‘टी.सी.एस.’ नासिक जैसे मतांतरण रुक क्यों नहीं रहे?

Edited By Updated: 22 May, 2026 05:15 AM

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यह लेख प्रख्यात लेखक, स्तंभकार और विचारक स्वर्गीय बलबीर पुंज जी ने अपने निधन (18 अप्रैल) से एक दिन पूर्व, अगले सप्ताह प्रस्तावित ङ्क्षहदी स्तंभ के लिए लिखा था। मतांतरण मामले में निदा खान की गिरफ्तारी और ए.आई.एम.आई.एम. नेताओं द्वारा उसे दिए गए...

यह लेख प्रख्यात लेखक, स्तंभकार और विचारक स्वर्गीय बलबीर पुंज जी ने अपने निधन (18 अप्रैल) से एक दिन पूर्व, अगले सप्ताह प्रस्तावित हिंदी स्तंभ के लिए लिखा था। मतांतरण मामले में निदा खान की गिरफ्तारी और ए.आई.एम.आई.एम. नेताओं द्वारा उसे दिए गए संरक्षण की खबरों ने फिर से नासिक टी.सी.एस. मामले को चर्चा में ला दिया है। ऐसे में पुंज जी का यह लेख प्रासंगिक हो जाता है। कॉलम मेरे पिछले आलेख, ‘असहज सच से मुंह मोडऩे की ‘सैकुलर’ कीमत’ (16 अप्रैल) की अगली कड़ी है। तब मेरा तर्क था कि भारत में स्वयंभू ‘सैकुलर’ बुद्धिजीवियों का एक वर्ग, दशकों से संविधान के तटस्थ संरक्षक के रूप में कम और संगठित मतांतरण गिरोह के साथ वैचारिक कट्टरवाद के पैरोकार के रूप में अधिक कार्य कर रहा है। नासिक टी.सी.एस. मतांतरण मामले ने एक बार फिर से असहज करने वाली काली सच्चाई को उजागर कर दिया है।

भारतीय उपमहाद्वीप इस परिस्थिति को समझने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है। इतिहास साक्षी है कि जहां कहीं भी इस्लाम ने व्यापक सामाजिक या राजनीतिक प्रभुत्व हासिल किया, वहां बहुलतावाद, सह-अस्तित्व और लोकतंत्र को ‘दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फैंक दिया’ गया। इसमें इस्लाम-पूर्व संस्कृतियों, उनकी परंपराओं और सभ्यतागत स्मृतियों को या तो बेरहमी से हाशिए पर धकेल दिया गया या पूरी तरह मिटा दिया गया। ऐसे मजहबी समाज में गैर-मुस्लिमों का दमन बेखौफ होता है और तब छद्म-सैकुलरवाद जैसे किसी दिखावे की आवश्यकता भी नहीं रहती। पूरे उपमहाद्वीप में जनसांख्यिकीय विषमता चौंकाने वाली ही नहीं, बल्कि भयावह है। विभाजन के समय, खंडित भारत में मुसलमानों की आबादी 10 प्रतिशत से कम थी, अब 15 प्रतिशत से अधिक है। वहीं दूसरी ओर, 1947 से पहले भारत का हिस्सा रहे पाकिस्तान में हिंदू-सिख कुल आबादी का 15-16 प्रतिशत थे, आज वे 2 प्रतिशत भी नहीं हैं। बंगलादेश में, हिंदू-बौद्ध आबादी दशकों में 28-30 प्रतिशत से सिकुड़कर 8-9 प्रतिशत रह गई है। 

लाहौर इसका एक मार्मिक उदाहरण प्रस्तुत करता है। पारंपरिक रूप से भगवान श्रीराम के पुत्र लव से जुड़ा यह ऐतिहासिक नगर कभी सनातन विरासत का जीवंत प्रतिनिधित्व करता था। सैयद मुहम्मद लतीफ द्वारा 19वीं सदी में लिखित ‘लाहौर’ पुस्तक में उन सैंकड़ों मंदिरों और पूजा स्थलों का उल्लेख है, जो कभी वहां गुलजार थे। 2003 में अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान, मैंने उस महान सभ्यतागत परिदृश्य को खोजने का प्रयास किया। जो कुछ बचा था, वह केवल मजहबी उपेक्षा और पतन का दर्पण था। ऐसे ही अफगानिस्तान 1000 साल पहले तक ङ्क्षहदू-बौद्ध शिक्षा का एक अत्यंत समृद्ध केंद्र, तो श्री गुरु नानक देव जी की पवित्र यात्राओं से धन्य हुआ क्षेत्र था। महमूद गजनी के दौर से जारी सतत् जेहाद के बाद जिन हिंदू-सिखों की संख्या 1970 के दशक में घटकर कुछ लाख रह गई थी, उन्हें अब मजहबी यातनाओं, गृहयुद्ध और तालिबान के क्रूर शासन ने लगभग जड़ से समाप्त कर दिया है।

