देश में हिंसक होते आंदोलन

Edited By , Updated: 29 Jan, 2022 07:15 AM

violent movement in the country

रेलवे परीक्षा में धांधलियों को लेकर हुई हिंसा और बवाल के मामले में बिहार पुलिस ने 6 कोचिंग संस्थानों के संचालकों के साथ सैंकड़ों अज्ञात छात्रों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज की है। सोशल मीडिया में बेहद

रेलवे परीक्षा में धांधलियों को लेकर हुई हिंसा और बवाल के मामले में बिहार पुलिस ने 6 कोचिंग संस्थानों के संचालकों के साथ सैंकड़ों अज्ञात छात्रों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज की है। सोशल मीडिया में बेहद लोकप्रिय यू-ट्यूबर टीचर खान के खिलाफ आरोप है कि सोशल मीडिया पर उनके वीडियोज की वजह से बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की। 

खान ने 2 महीने पहले सोशल मीडिया के माध्यम से परीक्षा सिस्टम की खामियों को बताते हुए, किसानों की तर्ज पर छात्रों से भी लंबा आंदोलन चलाने का आह्वान किया था। उनके वीडियोज को करोड़ों युवाओं ने पसंद किया। इससे साफ है कि छात्रों के गुस्से का समय रहते निराकरण नहीं हुआ, जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ा। 

आंदोलन में राजनेताओं के शामिल होने और पांच राज्यों के चुनावों में नफा-नुक्सान को देखते हुए, रेलवे ने परीक्षाओं की तारीख आगे बढ़ा दी है। यह भी कहा गया है कि वन स्टूडैंट वन रिजल्ट होने के साथ 20 गुणा ज्यादा कैंडिडेट्स रिजल्ट में शामिल होंगे। रेल मंत्री ने भी अभ्यर्थियों की समस्याओं के समाधान के लिए ताबड़तोड़ कई बयान जारी कर दिए। जब बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया में आंदोलन शुरू हुआ, अगर उसी समय रेल मंत्रालय और सरकार चेत जाते तो इस अराजकता को रोका जा सकता था। 

आंदोलनों के माध्यम से ही भारत को आजादी मिली : किसान आंदोलन से दिल्ली और कई राज्यों में ल बे समय तक अशांति रही। पर सरकार ने पांच राज्यों में चुनाव के पहले कृषि कानूनों को रद्द करने का फैसला लिया। अधिकांश आंदोलन इसलिए हिंसक होते हैं, क्योंकि सरकारें समय पर नहीं चेततीं। हिंसा फैलाने और सार्वजनिक संपत्ति को नुक्सान पहुंचाने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो जाए तो उन्हें भारी हर्जाने के साथ 5 साल तक की जेल हो सकती है। लेकिन राजनीतिक लाभ की वजह से इन कानूनों पर सही तरीके से अमल नहीं होता। 

कानून और संविधान के अलावा छात्रों के आंदोलन और हिंसा के कई अन्य पहलू हैं। आंदोलनों के माध्यम से ही भारत को आजादी मिली। आजादी के बाद संविधान लागू हुआ, जिसमें अनुच्छेद 19-के तहत अभिव्यक्ति की आजादी के साथ लोकतांत्रिक तरीके से सरकार के विरोध का अधिकार है। छात्रों के आंदोलन करने वाले समूह आसू ने तो असम में युवाओं की सरकार ही बना ली थी। बिहार की वर्तमान सरकार के मुखिया नीतीश कुमार तो आपातकाल से उपजे आंदोलनों की ही उपज हैं। इसलिए बेरोजगारी से जूझ रहे छात्रों के आंदोलन को सिर्फ कानून और संविधान की दुहाई देकर अराजक और देश-विरोधी बताना ठीक नहीं है। 

हिंसात्मक आंदोलनों के लिए नेताओं की जवाबदेही : अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में सार्वजनिक संपत्ति को नुक्सान पहुंचाने की परंपरा को आजाद भारत में जारी रखने के लिए, नेताओं की बड़ी जि मेदारी है। गवर्नैंस, विकास और जनता से जुड़े मुद्दों की बजाय अराजकता और हिंसा के नाम पर नेताओं को चुनावों में शॉर्टकट सफलता भले ही मिल जाए, लेकिन उसमें ‘कानून का शासन’ शहीद हो जाता है। इस तरह के आंदोलनों के लिए नेताओं की 5 तरीके से और भी जिम्मेदारी बनती है। पहला-सरकारी नौकरियों के लिए आयोजित परीक्षाओं और इंटरव्यू में भ्रष्टाचार और गड़बड़ी को ठीक करने के लिए किसी भी सरकार ने संस्थागत ठोस सुधार नहीं किए। दूसरा-नेताओं को देखकर युवाओं को भी लगता है कि अगर सत्ता हासिल करने के लिए हेट स्पीच, आंदोलन और दंगा जायज है तो फिर नौकरी के लिए इस नुस्खे के इस्तेमाल में क्या बुराई है?

तीसरा-चुनावों के समय सभी दलों के नेता करोड़ों नौकरियों के साथ युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने का वाब दिखाते हैं, लेकिन सरकार बनाने के बाद नेता लोग जाति, धर्म और क्षेत्र की सियासत करके, अराजक आंदोलनों को शह देते हैं। चौथा-सार्वजनिक स्थान में धरना-प्रदर्शन के लिए प्रशासन की अनुमति चाहिए, जिसका नेता लोग खुद ही पालन नहीं करते। छात्र भी नेताओं के पदचिन्हों पर चलकर अपनी भड़ास निकालते हैं। 

पांचवां-आम जनता मास्क नहीं पहने या ऑड-ईवन का उल्लंघन करे तो उन पर भारी जुर्माने के साथ एफ.आई.आर. भी दर्ज हो जाती है। दूसरी तरह सभी दलों के बड़े नेता बगैर मास्क के चुनाव प्रचार करके कानून और संविधान को ठेंगा दिखा रहे हैं। लेकिन पुलिस और चुनाव आयोग चुप्पी साधे हैं? 

बेरोजगार युवाओं में बढ़ती हताशा : उत्तर प्रदेश और बिहार में भारी बेरोजगारी होने के साथ सरकारी नौकरियों के प्रति ज्यादा आकर्षण की वजह से, युवाओं में ज्यादा हताशा और आक्रोश है। लेकिन यह स्थिति पूरे देश की है। यह इस बात से जाहिर है कि रेलवे की ग्रुप-डी की नौकरी के लिए लगभग अढ़ाई करोड़ लोगों ने अप्लाई किया था। रेल मंत्रालय ने कहा है कि हिंसा और हंगामा करने वाले छात्रों की वीडियो रिकॉर्डिंग से पहचान करके, उन्हें भविष्य में नौकरी नहीं दी जाएगी। 

सरकारी संपत्ति को नुक्सान पहुंचाने वालों के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज हो जाए तो उन्हें सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता है। लेकिन यह बहुत ही अजब है कि आंदोलन और हिंसा की सीढ़ी से राजनीति में शामिल लोग विधायक, सांसद और मंत्री बन जाते हैं। सत्ताधारियों के वी.आई.पी. कल्चर और उन पर कानून नहीं लागू होने से बेरोजगार युवाओं में कुंठा और हिंसा बढ़ रही है। ऐसी घटनाएं भविष्य में नहीं हों, इसके लिए राजनेताओं को कानून के दायरे में अनुशासित होने की अच्छी मिसाल पेश करनी होगी।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)
 

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