हमें चारों ओर फैल रहे हानिकारक वातावरण से शिक्षा को बचाना होगा

Edited By Updated: 07 Feb, 2026 05:54 AM

we must protect education from harmful environment that is spreading all around

आज पूरी दुनिया में जहरीली गंदगी फैली हुई है। स्लोप भी उसी गंदगी का एक हिस्सा है। कुछ प्रकाशनों ने ‘स्लोप’ को 2025 का ‘वर्ड ऑफ द ईयर’ चुना है। इसका उच्चारण इसके अर्थ को स्पष्ट करता है-कृत्रिम बुद्धिमता (ए.आई.) द्वारा निर्मित निम्न-गुणवत्ता वाली,...

आज पूरी दुनिया में जहरीली गंदगी फैली हुई है। स्लोप भी उसी गंदगी का एक हिस्सा है। कुछ प्रकाशनों ने ‘स्लोप’ को 2025 का ‘वर्ड ऑफ द ईयर’ चुना है। इसका उच्चारण इसके अर्थ को स्पष्ट करता है-कृत्रिम बुद्धिमता (ए.आई.) द्वारा निर्मित निम्न-गुणवत्ता वाली, अत्यधिक मात्रा वाली डिजिटल सामग्री। पहले इस शब्द का अर्थ ‘गीला खाद्य अपशिष्ट या कीचड़’ होता था, लेकिन अब अपने नए रूप में यह एक महत्वपूर्ण कमी को पूरा करता है और हमें उस चीज को नाम देने में मदद करता है जिससे हम घिरे हुए हैं। पूरी दुनिया में निरर्थक बातों की बाढ़-सी आ गई है, जो हमारे आसपास के जहर को और भी घातक बना रही है। अक्सर ये बातें घटिया किस्म की होती हैं लेकिन अन्य रूपों में भी इतनी अधिक हैं कि उन सभी को यहां पूरी तरह से सूचीबद्ध करना संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, कुछ स्वघोषित गुरुओं, राजनेताओं और व्यापारियों के भाषण, शोध के रूप में प्रस्तुत किए जाने वाले मीडिया लेख और कार्यक्रम, और मोहल्लों के स्वघोषित नेताओं से मिलने वाले अनचाहे निर्देश। विभिन्न माध्यम इस तरह की सामग्री हम पर परोस रहे हैं।

कुछ बेतुकी बातें तो सरासर बकवास होती हैं लेकिन सब नहीं। इनमें से काफी सटीक मापदंड पर खरी नहीं उतरतीं-यानी ऐसी बात, जिसका ‘सत्य से कोई संबंध न हो’। चूंकि हम ऐसी बेतुकी बातों में डूबे हुए हैं, इसलिए इनकी मुख्य बातों को संक्षेप में समझना जरूरी है। इसका सार यह है कि इन्हें बोलने वालों को इस बात की परवाह नहीं होती कि उनके दावे सही हैं या गलत और ये वास्तविकता का वर्णन करने की बजाय किसी विशिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने या वक्ता की एक विशेष छवि बनाने के लिए कही जाती हैं। आज की दुनिया में ‘टैक्नोहोलिक्स’ और ‘टैक्नो-जॉम्बी’ विचार भी ऐसी ही ताकतें हैं जो भ्रम पैदा कर रही हैं। ‘टैक्नोहोलिक्स’ इस विचार के प्रति कट्टर रूप से समॢपत होते हैं कि तकनीक सभी समस्याओं का समाधान और प्रगति का एकमात्र वास्तविक मार्ग है। ‘टैक्नो-जॉम्बी’ विचार वे हैं, जो गलत और अक्सर हानिकारक साबित हो चुके हैं लेकिन फिर भी बार-बार जीवित हो उठते हैं। उदाहरण के लिए, शिक्षा के क्षेत्र में यह विचार कि ‘तकनीक सिखा सकती है’। तकनीक के क्षेत्र में हर कोई टैक्नोहोलिक नहीं है और हर तकनीकी विचार ‘जॉम्बी’ नहीं है, फिर भी, ऐसे विचारों की संख्या बहुत अधिक है।

