना ज्यादा दे कर पिंड छुड़ाता है। ऐसी वसूली को ‘नेग’ कतई नहीं कहा जा सकता। ये सरासर गुंडई और अवैध वसूली का तरीका है, जिस पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन को लगाम लगानी चाहिए। इसके साथ ही कई बार ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं, जब बाकायदा सम्पूर्ण पुरुष होते हुए भी मर्द, स्त्री का रूप धारण कर किन्नर होने का दावा करते हैं और इस वसूली में अपनी ताकत दिखाते हैं। हमारी सामाजिक मान्यताओं के अनुसार किन्नरों का शुभ अवसरों पर आकर गाना बजाना और बधाई देना शुभ माना जाता है। समाज इनका खुशी से स्वागत करता है और ऐसे अवसरों पर अड़ोसी-पड़ोसी जुट कर इनके साथ हास-परिहास भी करते हैं। यह एक स्वस्थ परंपरा है। प्राय: छोटे शहरों और कस्बों में किन्नरों के समूह कई पीढिय़ों तक अपने जजमान परिवारों से जुड़े रहते हैं और उनकी सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद देते हैं। 

देखा जाए तो सभी किन्नर संपन्न नहीं होते। वे अभावों में पलते हैं। उनकी आॢथक, शैक्षिक या स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का उचित इंतजाम नहीं होता। फिर भी वे पारस्परिक सहयोग से अपना जीवन यापन कर लेते हैं। ऐसे में किन्नरों को नाचने-गाने या भीख मांगने से हटा कर छोटे व्यवसायों या नौकरियों में लगाने की जिम्मेदारी, सरकार और समाज दोनों की है, जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। पर आपराधिक तरीके से जबरन वसूली करने वाले किन्नरों से परिवारों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस को तत्परता से निभानी चाहिए, जबकि ऐसा नहीं होता। इस समस्या को भी गंभीरता से लेने की जरूरत है।-विनीत नारायण
 

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