हम अपनी भावी पीढ़ियों के लिए कैसा भविष्य छोड़ रहे हैं?

Edited By Updated: 12 Feb, 2026 05:04 AM

what kind of future are we leaving for our future generations

आजाद  भारत में ऐसा कोई समय याद करना मुश्किल है, जब सार्वजनिक  संभाषण का स्तर इतना नीचे चला गया हो या जब नफरत, ङ्क्षहसा और सांप्रदायिकता सामान्य हो गए हों। यह आभासी और वास्तविक दुनिया दोनों में हो रहा है, शायद हर चीज एक-दूसरे को बढ़ावा दे रही हो।

आजाद भारत में ऐसा कोई समय याद करना मुश्किल है, जब सार्वजनिक संभाषण का स्तर इतना नीचे चला गया हो या जब नफरत,हिंसा और सांप्रदायिकता सामान्य हो गए हों। यह आभासी और वास्तविक दुनिया दोनों में हो रहा है, शायद हर चीज एक-दूसरे को बढ़ावा दे रही हो। सबसे पहले फिल्मों और टैलीविजन सीरियल्स पर नजर डालते हैं। जितनी ज्यादा हिंसा और खून-खराबा हो रहा है, उतने ही ज्यादा ऐसे शोज पॉपुलर हो रहे हैं, जिनमें ये सब दिखाया जा रहा है। भयानक हत्याओं, गला काटने, खून-खराबे और टॉर्चर के सीन दर्शकों को पसंद आ रहे हैं। ‘एनिमल’, ‘तेरे इश्क में’ और ‘धुरंधर’ जैसी फिल्में क्रूरता को एक अलग स्तर पर ले जाती हैं।

इसी तरह ‘पाताल लोक’ जैसे टैलीविजन सीरियल्स हमारे घरों में ही खून जमा देने वाले सीन दिखाते हैं। ऐसे लगभग सभी मामलों में, हिंसा करने वाला व्यक्ति (आमतौर पर हीरो) बिना किसी कानूनी सजा के बच जाता है। जाहिर है, ऐसे शोज की लोकप्रियता ही प्रोड्यूसर्स को क्रूरता दिखाने का स्तर बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती है। अलग-अलग उम्र के लोगों के लिए कानूनी चेतावनी और देखने पर रोक, ऐसी हिंसा का दर्शकों पर क्या असर होगा, इस पर सोचने से ज्यादा एक फॉर्मैलिटी है। यह सब बोलने की आजादी के नाम पर हो रहा है लेकिन इससे इंसानी मानसिकता को, खासकर युवाओं और आसानी से समझ में आने वाले लोगों को, जो नुकसान हो रहा है, वह बहुत ज्यादा है और लंबे समय तक रहेगा। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि समाज में भी नफरत, हिंसा और सांप्रदायिकता सामान्य होता जा रहा है। हमारे राजनीतिक नेता समाज में जहर फैलाने में सबसे आगे हैं, जबकि न्यायपालिका और मीडिया आसानी से नजरें फेर रहे हैं और ऐसी आदतों पर सवाल नहीं उठा रहे हैं।

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक छोटा वीडियो क्लिप वायरल हुआ। इसमें असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा बंदूक पकड़े हुए एक खास कम्युनिटी के लोगों के समूह पर गोली चलाते हुए दिख रहे थे। यह वीडियो क्लिप किसी और ने नहीं, बल्कि असम में भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक मीडिया हैंडल ने जारी किया था। क्लिप का टाइटल ‘प्वॉइंट ब्लैंक शॉट’ था और उसमें लिखा था ‘नो मर्सी’। सोशल मीडिया पर हंगामा मचने के बाद, पार्टी की असम इकाई के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाऊंट से क्लिप हटा दी गई, लेकिन उतनी ही बुरी बात यह थी कि मुख्यमंत्री या पार्टी के किसी भी नेता ने वीडियो के कंटैंट के लिए माफी मांगने या उसकी बुराई करने से इंकार कर दिया। सरमा ने यह अजीब दलील दी है कि उन्होंने 10 सैकेंड की क्लिप ‘नहीं देखी’, जबकि यह सोशल मीडिया पर लगातार मौजूद है। यह साफ है कि उन्हें इतने नफरत भरे और सांप्रदायिक वीडियो के लिए कोई अफसोस नहीं है।

यह वही मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने हाल ही में लोगों से कहा था कि अगर मुस्लिम रिक्शा चालक 5 रुपए मांगें तो उन्हें सिर्फ 4 रुपए देकर उन्हें वित्तीय नुकसान पहुंचाया जाए। उन्हें लगता है कि अवैध प्रवासियों को राज्य छोडऩे के लिए मजबूर करने का यही एकमात्र तरीका है! उनकी अपनी सरकार की घुसपैठ रोकने या अवैध प्रवासियों की पहचान करने की जिम्मेदारी का क्या, जो एक दशक से राज्य पर राज कर रही है? खासकर तब, जब वही पार्टी केंद्र में भी सत्ता में है और बॉर्डर पार से अवैध प्रवासन को रोकने के लिए जिम्मेदार है। अल्पसंख्यकों पर उनके हालिया हमलों से ऐसा लगता है कि उन्हें पार्टी के राज में हुए विकास और प्रगति के आधार पर राज्य में आने वाले विधानसभा चुनाव जीतने का भरोसा नहीं है। उन्होंने हाल ही में अपने मुख्य कांग्रेसी विरोधी गौरव गोगोई पर भी हमला किया, उन पर और उनकी पत्नी पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का आरोप लगाया! इसके अलावा, उन्होंने उनके खिलाफ 500 करोड़ रुपए का मानहानि का केस भी किया है।

सुप्रीम कोर्ट अब मुख्यमंत्री की ‘हेट स्पीच’ के खिलाफ एक पटीशन पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। सुनवाई के लिए पटीशन स्वीकार करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीष सूर्यकांत ने मजाकिया अंदाज में कहा कि ‘जैसे इलैक्शन होते हैं, वैसे ही इलैक्शन का एक हिस्सा सुप्रीम कोर्ट में भी होता है।’ सुनवाई के लिए अभी कोई तारीख तय नहीं हुई है और यह उम्मीद कम है कि मुख्यमंत्री मुस्लिम कम्युनिटी के खिलाफ अपनी बयानबाजी कम करेंगे। शारीरिक हिंसा और कम्युनलिज्म की खुली धमकियों का एक और मामला उत्तराखंड के कोटद्वार की घटना से जुड़ा है। फिर से एक वीडियो क्लिप घूम रही है जिसमें एक ग्रुप के लोग एक हिंदू युवक द्वारा दूसरे समुदाय के एक बुजुर्ग व्यक्ति को बचाने के लिए की गई कार्रवाई का ‘बदला’ लेने के लिए बस्ती की ओर मार्च करेंगे। आग उगलने वाला नेता युवाओं को एक खास दिन और समय पर बड़ी संख्या में शामिल होने के लिए उकसाता हुआ और पुलिस को उन्हें रोकने की हिम्मत करने की चुनौती देता हुआ दिख रहा है। यह कॉलम लिखे जाने तक, न तो पुलिस और न ही न्यायपालिका ने इस धमकी पर कोई ध्यान दिया था। बड़े पैमाने पर समाज और खासकर हमारे वरिष्ठ नेताओं को, आत्ममंथन करना चाहिए और इस बात पर सोचना चाहिए कि हम अपने देश की आने वाली पीढिय़ों के लिए कैसा माहौल छोड़कर जा रहे हैं।-विपिन पब्बी
 

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