कश्मीर आज भी खंडित भारत का रिसता घाव बना हुआ है। कभी शैव-बौद्ध विद्वता के लिए पूरे विश्व में विख्यात महॢष कश्यप की यह पावन भूमि 14वीं शताब्दी के बाद गहन जेहाद के दौर से गुजरी। सतत् इस्लामीकरण ने इस भूखंड के जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक चरित्र को कुचल कर रख दिया। ङ्क्षहदू डोगरा शासन (1846-1947) में बहुलतावाद का एक संक्षिप्त पुनरुद्धार अवश्य देखा गया, परंतु 20वीं सदी के दौरान, शेख अब्दुल्ला की सांप्रदायिक राजनीति ने सैकुलरवाद के नाम पर इस्लामी ‘ईको-सिस्टम’ को फिर से मजबूत कर दिया। इसका दुष्परिणाम 1980-90 के दौर में तब सामने आया, जब इस्लाम के नाम पर कश्मीरी पंडितों का उन स्थानीय मुस्लिमों ने मजहबी दमन किया, जो कभी उनके मित्र-पड़ोसी हुआ करते थे। जेहाद से त्रस्त लाखों पंडित पलायन के बाद अपने ही देश में शरणार्थी बन गए, जबकि अधिकांश ‘सैकुलर’ इस त्रासदी की वैचारिक जड़ों की अवहेलना करके खोखली ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब का बेसुरा राग अलापते रहे। 

उपमहाद्वीप के कई मुसलमानों के लिए मजहबी निष्ठा राष्ट्र से ऊपर है। इस संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराजा हरि सिंह के पुत्र डा. कर्ण सिंह द्वारा लिखित आत्मकथा ‘हेयर अपेरेंट’ में दर्ज घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। अक्तूबर 1947 में जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान समॢथत आक्रमण को याद करते हुए, उन्होंने उल्लेख किया कि कैसे रियासती सैन्यबल के मुस्लिम कर्मी मजहबी आत्मीयता से प्रभावित होकर महाराजा से गद्दारी करते हुए शत्रुओं से जा मिले। इस्लामी पाकिस्तान में हिंदू-ईसाई-सिख लड़कियों के अपहरण-मतांतरण की खबरें नियमित रूप से सामने आती हैं। चूंकि भारत में इस तरह के कृत्यों को खुलेआम अंजाम नहीं दिया जा सकता, इसलिए ‘लव-जेहाद’ जैसे मजहबी उपक्रमों का सहारा लिया जाता है। नासिक टी.सी.एस. प्रकरण इसी विषैली मानसिकता का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है।

बात केवल मतांतरण तक सीमित नहीं है। हालिया वर्षों में रामनवमी और हनुमान जयंती समारोह सहित अन्य हिंदू शोभायात्राओं के दौरान बार-बार पूर्व-नियोजित झड़पें भी देखी गई हैं। इस साल की शुरुआत में होली के दौरान दिल्ली के उत्तम नगर में मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदू युवक की पीट-पीटकर निर्मम हत्या कर दी गई थी। वर्ष 2021 में मद्रास उच्च न्यायालय ने मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों से हिंदू जलूसों को रोकने संबंधी मुस्लिम पक्षों की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह चिंतन देश के पंथनिरपेक्षी ताने-बाने को तार-तार कर देंगे।

भारत की असली ताकत इसके सभ्यतागत बहुलतावाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र में निहित है। भारत का समावेशी चरित्र सदियों से केवल अपने हिंदू सभ्यतागत लोकाचार के कारण ही जीवित है। ऐसे में स्वामी विवेकानंद की उस चेतावनी का संज्ञान लेना आवश्यक है, जिसमें उन्होंने अप्रैल 1899 में ‘प्रबुद्ध भारत’ से साक्षात्कार करते हुए कहा था: ‘हिंदू परिधि से बाहर जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल एक व्यक्ति कम होना नहीं है, बल्कि एक शत्रु का बढऩा है।’ क्या समाज समय रहते सचेत होगा?-बलबीर पुंज  
 

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