आज के प्रौद्योगिकी प्रेमियों में ए.आई. की दुनिया के अगुआ भी शामिल हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि ए.आई. मानवता की सभी समस्याओं का समाधान कर सकती है और कुछ तो यह भी मानते हैं कि वास्तव में ए.आई. ही मानव जीवन का उद्धार और मुक्तिदाता होगी। बेशक, ए.आई. की दुनिया में कई समझदार लोग भी हैं, लेकिन बहुत से लोग हद से ज्यादा बहक चुके हैं। या तो ए.आई. में अटूट विश्वास के कारण या फिर अरबों डॉलर की चकाचौंध भरे सपने के कारण। हमारी दुनिया का यह जहरीला और भयावह माहौल तब स्पष्ट हो जाता है, जब वे लोग और संस्थाएं जो कभी इसके समर्थक या सहयोगी रहे हैं, इसका साथ देना बंद कर देते हैं। लंदन स्थित प्रकाशन ‘द इकोनॉमिस्ट’, जो छोटी-छोटी बातों पर लोगों के विचारों को ‘लुडाइट’ (अति-तकनीकी) करार देने के लिए जाना जाता है, ने ‘एड टेक लाभदायक है, लेकिन ज्यादातर बेकार भी है’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें लिखा है, ‘‘स्कूलों में तकनीक की व्यापकता ठोस प्रमाणों की बजाय आक्रामक मार्कीटिंग पर आधारित है और दीर्घकालिक रुझान इस संभावना को बढ़ाते हैं कि कक्षा में उपकरणों के बढ़ते उपयोग से पढऩे और अन्य विषयों में प्रदर्शन में खतरनाक गिरावट आई है।’’ यह अच्छी बात है कि इस प्रतिष्ठित पत्रिका ने एड-टेक के प्रचार को पहचाना है।

रोजगार के खतरे की बढ़ती संख्या में से एक और चेतावनी दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर एक बड़ी ऊर्जा कंपनी के सी.ई.ओ. द्वारा ए.आई. के कारण आने वाले ‘रोजगार संकट’ की घोषणा थी। व्यापार जगत में कई लोग अब यह स्वीकार करते हैं कि ए.आई. करोड़ों नौकरियों को नष्ट कर देगी, साथ ही उन्हें यह भी नहीं पता कि ए.आई. कितनी नौकरियां पैदा कर सकती है, जो उन नौकरियों के बराबर हों जिन्हें वह नष्ट करेगी। उतनी ही चौंकाने वाली बात यह है कि जिन लोगों ने सोचा था कि ए.आई. शिक्षा में सुधार का रामबाण इलाज होगी, उन्हें अब एहसास हो रहा है कि शिक्षा वास्तव में अपनी बुनियाद पर ही ए.आई. के हमले का शिकार है। शिक्षा के क्षेत्र में गहराई से जुड़े लोगों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि किस प्रकार ए.आई. छात्रों की सोचने-समझने की क्षमता को अवरुद्ध और नष्ट कर रही है। वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि शिक्षा में अन्य सभी तकनीकों की तरह, ए.आई.-आधारित ऐप्स भी वास्तविक दुनिया में लगभग बेकार हैं। हमने राजनीति, सामाजिक ताने-बाने, मानवीय संबंधों और व्यक्तियों पर घटियापन, सरासर बेतकेपन और तकनीक के गहरे और व्यापक प्रभावों का अभी तक जरा-सा भी अध्ययन नहीं किया है। यह दूषित प्रभाव मानव समाज के लगभग हर पहलू और लोगों के दिलों और दिमागों में घुसपैठ कर चुका है।

आज के आधुनिक युग में, शिक्षा और इसके लिए निर्मित विशाल प्रणालियां ही हमारे बच्चों की दुनिया से निपटने और उसे आकार देने की क्षमता विकसित करने का प्राथमिक संगठित सामाजिक तंत्र हैं। हमें शिक्षा को इस हानिकारक विष से बचाना होगा-क्योंकि वैश्विक अराजकता का मुकाबला करने में इसकी केंद्रीय भूमिका है। और इसके लिए, शिक्षा को हमारे बच्चों में आलोचनात्मक और गहन चिंतन, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार और ईमानदारी से जीने की क्षमता विकसित करनी होगी। यदि यह बहुत कठिन लगता है, तो यह है। लेकिन फिर भी, यही हमारा सबसे अच्छा उपाय है।-अनुराग बेहार 

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