Edited By Tanuja,Updated: 12 Feb, 2026 11:47 AM

बांग्लादेश के आम चुनाव भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम हैं। शेख हसीना की गैरमौजूदगी में हो रहे इस चुनाव से भारत-बांग्लादेश रिश्तों, सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा तय होगी।
International Desk: बांग्लादेश में हो रहे 13वें आम संसदीय चुनाव पर भारत की पैनी नजर है। यह चुनाव सिर्फ बांग्लादेश की सत्ता तय नहीं करेगा, बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों की भविष्य दिशा भी तय करेगा। शेख हसीना की अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने और BNP-जमात गठबंधन के उभार ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है। बांग्लादेश चुनाव को भारत सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि रणनीतिक चुनौती के रूप में देख रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के 15 साल लंबे शासन के दौरान भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए। सीमा विवाद, आतंकवाद पर सहयोग, पूर्वोत्तर उग्रवाद पर लगाम और आर्थिक साझेदारी में भारत को ढाका का खुला समर्थन मिला। लेकिन अगस्त 2024 के जनांदोलन के बाद हसीना के सत्ता से हटने और अब चुनावी मैदान से बाहर होने से हालात बदल गए हैं।
भारत की आशंका
भारत को आशंका है कि यदि BNP और जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आती है, तो ढाका की विदेश नीति में झुकाव बदल सकता है। अतीत में BNP-जमात शासन के दौरान भारत-विरोधी तत्वों को खुली छूट, सीमा पार आतंकवाद और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों को लेकर गंभीर आरोप लगते रहे हैं। चुनाव के बाद अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भी भारत के लिए एक बड़ा मुद्दा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाएं बढ़ीं। यह विषय भारत-बांग्लादेश संबंधों में संवेदनशील बिंदु बना हुआ है।

चीन-पाकिस्तान की लग सकती लॉटरी
शेख हसीना के शासनकाल में ढाका भारत के सबसे भरोसेमंद पड़ोसियों में रहा, लेकिन अब सत्ता परिवर्तन की संभावना ने चीन और पाकिस्तान के लिए नए अवसर खोल दिए हैं। चीन पिछले एक दशक से बांग्लादेश में बंदरगाह, बुनियादी ढांचा और रक्षा सौदों के जरिए अपनी पैठ बढ़ाता रहा है। यदि नई सरकार भारत से दूरी बनाती है, तो ढाका-बीजिंग रिश्ते और गहरे हो सकते हैं, जिससे बंगाल की खाड़ी में चीन की मौजूदगी मजबूत होगी। वहीं पाकिस्तान के लिए यह चुनाव रणनीतिक वापसी का अवसर माना जा रहा है। अतीत में BNP-जमात शासन के दौरान भारत-विरोधी तत्वों को कथित तौर पर संरक्षण मिला था। भारत को आशंका है कि सत्ता संतुलन बदला तो पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा चुनौतियां फिर उभर सकती हैं।

दक्षिण एशिया के लिए निर्णायक साबित होंगे चुनाव
रणनीतिक जानकारों के मुताबिक यदि नई सरकार भारत से दूरी बनाती है, तो क्षेत्र में चीन की मौजूदगी और बढ़ सकती है, जो भारत की सुरक्षा चिंताओं को गहरा कर सकती है। हालांकि BNP नेता तारीक़ रहमान ने चुनाव प्रचार के दौरान ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ और न्यायपूर्ण राजनीति की बात कही है, लेकिन भारत यह देखना चाहता है कि सत्ता में आने के बाद उनका रुख व्यावहारिक रूप से कैसा रहता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह चुनाव दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। इसलिए नई दिल्ली न केवल नतीजों पर, बल्कि नई सरकार की पहली नीतिगत घोषणाओं पर भी करीबी नजर बनाए हुए है।

मतदान के साथ अल्पसंख्यकों की परीक्षा
बांग्लादेश चुनाव में सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है अल्पसंख्यकों की सुरक्षा। शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदायों पर बढ़ते हमलों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्टों के मुताबिक अगस्त 2024 से दिसंबर 2024 के बीच हजारों साम्प्रदायिक घटनाएं दर्ज की गईं। मंदिरों में तोड़फोड़, घरों पर हमले और जबरन पलायन की घटनाएं भारत के लिए केवल मानवीय नहीं, बल्कि कूटनीतिक चुनौती भी हैं।भारत ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों से जुड़ा हुआ है।

पूर्वोत्तर भारत पर बढ़ सकता दबाव
नई दिल्ली के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि अस्थिरता की स्थिति में शरणार्थी दबाव पूर्वोत्तर भारत पर बढ़ सकता है। BNP और जमात-ए-इस्लामी की राजनीति को लेकर भारत में यह धारणा रही है कि उनके शासनकाल में अल्पसंख्यकों की स्थिति कमजोर होती है। हालांकि वर्तमान नेतृत्व सुधार की बात कर रहा है, लेकिन भारत परिणामों के बाद वास्तविक कार्रवाई देखना चाहता है।विशेषज्ञों के अनुसार, चुनाव के बाद अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर नई सरकार का रुख ही यह तय करेगा कि भारत-बांग्लादेश संबंध विश्वास की दिशा में बढ़ेंगे या आशंकाओं की ओर।